बांग्लादेश भेजे गए लोगों को वापस लाएगा केंद्र, नागरिकता की होगी जांच : सुप्रीम कोर्ट में सरकार 

‘द टेलीग्राफ’ ऑनलाइन के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट में शुक्रवार को केंद्र सरकार ने कहा कि वह कुछ ऐसे लोगों को भारत वापस लाएगी जिन्हें कथित तौर पर बांग्लादेश भेज दिया गया था. इसके बाद उनकी भारतीय नागरिकता के दावों की जांच की जाएगी. यह मामला कलकत्ता उच्च न्यायालय के उस आदेश से जुड़ा है, जिसमें सुनाली खातून और अन्य लोगों को बांग्लादेश भेजने के फैसले को “अवैध” बताया गया था.

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के सामने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि मामले की विशेष परिस्थितियों को देखते हुए सरकार ने संबंधित लोगों को वापस लाने का फैसला किया है. उन्होंने कहा कि यह फैसला किसी दूसरे मामले के लिए मिसाल नहीं माना जाएगा.

मेहता ने अदालत से कहा, “सरकार उन्हें वापस लाएगी और फिर उनकी स्थिति की जांच करेगी. जांच के आधार पर आगे की कार्रवाई होगी.” केंद्र ने बताया कि इन लोगों को वापस लाने में आठ से दस दिन लग सकते हैं. अदालत ने मामले की अगली सुनवाई जुलाई में तय की है.

इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने “मानवीय आधार” पर सुनाली खातून और उसके आठ वर्षीय बच्चे को भारत आने की अनुमति दी थी. अदालत ने पश्चिम बंगाल सरकार को बच्चे की देखभाल करने और गर्भवती सुनाली खातून को मुफ्त चिकित्सा सहायता देने का निर्देश भी दिया था.

सुनाली खातून के पिता भोधू शेख की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल और संजय हेगड़े पेश हुए थे. उन्होंने कहा था कि केंद्र सरकार ने लंबे समय तक अदालत को अपनी स्पष्ट राय नहीं बताई.

भोधू शेख का आरोप है कि उनका परिवार पिछले दो दशकों से दिल्ली के रोहिणी इलाके में दिहाड़ी मजदूर के रूप में रह रहा था. पिछले साल जून में पुलिस ने उन्हें बांग्लादेशी होने के संदेह में हिरासत में लिया और बाद में सीमा पार भेज दिया.

कलकत्ता उच्च न्यायालय ने सितंबर 2025 में सुनाली खातून और स्वीटी बीबी समेत छह लोगों को बांग्लादेश भेजने के फैसले को रद्द कर दिया था. अदालत ने कहा था कि उन्हें “अवैध प्रवासी” मानकर जल्दबाजी में कार्रवाई की गई.

उच्च न्यायालय ने केंद्र को निर्देश दिया था कि निर्वासित लोगों को एक महीने के भीतर भारत वापस लाया जाए. अदालत ने यह भी कहा था कि अधिकारियों ने गृह मंत्रालय के दिशा-निर्देशों का पालन नहीं किया.

गृह मंत्रालय के नियमों के अनुसार, किसी भी व्यक्ति को निर्वासित करने से पहले संबंधित राज्य या केंद्र शासित प्रदेश सरकार को जांच करनी होती है. लेकिन अदालत ने पाया कि इस मामले में प्रक्रिया का पालन किए बिना जल्दबाजी में कार्रवाई की गई.

अदालत ने अपने आदेश में कहा था कि जिन लोगों को भेजा गया, उनके परिवार पश्चिम बंगाल में रहते हैं और अधिकारियों की “अतिउत्साही” कार्रवाई न्यायिक माहौल को प्रभावित कर सकती है.

यह मामला अब केवल नागरिकता या अवैध प्रवासन तक सीमित नहीं रह गया है. इसमें पुलिस कार्रवाई, मानवीय अधिकार और न्यायिक प्रक्रिया से जुड़े बड़े सवाल भी उठ रहे हैं.

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