मोदी का ‘विपक्ष-मुक्त’ भारत: दिल्ली दरबार ने बंगाल में सत्ता परिवर्तन की पटकथा कैसे रची

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक और स्तंभकार पी. रमन ने ‘द वायर’ में पश्चिम बंगाल चुनाव नतीजों की व्याख्या की है. अंग्रेजी में उनके लंबे लेख का हम यहाँ हिंदी में अनुदित सारांश पेश कर रहे हैं. रमन ने लिखा है: आदि शंकराचार्य का 'सर्प-रज्जु न्याय' (साँप और रस्सी का सादृश्य) सत्य के दो स्तरों को प्रतिपादित करता है: एक वह जो आम आदमी देखता है, और दूसरा परम सत्य. आज के दौर में मुख्यधारा का मीडिया केवल वही दिखाता है जो प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) चाहता है. 4 मई को घोषित चुनाव परिणामों के बाद सरकार समर्थक मीडिया ने विश्लेषण किया कि जनता ने बेरोजगारी, महंगाई और बुनियादी सुविधाओं के अभाव के कारण भाजपा को वोट दिया. युवा और महिला मतदाताओं ने नई 'डबल इंजन' सरकार में बेहतर भविष्य देखा.

परंतु, इस वफादार मीडिया ने नए मुख्यमंत्री सुवेन्दु अधिकारी के दागी अतीत को छिपा दिया, जिनका नाम शारदा पोंजी और नारदा जैसे बड़े घोटालों में आ चुका है. कभी भाजपा ने ही उन्हें 'चोर' कहा था और ममता बनर्जी ने आरोप लगाया था कि वे जांच से बचने के लिए 'मोदी की वाशिंग मशीन' में कूद गए. मीडिया ने केरल में वामपंथ की हार के लिए पिनाराई विजयन के 'केंद्रीकृत मॉडल' की आलोचना की, लेकिन मोदी-शाह जोड़ी की अत्यंत केंद्रित सत्ता प्रणाली पर चुप्पी साधे रखी.

पश्चिम बंगाल में जीत के लिए अमित शाह ने केंद्रीय बलों के लगभग 2.5 लाख जवान तैनात किए, जिन्होंने सभी 61,636 मतदान केंद्रों को कवर किया. कुछ जिलों में तो हर 140 मतदाताओं पर एक सशस्त्र अधिकारी तैनात था. इसके अतिरिक्त राज्य पुलिस, सैकड़ों निर्वाचन पर्यवेक्षक और राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) की टीमें सड़कों पर विपक्षी कार्यकर्ताओं को निशाना बना रही थीं.

तृणमूल कांग्रेस का आरोप है कि चुनाव आयोग के पर्यवेक्षकों और केंद्रीय बलों ने खुले तौर पर स्थानीय भाजपा कार्यकर्ताओं के इशारों पर काम किया. कोलकाता के साइंस सिटी में केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों के प्रमुखों की एक अभूतपूर्व बैठक हुई, जिसे ममता बनर्जी ने 'सैन्य-शैली में तख्तापलट' की योजना और 'चुनावी आतंकवाद' करार दिया. इस प्रकार, निष्पक्ष रहने के बजाय चुनाव आयोग और सुरक्षा बल खुद विपक्ष के सीधे विरोधी बन गए.

भाजपा की इस बंगाल विजय से कुछ महत्वपूर्ण राजनैतिक परिणाम सामने आए हैं: अमित शाह का बढ़ता कद: सत्तारूढ़ दल के पदानुक्रम में शाह का कद बहुत बढ़ गया है. अब मोदी उनके बिना कोई राजनीतिक पहल नहीं कर सकते. एक बड़े राज्य के रूप में अब भाजपा बंगाल से संसद में 30 से अधिक सांसद जुटा सकती है. भाजपा ने हिंदू ध्रुवीकरण तो कर लिया, लेकिन हिंदी बेल्ट के विपरीत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) अभी भी बंगाल के सामाजिक-आर्थिक ताने-बाने पर हावी नहीं हो सका है, जो शाह के लिए एक चुनौती होगी.

बंगाल की राजनीति में हमेशा से माफिया हावी रहे हैं, जो पहले वामपंथ और फिर टीएमसी के सुरक्षा कवच बने. इस बार भाजपा ने अपनी 'जीतने वाली छवि' से इनके बड़े हिस्से को अपने पाले में कर लिया.  आर.जी. कर अस्पताल जैसी घटनाओं से बचने के लिए शाह इन अनियंत्रित तत्वों को कैसे संभालते हैं, यह देखना होगा.

पारंपरिक रूप से बंगाल में अनुशासनहीन और व्यक्तिवादी राजनैतिक कैडर रहे हैं.अन्य राज्यों की तरह यहाँ केंद्रीय आलाकमान के लिए सूचियां थोपना आसान नहीं रहा है और हमेशा आंतरिक असंतोष उभरता रहा है.

स्वतंत्रता के बाद पहली बार, पश्चिम बंगाल दिल्ली के अधीन हो जाएगा. बी.सी. रॉय और ज्योति बसु जैसे दिग्गजों द्वारा शासित रहा यह राज्य अब अमित शाह की व्यक्तिगत मंजूरी के बिना नहीं चल सकेगा. मुख्यमंत्री सुवेन्दु अधिकारी ने शपथ लेते ही मोदी-शाह पर तारीफों की बौछार कर दी, लेकिन उनके सामने असंतुष्ट तत्वों को संभालकर एकजुट प्रशासन चलाने की बड़ी चुनौती है.

इस बदले माहौल में, राज्य की 27% मुस्लिम आबादी इस मॉडल की तात्कालिक शिकार बनेगी. मतों के बिखराव के कारण विधानसभा में मुस्लिम विधायकों की संख्या 59 से घटकर 37 रह गई है. खंडित जनादेश और व्यक्ति-पूजा के इस दौर में, यह भारत के बदलते राजनीतिक समीकरणों और सत्ता के खेल की बानगी है.

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