भारत में विशेष गहन मतदाता सूची पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर चुनावी प्रक्रिया और मताधिकार की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं. बिहार में 24 जून 2025 को यह प्रक्रिया शुरू होने के बाद से ही विपक्षी दलों और नागरिक संगठनों ने आरोप लगाया है कि मतदाता सूची को शुद्ध करने के नाम पर बड़े पैमाने पर पात्र मतदाताओं के नाम हटाए जा रहे हैं. ‘वोट बचाओ, देश बचाओ’ आंदोलन इसी चिंता से जुड़ा है. मूल लेख के अनुसार, 2026 में पश्चिम बंगाल, बिहार, असम, केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी में चुनावों से पहले लगभग 2.5 करोड़ मतदाताओं के नाम हटाए गए. इसे अवैध प्रवासियों की पहचान से जोड़ने के सरकारी दावों पर भी सवाल उठे.
मतदाता सूची से नाम हटाने पर विवाद
15 अक्टूबर 2026 को चुनाव आयोग ने 13 राज्यों और तीन केंद्रशासित प्रदेशों में एसआईआर पूरा होने की घोषणा की. लेख में दावा किया गया है कि इस प्रक्रिया के अलग-अलग चरणों में मतदाताओं के नाम हटाए जाने की दर बढ़ी और कुल मिलाकर लगभग 13 करोड़ मतदाता सूची से बाहर हुए या प्रभावित हुए. बिहार में 7.89 करोड़ मतदाताओं की जांच के बाद 65 लाख नाम हटाए गए. आयोग के हलफनामे में इन नामों को मृत, स्थानांतरित, अनुपस्थित और दोहरे नामों की श्रेणियों में रखा गया, लेकिन विदेशी नागरिकों के नाम हटाए जाने का कोई आंकड़ा नहीं दिया गया.
स्वतंत्र पत्रकारों की जांच का हवाला देते हुए कहा गया है कि एसआईआर में इस्तेमाल किए गए ईआरओनेट सॉफ्टवेयर में विदेशी नागरिकों को चिह्नित करने की अलग श्रेणी नहीं थी. संदिग्ध नागरिकता के आधार पर नोटिस पाने वाले कई लोगों ने दस्तावेज जमा किए और उनके नाम मतदाता सूची में बने रहे. इसके बावजूद अवैध प्रवासियों को हटाने के दावे किए गए, जिनके समर्थन में स्पष्ट आंकड़े सार्वजनिक नहीं किए गए. तेलंगाना में रोहिंग्या और अवैध मतदाताओं की संख्या को लेकर किए गए राजनीतिक दावों के समर्थन में भी सत्यापित प्रमाण सामने नहीं आए.
चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर दिल्ली, मुंबई और अन्य शहरों में प्रदर्शन हुए. पूर्व चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने चेतावनी दी कि यदि मतदाताओं को चुनावी संस्था की निष्पक्षता पर भरोसा नहीं रहेगा, तो चुनाव जीतने वालों की वैधता पर भी सवाल उठेंगे.
लेख में दावा किया गया है कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले दस महीनों में मतदाता सूची के प्रबंधन, नाम हटाने और प्रशासन के केंद्रीकरण से जुड़े प्रस्तावों पर कम से कम 14 बार आपत्तियां दर्ज कीं. हालांकि, चुनाव आयोग ने कहा कि उसके निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए थे. 26 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे में आयोग ने स्पष्ट किया कि किसी आयुक्त की व्यक्तिगत टिप्पणी या आपत्ति अपने आप में आयोग का निर्णय नहीं होती. इसके बावजूद आयोग की स्वतंत्रता और निर्णय प्रक्रिया को लेकर संदेह दूर नहीं हुए.
2023 में चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति संबंधी कानून में हुए बदलाव पर भी सवाल उठे. पहले नियुक्ति समिति में प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश शामिल थे. नए कानून में मुख्य न्यायाधीश की जगह एक केंद्रीय मंत्री को शामिल किया गया. आलोचकों का कहना है कि इससे केंद्र सरकार का प्रभाव बढ़ा. लेख में मुख्य चुनाव आयुक्त को कानूनी संरक्षण दिए जाने और आयोग की स्वायत्तता कमजोर होने की आशंका भी जताई गई है.
विरोध प्रदर्शन और सरकारी कार्रवाई
2 अक्टूबर को दिल्ली और मुंबई में एसआईआर के खिलाफ प्रदर्शन हुए. इसके बाद विपक्षी दलों और नागरिक संगठनों ने कई शहरों में आंदोलन तेज किया. 10 अक्टूबर को दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रस्तावित प्रदर्शन के लिए व्यापक पाबंदियां लगाई गईं. लेख के मुताबिक, 37 स्थानों पर बैरिकेड लगाए गए, आसपास के चार किलोमीटर के क्षेत्र में इंटरनेट सेवा बाधित हुई, 57 मेट्रो स्टेशन बंद किए गए और दिल्ली आने-जाने वाली 245 ट्रेनें रद्द की गईं. करीब 35 हजार पुलिस और अर्धसैनिक बलों की तैनाती का भी दावा किया गया. बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लेने और छात्रावासों, मस्जिदों तथा अन्य सार्वजनिक स्थानों पर लोगों को प्रदर्शन से दूर रहने की चेतावनी देने के आरोप लगे.
सुप्रीम कोर्ट ने सार्वजनिक जीवन बाधित होने पर चिंता जताई और लोगों की आवाजाही, मेट्रो तथा रेल सेवाएं सामान्य रखने और इंटरनेट सेवा बाधित न करने के निर्देश दिए. इसके बावजूद विरोध प्रदर्शनों और पुलिस कार्रवाई को लेकर विवाद जारी रहा. राहुल गांधी ने मतदाताओं से अपने अधिकारों की रक्षा के लिए आगे आने की अपील की. अभिजीत दीप्तके ने प्रधानमंत्री और चुनाव आयोग पर लोकतंत्र को नुकसान पहुंचाने तथा वोट चोरी करने का आरोप लगाया. ध्रुव राठी ने प्रक्रिया में पारदर्शिता और जवाबदेही की कमी पर सवाल उठाए, जबकि प्रकाश राज ने इसे नागरिकों के अधिकारों और सम्मान पर हमला बताया. बीजेपी ने विपक्ष पर विदेशी ताकतों के समर्थन से देश में अस्थिरता फैलाने का आरोप लगाया.
चुनावी व्यवस्था और लोकतंत्र का संकट
लेख में 2024 के लोकसभा चुनाव का उदाहरण देते हुए कहा गया है कि बीजेपी को 36.93 प्रतिशत मत मिले और उसने 240 सीटें जीतीं, लेकिन कुल पंजीकृत मतदाताओं के अनुपात में उसका समर्थन काफी कम था. बिहार विधानसभा चुनाव में भी मत प्रतिशत और सीटों के बीच अंतर को रेखांकित किया गया है. इसी आधार पर आनुपातिक प्रतिनिधित्व की मांग उठाई गई है, ताकि दलों को मिले मतों और विधानसभा या संसद में उनकी सीटों के बीच अधिक संतुलन हो.
दल-बदल, गठबंधन की राजनीति और चुनावी वादे पूरे न होने को भी लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व की कमजोरियों से जोड़ा गया है. लेख में कॉरपोरेट हितों और राजनीतिक सत्ता के गठजोड़ पर सवाल उठाते हुए तर्क दिया गया है कि केवल चुनाव कराना लोकतंत्र की गारंटी नहीं है. नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, निष्पक्ष चुनाव और स्वतंत्र संस्थाओं पर भरोसा भी मिलना चाहिए.
अंत में, पात्र मतदाताओं के नाम बिना शर्त बहाल करने, एसआईआर रद्द करने, चुनाव आयोग की स्वतंत्रता मजबूत करने और नियुक्तियों तथा मतदाता सूची प्रबंधन से जुड़े मनमाने प्रावधानों को समाप्त करने की मांग की गई है. लेख का निष्कर्ष है कि पुलिस और प्रशासनिक ताकत सरकार को सुरक्षा दे सकती है, लेकिन जनता का विश्वास केवल निष्पक्ष चुनाव, जवाबदेही और नागरिक अधिकारों की रक्षा से हासिल किया जा सकता है.
(डॉ. एस. जतीन कुमार पेशे से अस्थि रोग विशेषज्ञ हैं और सामाजिक कार्यकर्ता भी हैं. यह ‘काउंटरकरंट्स’ में प्रकाशित उनके मूल अंग्रेजी लेख का हिंदी में अनूदित सारांश है.)

