बड़े असर के लिए रहें तैयार: युद्ध की आशंकाओं से ऊर्जा बाज़ार में उथल-पुथल, भारत का तेल आयात बिल उछला
‘द टेलीग्राफ’ में परन बालकृष्णन की रिपोर्ट है कि मध्य पूर्व में भड़के भीषण सैन्य संघर्ष और वैश्विक भू-राजनीतिक उथल-पुथल ने विश्व ऊर्जा बाज़ार को संकट में डाल दिया है. इसका सबसे गहरा आर्थिक असर भारत जैसे ऊर्जा-आयात पर निर्भर देशों पर देखने को मिल रहा है. अमेरिका-ईरान के बीच बढ़ते टकराव, यमन के हूती विद्रोहियों की आक्रामक गतिविधियों और समुद्री व्यापार मार्गों में बाधाओं ने कच्चे तेल की कीमतों को बढ़ा दिया है, जिससे भारत का आयात बिल अत्यधिक बढ़ गया है.
पेट्रोलियम मंत्रालय के तिमाही आंकड़ों के अनुसार, जून तक की तीन महीनों की अवधि में भारत का कच्चा तेल आयात बिल पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में लगभग 60 प्रतिशत तक उछल गया है. यद्यपि आयात की कुल मात्रा में मामूली गिरावट आई थी, लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में ऊंची कीमतों ने इस कमी के प्रभाव को निष्प्रभावी कर दिया.
भारत अपनी कच्चे तेल की कुल आवश्यकता का लगभग 88 प्रतिशत आयात करता है. कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों ने भारत के व्यापार घाटे को और चौड़ा कर दिया है और सरकारी खजाने पर दबाव बढ़ा दिया है.
जून में भारत की उपभोक्ता मुद्रास्फीति बढ़कर 4.38 प्रतिशत हो गई, जो भारतीय रिजर्व बैंक के 4 प्रतिशत के मानक लक्ष्य से अधिक है. यदि तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहती हैं, तो इससे परिवहन लागत, खाद्य पदार्थ और घरेलू ऊर्जा बिल महंगे होंगे, जिससे पूरी अर्थव्यवस्था प्रभावित होगी.
वैश्विक तेल बाज़ार की चिंताओं के केंद्र में होर्मुज जलडमरूमध्य है, जहाँ से दुनिया के कुल तेल व्यापार का 20% हिस्सा गुज़रता है. भारत के कच्चे तेल आयात का 40%, एलएनजी का 60% और एलपीजी का 90% हिस्सा इसी संकरे समुद्री मार्ग से होकर आता है.
अमेरिकी सेना द्वारा ईरानी ठिकानों (मिसाइल डिपो, वायु रक्षा प्रणाली और तटीय निगरानी स्थलों) पर लगातार हमले किए जा रहे हैं. वहीं ओमान के तट पर जहाजों पर हमले और ईरानी सैन्य गतिविधियों के कारण इस जलमार्ग से जहाजों की आवाजाही नाटकीय रूप से घट गई है.
बीमा कंपनियों और शिपिंग कंपनियों की घबराहट के कारण इस मार्ग पर जहाजों का संचालन बेहद जोखिम भरा हो गया है, जिसे संभालने के लिए क्रू मेंबर्स को भारी बोनस का लालच दिया जा रहा है.
बढ़ते जोखिम के बावजूद, ऊर्जा विश्लेषक संस्थान 'केप्लर' के अनुसार, भारत की तत्काल तेल आपूर्ति सितंबर के मध्य तक अपेक्षाकृत सुरक्षित है. भारत ने रूस, वेनेजुएला और पश्चिम अफ्रीकी देशों से आयात बढ़ाकर अपने स्रोतों में विविधता ला दी है.
हालाँकि, यमन के हूती विद्रोहियों द्वारा सऊदी अरब के खिलाफ नौसैनिक नाकेबंदी की घोषणा के बाद बाज़ार में भारी तेज़ी देखी गई. ब्रेंट क्रूड $91 प्रति बैरल के पार चला गया. वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (डब्ल्यूटीआई) $85 प्रति बैरल को पार कर गया. हालाँकि, ईरान और अमेरिका के बीच 10 दिवसीय संभावित युद्धविराम की खबरों के बाद कीमतों में थोड़ी नरमी आई (ब्रेंट $88 और डब्ल्यूटीआई $82), फिर भी बाज़ार अत्यंत संवेदनशील बना हुआ है.
तेल संकट का प्रभाव केवल भारत तक सीमित नहीं है. अमेरिका में पेट्रोल की कीमतें $4 प्रति गैलन के पार चली गई हैं. गर्मियों के पीक ड्राइविंग सीज़न में बढ़ी कीमतों के कारण राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की जन-स्वीकार्यता गिरकर 37% पर आ गई है, जो आगामी मध्यावधि चुनावों के लिए एक बड़ा राजनीतिक झटका है.
यूक्रेन द्वारा रूसी रिफाइनरियों पर किए गए ड्रोन हमलों ने रूस के घरेलू उत्पादन को प्रभावित किया है, जिससे खुद रूस को गैसोलीन का आयात करना पड़ रहा है. अमेरिकी सीनेट में एक ऐसा विधेयक पेश किया गया है, जिसके तहत रूसी तेल या गैस खरीदने वाले देशों (भारत सहित) पर 100 प्रतिशत टैरिफ लगाने का प्रस्ताव है, ताकि रूस को युद्ध के लिए मिल रहे राजस्व को रोका जा सके. भारत इस कदम पर भी पैनी नज़र बनाए हुए है.

