आकार पटेल | लोकतांत्रिक गिरावट
5 मार्च 2021 को, भारत सरकार के प्रेस इंफॉर्मेशन ब्यूरो (PIB) ने एक बयान जारी किया था, जिसकी हेडलाइन थी: 'फ्री कंट्री के रूप में भारत की गिरती स्थिति पर फ्रीडम हाउस की रिपोर्ट का खंडन'.
यह 1941 में बने एक अमेरिकी थिंक टैंक की उस रिपोर्ट के जवाब में था, जिसमें कहा गया था कि भारत असल में लोकतांत्रिक नहीं है और सिर्फ 'आंशिक रूप से आज़ाद' (partly free) है. कई जाने-माने ग्लोबल संस्थानों की ऐसी ही कई रिपोर्ट्स आई थीं. हम इस वाली रिपोर्ट पर इसलिए फोकस कर रहे हैं क्योंकि सरकार ने इस पर अपना जवाब दिया था.
सरकार के बयान की शुरुआत चुनावी प्रक्रिया के बचाव से हुई और उसमें कहा गया: 'भारत के संघीय ढांचे (federal structure) के तहत कई राज्यों में राष्ट्रीय स्तर की पार्टी के अलावा दूसरी पार्टियों का शासन है. यह एक स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव प्रक्रिया के ज़रिए होता है जिसे एक स्वतंत्र चुनाव संस्था करवाती है. यह एक जीवंत लोकतंत्र (vibrant democracy) के काम करने का तरीका दिखाता है, जो अलग-अलग विचार रखने वालों को भी जगह देता है.'
यह बात बेईमानी से भरी थी. फ्रीडम हाउस की रिपोर्ट के दो हिस्से थे. पहला, जिसका वेटेज 40 प्रतिशत था, वह राजनीतिक अधिकारों (political rights) के बारे में था. इसमें, भारत को 40 में से 34 नंबर मिले (जो 2023 में गिरकर 33/40 हो गए), जिसमें स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव, चुनाव आयोग की निष्पक्षता, राजनीतिक पार्टियाँ बनाने की आज़ादी और विपक्ष को अपनी ताकत बढ़ाने के मौकों के लिए पूरे नंबर शामिल थे. इस हिस्से में, भारत को इस बात पर पूरे नंबर नहीं मिले कि क्या वोटिंग के दौरान हिंसा या सांप्रदायिक तनाव का कोई असर नहीं था. इस पर शायद ही कोई बहस हो सकती है. असल में, सरकार को ट्रांसपेरेंसी (पारदर्शिता) के लिए भी 4 में से 3 नंबर मिले, जो शायद सरकार पर मेहरबानी ही थी.
इसलिए सरकार का जवाब सिर्फ़ उसी बात को दोहरा रहा था जो फ्रीडम हाउस पहले ही कह चुका था. भारत की रेटिंग असल में बाकी बचे 60 प्रतिशत वाले हिस्से में गिरी थी, जो नागरिक स्वतंत्रता (civil liberties) से जुड़ा था, और यह भी आज़ादी का एक ज़रूरी हिस्सा है.
यहाँ, भारत का प्रदर्शन खराब रहा (60 में से 33). अभिव्यक्ति की आज़ादी, धर्म की आज़ादी, अकैडमिक आज़ादी, इकट्ठा होने की आज़ादी, NGO के काम करने की आज़ादी (रिपोर्ट में खास तौर पर एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया पर सरकार के हमले का ज़िक्र था), कानून का राज, न्यायपालिका की स्वतंत्रता और पुलिस द्वारा कानूनी प्रक्रिया के पालन जैसे मुद्दों पर भारत की रेटिंग खराब थी. लेकिन ये नंबर सिर्फ़ ज़मीनी हकीकत दिखा रहे थे.
सरकार इन नतीजों से बौखलाई हुई दिखी. इसने मंत्रालयों से उन पैमानों की जानकारी माँगी जिनका इस्तेमाल 'द इकोनॉमिस्ट इंटेलिजेंस यूनिट' ने भारत को डाउनग्रेड करके 'दोषपूर्ण लोकतंत्र' (flawed democracy) बताने के लिए किया था, भले ही रिपोर्ट में साफ़ तौर पर कहा गया था कि इसका 'मुख्य कारण नागरिक स्वतंत्रता का खत्म होना' और नागरिकता कानूनों में धर्म को शामिल करना था.
2025 की घटनाओं के आधार पर, 2026 में ये नंबर और भी गिर गए हैं. राजनीतिक अधिकारों की रेटिंग अब 31/40 और नागरिक स्वतंत्रता की 31/60 हो गई है, जो भारत को अब तक मिले सबसे कम नंबर हैं. ऐसा लगता है कि पिछले कुछ महीनों की घटनाओं से देश के नंबर और उसकी अंतर्राष्ट्रीय छवि को और नुकसान पहुँचेगा. मैं ऐसा क्यों कह रहा हूँ?
भारत को एक लोकतांत्रिक देश माना जाता था क्योंकि इसकी संस्थाएँ सुरक्षित थीं और उन्हें काफी हद तक न्यूट्रल (तटस्थ), काफी कुशल और आम तौर पर निष्पक्ष माना जाता था, बिल्कुल वैसे ही जैसे ज़्यादातर स्थापित लोकतंत्रों में होता है. फ्रीडम हाउस का स्कोर भी यही बात दिखाता है.
इस सवाल पर कि, 'क्या सरकार के मौजूदा मुखिया या दूसरे मुख्य राष्ट्रीय अधिकारी स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों के ज़रिए चुने गए थे?', फ्रीडम हाउस का निष्कर्ष था कि 'कार्यकारी चुनाव और चयन प्रक्रियाओं को आम तौर पर स्वतंत्र और निष्पक्ष माना जाता है' और उसने भारत को 4/4 नंबर दिए.
इस सवाल पर कि, 'क्या मौजूदा राष्ट्रीय विधायी प्रतिनिधि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों के ज़रिए चुने गए थे?', भारत ने फिर से 4/4 नंबर हासिल किए, और यह टिप्पणी की गई कि 'चुनावों को आम तौर पर स्वतंत्र और निष्पक्ष माना गया, हालाँकि चुनाव प्रचार के नियमों के उल्लंघन की कुछ खबरें भी आई थीं'.
भारत को इस सवाल पर 4 में से 3 नंबर मिले कि, 'क्या चुनावी कानून और ढाँचा निष्पक्ष हैं, और क्या संबंधित चुनाव प्रबंधन संस्थाएँ उन्हें निष्पक्षता से लागू करती हैं?'
और यहाँ वह सबसे अहम पैराग्राफ है, जो कहता है कि 2025 में विपक्षी पार्टियों की चिंताएँ और बढ़ गईं:
'2025 में चिंताएँ तब और बढ़ गईं जब सरकार ने बिहार की तरह ही अपनी वोटर लिस्ट के स्पेशल इंटेंसिव रिवीज़न (SIR) को 12 अन्य राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में बढ़ा दिया. अन्य बातों के अलावा, विपक्ष ने आरोप लगाया है कि चुनाव आयोग (ECI) ने गलत तरीके से बड़ी संख्या में वोटरों के नाम वोटर लिस्ट से हटा दिए हैं और बहुत ज़्यादा वेरिफिकेशन की शर्तें लगाकर योग्य वोटरों को रजिस्टर करने से रोका है. राजनीतिक विश्लेषकों और विपक्षी नेताओं ने चिंता जताई है कि SIR विपक्षी वोटों को दबाता है और मुस्लिम और अन्य अल्पसंख्यक वोटरों को वोट देने के अधिकार से वंचित करता है. सरकारी अधिकारियों ने वोटर लिस्ट में हेरफेर के आरोपों को खारिज किया है. साल के अंत तक SIR का काम चल ही रहा था.'
यह पिछले साल की बात है.
इस सवाल पर कि, 'क्या लोगों को अपनी पसंद की अलग-अलग राजनीतिक पार्टियों या अन्य प्रतिस्पर्धी राजनीतिक समूहों में संगठित होने का अधिकार है, और क्या यह सिस्टम इन प्रतिस्पर्धी पार्टियों या समूहों के उठने और गिरने में बेवजह की रुकावटों से मुक्त है?', भारत को 4 में से 3 नंबर मिले.
इस सवाल पर कि, 'क्या विपक्ष के लिए अपना समर्थन बढ़ाने या चुनावों के ज़रिए सत्ता हासिल करने का कोई यथार्थवादी मौका है?', भारत को फिर से 4 में से 3 नंबर मिले.
अब इन स्कोर्स का कोई मतलब नहीं रह गया है. ये हमारी हकीकत नहीं दिखाते. वोटर लिस्ट को बिगाड़ दिया गया है, चुनाव आयोग (ECI) सरकार का एक हिस्सा बन गया है और शायद ही स्वतंत्र है, और विधायकों को थोक के भाव खरीदा जाता है. अब इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि चुनाव कौन हारता है क्योंकि हमेशा 'हाउस' (कसीनो चलाने वाला) ही जीतता है, जैसा कि कसीनो के बारे में कहा जाता है.
पिछले कुछ सालों में नागरिक स्वतंत्रता को जो नुकसान पहुँचाया गया है, वह तुरंत दिखने लगा था. प्रमुख संस्थाओं के पतन को समझने में पर्यवेक्षकों (observers) को थोड़ा ज़्यादा समय लगा, लेकिन अब यह बिल्कुल साफ़ है.
आज के भारतीय स्टेट का ज़्यादा सच्चा प्रतीक बैलट बॉक्स (मतपेटी) नहीं, बल्कि सत्ता का दमनकारी बूट (तानाशाही) है.

