भोजशाला विवाद के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देगी कमाल मौला मस्जिद समिति
कमाल मौला-भोजशाला विवाद पर मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के फैसले ने मुस्लिम संगठनों को झकझोर कर रख दिया है और भविष्य की राह को लेकर उन्हें अनिश्चितता में डाल दिया है. ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (एआईएमपीएलबी) ने इस फैसले को खारिज कर दिया है, जिसमें इस स्थान को सरस्वती मंदिर घोषित किया गया है और मस्जिद के याचिकाकर्ताओं से जमीन का एक अलग टुकड़ा तलाशने को कहा गया है; वहीं कमाल मौला मस्जिद समिति इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देगी. इस कदम को एआईएमपीएलबी का समर्थन हासिल है.
‘द हिंदू’ में ज़िया उस सलाम की रिपोर्ट है कि जमात-ए-इस्लामी हिंद भी "अपील की संभावना" तलाश रही है. इसके नेतृत्व का मानना है कि "इस मामले को अलग करके नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि इसे एक व्यापक प्रवृत्ति के हिस्से के रूप में देखा जाना चाहिए, जिसमें उपासना स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991 की अनदेखी करते हुए धार्मिक स्थलों से जुड़े विवादों को दोबारा खोला जा रहा है."
इसी दौरान, जमीयत उलेमा-ए-हिंद (जेआईएच) ने 'साउथ एशियन माइनॉरिटीज लॉयर्स एसोसिएशन' के सहयोग से एक सम्मेलन आयोजित किया, जिसमें बाबरी मस्जिद के फैसले और उपासना स्थल अधिनियम, 1991 पर एक रिपोर्ट प्रस्तुत की गई. रिपोर्ट में इस बात को दोहराया गया कि उपासना स्थल अधिनियम, 1991 ऐतिहासिक धार्मिक विवादों को दोबारा खुलने से रोककर भारत के धर्मनिरपेक्ष ढांचे, सांप्रदायिक सद्भाव और संवैधानिक स्थिरता की रक्षा करने में केंद्रीय महत्व रखता है.
अयोध्या का फैसला
यह रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण फैसलों, विशेष रूप से इस्माइल फारूकी मामले (1994) और एम. सिद्दीक (अयोध्या फैसला 2019) का विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत करती है. इसमें तर्क दिया गया है कि इस्माइल फारूकी के फैसले में की गई व्याख्या—जिसमें कहा गया था कि मस्जिद इस्लाम का अनिवार्य हिस्सा नहीं है—का बाद के मामलों पर गहरा असर पड़ा.
जमीयत के अध्यक्ष महमूद मदनी ने कहा, "मुसलमानों द्वारा संवैधानिक प्रतिबद्धता के साथ सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर प्रतिक्रिया देने के बावजूद, ज्ञानवापी, मथुरा ईदगाह, कमाल मौला मस्जिद और अन्य धार्मिक स्थलों से जुड़े नए विवाद खड़े कर दिए गए, जिसने इस मुद्दे को भारत की संवैधानिक पहचान से जुड़ा मामला बना दिया है."
संविधान के अनुच्छेद 25-26 की स्थिति की ओर ध्यान आकर्षित करते हुए जेआईएच के अध्यक्ष सदातुल्लाह हुसैनी ने कहा कि इस फैसले का देश में "न्यायिक प्रणाली की विश्वसनीयता, अल्पसंख्यक अधिकारों और धार्मिक स्वतंत्रता" पर "गंभीर असर" पड़ेगा.
हुसैनी ने कहा, “दशकों से, भोजशाला परिसर एक ऐसी व्यवस्था के तहत काम कर रहा था, जिसने दोनों समुदायों को अपनी-अपनी धार्मिक प्रथाओं का पालन करने की अनुमति दी थी. दूसरी कम्युनिटी (समुदाय) के पक्ष में एक समुदाय के स्थापित पूजा/इबादत के अधिकारों को हटाना न केवल एक लंबे समय से चली आ रही व्यवस्था को बाधित करता है, बल्कि सभी धर्मों के लिए समान सम्मान के सिद्धांत को भी कमजोर करने का जोखिम उठाता है. मुस्लिम समुदाय को उनके स्थापित उपासना स्थल के बदले वैकल्पिक भूमि आवंटित करने का सुझाव भी चिंताजनक है.”
उन्होंने समीक्षा याचिका की संभावना से इनकार नहीं किया और कहा, “न्यायपालिका को न केवल अपने कार्यों में निष्पक्ष होना चाहिए, बल्कि उसे निष्पक्ष दिखना भी चाहिए. दुर्भाग्य से, हाल के घटनाक्रम इसके विपरीत एक धारणा बना रहे हैं.”
एक अलग प्रेस विज्ञप्ति में, एआईएमपीएलबी के प्रवक्ता एस.क्यू.आर. इलियास ने कहा कि उच्च न्यायालय का फैसला ऐतिहासिक साक्ष्यों, राजस्व रिकॉर्ड, औपनिवेशिक काल के आधिकारिक दस्तावेजों, गजेटियर्स और इस स्थल के साथ सदियों पुराने मुस्लिम धार्मिक जुड़ाव की अनदेखी करके दिया गया है.
इलियास ने कहा, “भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के अपने पिछले रुख ने इस स्थल के साझा धार्मिक चरित्र को स्वीकार किया था. दशकों तक, एएसआई के आधिकारिक रिकॉर्ड और साइनबोर्ड पर इस स्थल को 'भोजशाला / कमाल मौला मस्जिद' के रूप में वर्णित किया गया था, जो इसकी विवादित और साझा धार्मिक स्थिति की आधिकारिक मान्यता थी. इसके अलावा, 2003 की प्रशासनिक व्यवस्था के तहत, हिंदुओं को मंगलवार को पूजा करने की अनुमति थी, जबकि मुस्लिमों को शुक्रवार की नमाज अदा करने की अनुमति दी गई थी. यह व्यवस्था अपने आप में एक स्पष्ट स्वीकारोक्ति थी कि एएसआई दोनों समुदायों के ऐतिहासिक दावों और पूजा/इबादत के अधिकारों को मान्यता देता है. इसलिए, इस व्यवस्था को समाप्त करने का उच्च न्यायालय का निर्णय एएसआई के अपने पिछले रुख से विचलन (पीछे हटना) है.”

