आनंद तेलतुंबड़े | भारत की नागरिकता की पहेली ऐसे दस्तावेज़ मांगती है, जो कुछ भी साबित नहीं करते 

विदेश मंत्रालय ने हाल ही में स्पष्ट किया कि “पासपोर्ट भारतीय नागरिकता का प्रमाण नहीं, बल्कि केवल एक यात्रा दस्तावेज़ है.” इस बयान ने एक पुराने लेकिन बेहद महत्वपूर्ण सवाल को फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया कि आखिर भारत में ऐसा कौन-सा दस्तावेज़ है जो किसी व्यक्ति की नागरिकता को अंतिम रूप से साबित करता हो. सरकार ने इसे कोई नया नियम मानने से इनकार करते हुए कहा कि यह पहले से चली आ रही कानूनी व्यवस्था का ही दोहराव है. लेकिन इस बहस ने भारत की नागरिकता व्यवस्था की एक बड़ी खामी को उजागर कर दिया.

भारत में जन्म से नागरिक बने अधिकांश लोगों के पास ऐसा कोई दस्तावेज़ नहीं है जिसे कानून नागरिकता का अंतिम प्रमाण मानता हो. न पासपोर्ट, न आधार कार्ड, न वोटर आईडी, न राशन कार्ड और न ही पैन कार्ड नागरिकता का निर्णायक प्रमाण हैं. संसद में भी केंद्र सरकार पहले स्पष्ट कर चुकी है कि जन्म से भारतीय नागरिकों के लिए कोई अलग नागरिकता प्रमाणपत्र जारी नहीं किया जाता. केवल वे लोग, जिन्होंने प्राकृतिककरण या पंजीकरण के माध्यम से भारतीय नागरिकता प्राप्त की है, उन्हें औपचारिक नागरिकता प्रमाणपत्र मिलता है.

यही कानूनी खालीपन तब गंभीर सवाल खड़ा करता है जब चुनाव आयोग मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) जैसी प्रक्रिया शुरू करता है. बिहार विधानसभा चुनाव से पहले शुरू हुए इस अभियान में लाखों मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटाए गए और बाद में इसका विस्तार कई अन्य राज्यों तक किया गया. इससे नागरिकता और मतदान के अधिकार को लेकर व्यापक बहस छिड़ गई.

इस प्रक्रिया की तीन बातें सबसे अधिक विवाद का कारण बनीं. पहली, आधार कार्ड, वोटर आईडी और राशन कार्ड जैसे सबसे सामान्य दस्तावेज़ों को शुरुआती चरण में पर्याप्त नहीं माना गया. दूसरी, नागरिकता साबित करने की पूरी जिम्मेदारी नागरिकों पर डाल दी गई. तीसरी, पूरी प्रक्रिया के लिए बहुत कम समय दिया गया, जबकि बड़ी संख्या में प्रवासी मजदूर, गरीब परिवार और ग्रामीण आबादी के पास मांगे गए दस्तावेज़ उपलब्ध ही नहीं थे. कई मामलों में लोगों से उनके साथ-साथ उनके माता-पिता के जन्म और नागरिकता से जुड़े दस्तावेज़ भी मांगे गए.

आनंद तेलतुंबड़े का तर्क है कि चुनाव आयोग का संवैधानिक दायित्व मतदाता सूची तैयार करना और चुनाव कराना है, नागरिकता तय करना नहीं. संविधान के अनुच्छेद 5 से 11 तक नागरिकता के मूल प्रावधान तय करते हैं, जबकि अनुच्छेद 11 संसद को नागरिकता संबंधी कानून बनाने का अधिकार देता है. इसी के तहत नागरिकता अधिनियम, 1955 लागू हुआ और नागरिकता से जुड़े निर्णयों की जिम्मेदारी गृह मंत्रालय को सौंपी गई. ऐसे में यदि चुनाव आयोग दस्तावेज़ों के आधार पर किसी व्यक्ति की नागरिकता पर सवाल उठाता है, तो यह संवैधानिक अधिकारों की सीमा से जुड़ा गंभीर प्रश्न बन जाता है.

भारतीय नागरिकता कानून में समय-समय पर हुए संशोधनों ने भी स्थिति को अधिक जटिल बनाया है. शुरुआत में केवल भारत में जन्म लेना नागरिकता के लिए पर्याप्त था, लेकिन बाद में माता-पिता की नागरिकता और अवैध प्रवासी न होने जैसी शर्तें जोड़ दी गईं. इससे अलग-अलग समय में जन्मे लोगों के लिए नागरिकता के नियम अलग हो गए. करोड़ों भारतीय ऐसे सामाजिक और आर्थिक हालात में पैदा हुए, जहां जन्म प्रमाणपत्र, भूमि रिकॉर्ड या अन्य सरकारी दस्तावेज़ कभी बने ही नहीं. ऐसे लोगों के लिए दशकों पुराने दस्तावेज़ जुटाना लगभग असंभव चुनौती बन जाता है.

एक और बड़ा विरोधाभास यह है कि पासपोर्ट जारी करने से पहले पुलिस सत्यापन और कई स्तर की जांच होती है, फिर भी कानून की दृष्टि से पासपोर्ट नागरिकता का अंतिम प्रमाण नहीं माना जाता. यानी जिस दस्तावेज़ को दुनिया भारतीय पहचान के सबसे विश्वसनीय प्रमाण के रूप में स्वीकार करती है, वही भारत के भीतर नागरिकता साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है.

इस पूरी प्रक्रिया को लेकर विपक्षी दलों ने आरोप लगाया कि इसका सबसे अधिक असर अल्पसंख्यकों, प्रवासी मजदूरों, गरीबों और समाज के हाशिए पर रहने वाले समुदायों पर पड़ा. कुछ दलों ने इसे राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) की दिशा में बढ़ाया गया कदम बताया, जबकि सरकार और चुनाव आयोग का कहना है कि यह केवल मतदाता सूची को शुद्ध करने की नियमित प्रक्रिया है और इसका उद्देश्य पात्र मतदाताओं की सही पहचान सुनिश्चित करना है.

तेलतुंबड़े का निष्कर्ष है कि भारतीय लोकतंत्र के सामने सबसे बड़ा प्रश्न अब यह है कि यदि राज्य नागरिकों से नागरिकता का प्रमाण मांगता है, तो पहले यह स्पष्ट होना चाहिए कि वह प्रमाण आखिर है क्या. जब किसी नागरिक के पास ऐसा कोई दस्तावेज़ ही नहीं है जिसे कानून अंतिम प्रमाण मानता हो, तब दस्तावेज़ों के आधार पर मतदान के अधिकार को प्रभावित करना लोकतांत्रिक समानता पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है. उनके अनुसार लोकतंत्र केवल संस्थाओं के अस्तित्व से नहीं, बल्कि इस बात से मजबूत होता है कि हर नागरिक बिना असंभव दस्तावेज़ी बोझ के अपने संवैधानिक अधिकारों का उपयोग कर सके. यदि नागरिकता साबित करने की प्रक्रिया ही अस्पष्ट और कठिन बनी रहती है, तो लोकतंत्र की बुनियादी भावना कमजोर पड़ने का खतरा बना रहेगा.

आनंद तेलतुंबड़े एक भारतीय लेखक और मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं. यह लेख उनके मूल अंग्रेजी लेख का हिंदी में अनुदित अंश है

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