गीतांजलि जे. आंगमो | लद्दाख प्रतिनिधित्व के ज़रिए अपनेपन की तलाश में 

यह दुखद और विडंबनापूर्ण दोनों है कि भारत सरकार का गृह मंत्रालय यह तर्क देता है कि लद्दाख को विधानसभा या छठी अनुसूची के तहत मजबूत संवैधानिक सुरक्षा की बजाय अधिक ज़िलों की ज़रूरत है. मंत्रालय का कहना है कि लद्दाख की कम आबादी, उसकी रणनीतिक संवेदनशीलता और केंद्र पर आर्थिक निर्भरता ऐसी परिस्थितियाँ हैं जिनकी वजह से वहां विधानसभा की आवश्यकता नहीं है. इसके बदले अतिरिक्त ज़िलों के ज़रिए प्रशासनिक विकेंद्रीकरण को व्यावहारिक विकल्प के रूप में पेश किया जा रहा है.

यह तर्क मूल रूप से त्रुटिपूर्ण है और लोकतंत्र की बेहद सीमित समझ को दर्शाता है. बहुत समय पहले ब्रिटिश साम्राज्य भी यही दावा करता था कि भारतीयों में आत्मशासन की परिपक्वता और संस्थागत क्षमता नहीं है. कहा जाता था कि भारतीय बहुत गरीब, अशिक्षित और विभाजित हैं, इसलिए वे स्वयं शासन नहीं कर सकते. ऐसे ही औपनिवेशिक संरक्षणवाद के खिलाफ श्री अरविंद ने पूर्ण स्वराज की अवधारणा को राष्ट्रीय गरिमा और आत्मपहचान का प्रश्न बनाया था. इतिहास ने ब्रिटिशों को गलत साबित किया.

लेकिन स्वतंत्रता के लगभग 80 वर्ष बाद भी यह कहना कि लद्दाख को विधानसभा की बजाय कुछ ज़िलों से संतुष्ट हो जाना चाहिए, उसी औपनिवेशिक सोच की गूंज है, बस अब वह राष्ट्रवाद की भाषा में व्यक्त की जा रही है. क्या लद्दाखियों को अब भी यह साबित करना पड़ेगा कि वे पर्याप्त संख्या में हैं, पर्याप्त लाभदायक हैं और राजनीतिक प्रतिनिधित्व के योग्य हैं? क्या किसी क्षेत्र का भौगोलिक रूप से विशाल, कम आबादी वाला और रणनीतिक रूप से संवेदनशील होना उसे विधानसभा के अधिकार से वंचित कर देता है?

हाल ही में लद्दाख में पाँच नए ज़िलों नुब्रा, चांगथांग, शाम, ज़ांस्कर और द्रास की घोषणा को एक बड़े प्रशासनिक सुधार के रूप में प्रस्तुत किया गया. निश्चित रूप से, लगभग 59,000 वर्ग किलोमीटर में फैले ऊँचाई वाले इस क्षेत्र में प्रशासनिक पहुंच महत्वपूर्ण है. पहाड़ी दर्रों और कठिन सर्दियों से अलग-थलग पड़े गाँवों को स्थानीय प्रशासनिक व्यवस्था की आवश्यकता होती है. लेकिन केवल ज़िले बना देना लोकतंत्र नहीं है.

ज़िले भूमि संरक्षण, जनसांख्यिकीय सुरक्षा, पारिस्थितिकी संरक्षण, रोजगार प्राथमिकता, सांस्कृतिक स्वायत्तता, नवीकरणीय ऊर्जा समझौते, शिक्षा नीति या क्षेत्र के दीर्घकालिक विकास दृष्टिकोण पर कानून नहीं बना सकते. ज़िले प्रशासन के उपकरण हैं, जबकि विधानसभाएँ प्रतिनिधित्व के साधन होती हैं. ज़िला अधिकारी नीतियों को लागू करता है, लेकिन विधानसभा लोगों के भविष्य को आकार देती है. ज़िला प्रशासन ऊपर की नौकरशाही को जवाब देता है, जबकि विधानसभा जनता के प्रति जवाबदेह होती है. प्रशासनिक सुविधा कभी भी राजनीतिक अधिकारों का विकल्प नहीं हो सकती.

सबसे चिंताजनक बात यह है कि भारत सरकार ने स्वयं लद्दाख को संवैधानिक सुरक्षा देने का वादा किया था. 2019 में अनुच्छेद 370 हटाने और लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश बनाने के बाद छठी अनुसूची के तहत सुरक्षा देने की बात भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने सार्वजनिक रूप से कही थी. यह वादे 2019 और 2020 के चुनावी घोषणापत्रों में भी शामिल थे.

लेकिन चुनाव जीतने के बाद सरकार अपने वादों से पीछे हटती दिखाई दी. इससे एक गंभीर नैतिक प्रश्न खड़ा होता है कि क्या सीमावर्ती इलाकों से किए गए वादे चुनाव खत्म होने के बाद महत्वहीन हो जाते हैं?

अगर सरकार यह कहती है कि लद्दाख सीमा क्षेत्र होने के कारण आत्मशासन के योग्य नहीं है, तो यह तर्क भी कमजोर पड़ जाता है. अरुणाचल प्रदेश चीन की सीमा से लगा अत्यंत संवेदनशील क्षेत्र है. वह भौगोलिक रूप से विशाल, कम आबादी वाला और आर्थिक रूप से केंद्र पर निर्भर राज्य है. फिर भी 1987 में उसे पूर्ण राज्य का दर्जा दिया गया. भारत ने तब यह समझा था कि सीमावर्ती क्षेत्रों को केवल सेना या नौकरशाही के सहारे नहीं जोड़ा जा सकता. जिन लोगों को राजनीतिक सम्मान और संवैधानिक अधिकार मिलते हैं, वे राष्ट्र की रक्षा अधिक मजबूती से करते हैं.

नागालैंड, मिजोरम, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश जैसे राज्यों को भी कम आबादी और आर्थिक निर्भरता के बावजूद राज्य का दर्जा मिला. भारत ने कभी यह नहीं कहा कि वे बहुत छोटे या गरीब हैं, इसलिए उन्हें विधानसभा की ज़रूरत नहीं. भारत ने यह समझा कि सीमावर्ती क्षेत्रों को जोड़ने का सबसे मजबूत तरीका उन्हें सम्मान और प्रतिनिधित्व देना है.

आर्थिक तर्क भी उतना ही कमजोर है. यह कहना कि लद्दाख पर्याप्त राजस्व उत्पन्न नहीं कर सकता, इसलिए उसे विधानसभा नहीं चाहिए, भारतीय संघीय ढांचे की मूल भावना के खिलाफ है. भारत की संघीय व्यवस्था ही संसाधनों के पुनर्वितरण पर आधारित है. कई बड़े राज्य भी केंद्र से भारी आर्थिक सहायता प्राप्त करते हैं. उत्तर प्रदेश, बिहार, असम और पूर्वोत्तर के कई राज्य अपने खर्चों के लिए बड़े पैमाने पर केंद्र पर निर्भर हैं. फिर भी कोई यह नहीं कहता कि उन्हें अपनी विधानसभा छोड़ देनी चाहिए.

दिलचस्प बात यह है कि जिस लद्दाख को आर्थिक रूप से महत्वहीन बताया जा रहा है, उसी क्षेत्र में भारत की सबसे बड़ी नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं की योजना बनाई जा रही है. चांगथांग के पांग क्षेत्र में प्रस्तावित परियोजना लगभग 13 गीगावाट बिजली उत्पादन की क्षमता रखती है. इसमें लगभग 50,000 करोड़ रुपये का निवेश और सालाना 7,000 करोड़ रुपये की संभावित आय बताई जा रही है. यह किसी महत्वहीन क्षेत्र का गणित नहीं, बल्कि भारत के ऊर्जा भविष्य का केंद्र बनने जा रहे क्षेत्र की तस्वीर है.

आज लद्दाखी यह देख रहे हैं कि सौर ऊर्जा पार्क, ट्रांसमिशन कॉरिडोर, खनन, पर्यटन विस्तार और भूमि उपयोग से जुड़े फैसले उनके ऊपर थोपे जा रहे हैं. असली सवाल यह है कि इस परिवर्तन की शर्तें कौन तय करेगा? चरवाहों के चराई अधिकार, स्थानीय रोजगार, पर्यावरणीय सीमाएँ और आने वाली पीढ़ियों के हितों की रक्षा कौन करेगा? यह काम किसी ज़िला अधिकारी का नहीं, बल्कि जनता के प्रति जवाबदेह विधानसभा का होता है.

असल मुद्दा यही है. भारत की ताकत केवल प्रशासनिक व्यवस्था नहीं, बल्कि उसकी संवैधानिक कल्पनाशक्ति रही है, जिसने विविधताओं को एक संघ में जगह दी. छठी अनुसूची भी इसी सोच का परिणाम थी, जिसने यह स्वीकार किया कि सीमावर्ती और विशिष्ट क्षेत्रों को विशेष सुरक्षा की आवश्यकता होती है. समानता का अर्थ एकरूपता नहीं होता.

लद्दाख भारत से कम जुड़ना नहीं चाहता, बल्कि और अधिक गहराई से जुड़ना चाहता है — एक ऐसे क्षेत्र के रूप में नहीं जिसे दूर से नियंत्रित किया जाए, बल्कि ऐसे समाज के रूप में जो अपने भविष्य को स्वयं आकार दे सके. यही अंतर सबसे अधिक महत्वपूर्ण है.

श्री अरविंदो ने लिखा था कि स्वतंत्रता वह वातावरण है जिसमें किसी राष्ट्र की आत्मा विकसित होती है. भारत की आत्मा अक्सर उसके सीमांत क्षेत्रों में सबसे मजबूत दिखाई देती है, जहाँ लोगों ने कठिनाइयों और बलिदानों के बावजूद भारत का साथ चुना. किसी गणराज्य की शक्ति इस बात से नहीं मापी जाती कि वह अपनी सीमाओं को कितना कसकर नियंत्रित करता है, बल्कि इस बात से मापी जाती है कि उसके सबसे दूरस्थ क्षेत्र भी खुद को उस राष्ट्र का हिस्सा कितना महसूस करते हैं.

आज लद्दाख से उठ रही आवाज कोई विशेषाधिकार की मांग नहीं है, बल्कि अपने भविष्य पर भरोसा किए जाने की शांत अपील है.

गीतांजलि जे. आंगमो हिमालयन इंस्टीट्यूट ऑफ अल्टरनेटिव्स, लद्दाख की संस्थापक हैं. वह एक शिक्षा सुधारक और सार्वजनिक चिंतक हैं, जो जमीनी नेतृत्व और नवाचार के माध्यम से शिक्षा, लोकतंत्र, पारिस्थितिकी और हिमालयी क्षेत्रों के भविष्य को नए दृष्टिकोण से गढ़ने की दिशा में काम कर रही हैं.

Previous
Previous

बांग्लादेश भेजे गए लोगों को वापस लाएगा केंद्र, नागरिकता की होगी जांच : सुप्रीम कोर्ट में सरकार 

Next
Next

बंगाल में ओबीसी आरक्षण को क्यों खत्म कर रही है भाजपा