डॉ. अरुण मित्रा | भव्यता का भ्रम: 33 साल पहले दिवंगत स्वामी चिन्मयानंद से प्रधानमंत्री की बातचीत

'काउंटरकरंट्स' में डॉ. अरुण मित्रा लिखते हैं कि जब आत्म-महिमामंडन के लिए तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है, तो यह वैज्ञानिक दृष्टिकोण, तर्कसंगत सोच और लोकतांत्रिक मूल्यों को कमजोर करता है.

अपनी प्रशंसा करना कई लोगों की आदत होती है. लेकिन जब कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) का इस्तेमाल किसी दिवंगत व्यक्ति के साथ ऐसी बातचीत प्रस्तुत करने के लिए किया जाता है, जिसमें वह किसी राजनीतिक नेता की प्रशंसा करता दिखाई दे, तो यह तकनीक के दुरुपयोग और व्यक्तिपूजा को बढ़ावा देने जैसे गंभीर सवाल खड़े करता है.

23 अक्टूबर 2026 को नई दिल्ली के भारत मंडपम में चिन्मय मिशन द्वारा आयोजित चिन्मय अमृत महोत्सव ग्लोबल सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वामी चिन्मयानंद सरस्वती के एआई आधारित डिजिटल स्वरूप से बातचीत की. स्वामी चिन्मयानंद का निधन 1993 में हो गया था. इस प्रस्तुति को ‘होलोबॉट’ कहा गया. प्रधानमंत्री ने उससे आशीर्वाद मांगा, जबकि डिजिटल स्वरूप ने उनकी असाधारण प्रतिभा की प्रशंसा की.

समस्या तकनीक के माध्यम से किसी दिवंगत व्यक्ति की छवि या आवाज को दोबारा प्रस्तुत करने में नहीं है. शिक्षा और संस्कृति के क्षेत्र में इसके उपयोग हो सकते हैं. चिंता इस बात की है कि इसका इस्तेमाल किस उद्देश्य से किया जा रहा है. इस मामले में दिवंगत आध्यात्मिक नेता के डिजिटल स्वरूप के जरिए प्रधानमंत्री का महिमामंडन होता दिखाई दिया. एआई से तैयार स्वरूप के शब्दों को दिवंगत व्यक्ति का स्वतंत्र समर्थन नहीं माना जा सकता.

अंधविश्वास और बिना सवाल किए नायकों की पूजा करने वाले समाज में ऐसे आयोजन लोगों को प्रभावित कर सकते हैं. कार्यक्रम में शिक्षित और प्रभावशाली लोगों की उत्साहपूर्ण तालियों ने भी आलोचनात्मक सोच पर सवाल खड़े किए. शिक्षा का उद्देश्य तर्क, प्रमाण और स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता विकसित करना है, न कि लोगों को राजनीतिक प्रदर्शन का हिस्सा बनाना.

2027 में कई राज्यों में चुनाव होने हैं. ऐसे में नेता की असाधारण छवि बनाने वाले आयोजन बढ़ सकते हैं और बेरोजगारी, आर्थिक असमानता, सार्वजनिक स्वास्थ्य, शासन तथा लोकतांत्रिक जवाबदेही जैसे मुद्दों से ध्यान हट सकता है.

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 51ए(एच) में वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानवतावाद तथा जिज्ञासा और सुधार की भावना विकसित करना नागरिकों का मूल कर्तव्य बताया गया है. इसके बावजूद वैज्ञानिक प्रमाणों से रहित दावों को स्वीकार करने की प्रवृत्ति चिंता का विषय है. नरेंद्र दाभोलकर, गोविंद पानसरे और गौरी लंकेश जैसे तर्कवादी सामाजिक कार्यकर्ताओं की हत्याएं उन खतरों की याद दिलाती हैं, जिनका सामना स्थापित पूर्वाग्रहों को चुनौती देने वालों को करना पड़ता है.

प्रधानमंत्री बनने के कुछ समय बाद मोदी ने डॉक्टरों के सामने भगवान गणेश की कथा का उल्लेख करते हुए इसे प्राचीन भारत की उन्नत शल्य चिकित्सा का उदाहरण बताया था. हाथी का सिर मनुष्य के शरीर पर प्रत्यारोपित किए जाने की इस कथा के समर्थन में विश्वसनीय वैज्ञानिक प्रमाण नहीं थे. डॉक्टरों का इस पर तालियां बजाना निराशाजनक था. सांस्कृतिक परंपराओं का सम्मान करने का अर्थ पौराणिक कथाओं और वैज्ञानिक तथ्यों के बीच अंतर मिटाना नहीं है.

कोविड-19 महामारी के दौरान ‘गो कोरोना, गो कोरोना’ के नारे लगाने, ताली-थाली बजाने और मोबाइल की फ्लैशलाइट जलाने जैसे प्रतीकात्मक उपायों को भी काफी ध्यान मिला. लेकिन ये उपाय जांच, इलाज, टीकाकरण, पर्याप्त स्वास्थ्य सुविधाओं और वैज्ञानिक प्रमाणों पर आधारित संवाद का विकल्प नहीं हो सकते.

मोदी के नाली से निकलने वाली गैस से चाय बनाने के कथित अनुभव और बादलों की मौजूदगी से विमानों को रडार से बचाने संबंधी बयान पर भी सवाल उठे. उन्होंने स्वयं को ‘गैर-जैविक’ बताते हुए कहा था कि ईश्वर ने उन्हें भेजा है. ऐसे बयानों से किसी नेता को सामान्य मानवीय सीमाओं से परे दिखाने वाली छवि मजबूत हो सकती है.

आत्ममुग्धता से जुड़े व्यवहार में अपने महत्व को बढ़ा-चढ़ाकर देखना और लगातार प्रशंसा की अपेक्षा करना शामिल हो सकता है. हालांकि, नार्सिसिस्टिक पर्सनैलिटी डिसऑर्डर (एनपीडी) एक चिकित्सकीय निदान है. केवल सार्वजनिक बयानों के आधार पर किसी व्यक्ति को यह विकार होने का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता. फिर भी, राजनीति में अत्यधिक आत्म-महिमामंडन और बिना सवाल किए समर्थन के प्रभावों की जांच जरूरी है.

इतिहास में एडॉल्फ हिटलर और बेनिटो मुसोलिनी जैसे अधिनायकवादी नेताओं ने प्रचार, विशाल जनसभाओं और असहमति को दबाकर व्यक्तिपूजा को बढ़ावा दिया. ऐसी व्यवस्थाओं में संस्थाएं कमजोर हुईं और सार्वजनिक हितों के बजाय सत्ता में बैठे लोगों की महत्वाकांक्षाओं को प्राथमिकता मिली. व्यक्तिपूजा के माहौल में आलोचना को विश्वासघात समझा जा सकता है और असहमति जताने वालों को दुश्मन बताया जा सकता है.

जंतर-मंतर पर छात्रों और युवाओं के खिलाफ पुलिस कार्रवाई की खबरें लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा का महत्व याद दिलाती हैं. सरकार को आलोचना सुननी चाहिए और शांतिपूर्ण विरोध करने वालों के साथ संवाद करना चाहिए.

प्रधानमंत्री का पद जिम्मेदारी, विनम्रता और जवाबदेही की मांग करता है. सम्मान संवैधानिक दायित्व निभाने से मिलना चाहिए, न कि किसी नेता को अलौकिक या सामान्य मनुष्यों से श्रेष्ठ बताने से. एआई का उपयोग शिक्षा, वैज्ञानिक समझ, स्वास्थ्य सेवा और जनकल्याण के लिए होना चाहिए, न कि किसी नेता के लिए दैवीय समर्थन का आभास पैदा करने के लिए.

भारत का लोकतांत्रिक भविष्य ऐसे नागरिकों पर निर्भर करता है, जो सत्ता से सवाल पूछें, प्रमाण और मिथक में अंतर समझें तथा स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता बनाए रखें. नेतृत्व की वास्तविक कसौटी प्रशंसा की मात्रा नहीं, बल्कि संवैधानिक लोकतंत्र की रक्षा, नागरिक अधिकारों का संरक्षण, वैज्ञानिक दृष्टिकोण को बढ़ावा देना और आम लोगों के जीवन में सुधार लाना है. जब इन जिम्मेदारियों से अधिक महत्व आत्म-महिमामंडन को दिया जाता है, तो लोकतांत्रिक सार्वजनिक जीवन की बुनियाद खतरे में पड़ जाती है.
(डॉ. अरुण मित्रा चिकित्सक और लेखक हैं. यह उनके मूल अंग्रेजी लेख का हिंदी में अनुदित सारांश है.)

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