एम.ए. बेबी | बैरिकेड्स लोकतंत्र की आवाज़ को खामोश नहीं कर सकते

पिछले कुछ महीनों में जंतर-मंतर के बैरिकेड्स पर भारी हलचल देखी गई है. भारत के निर्वाचन आयोग (ईसीआई) में घटी घटनाओं पर हालिया मीडिया खुलासे से विरोध प्रदर्शनों की एक नई लहर पैदा हुई, इस बार निशाना मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार थे. कुमार के इस्तीफे की मांग अब स्वयं चुनावी शुचिता की मांग बन चुकी है. सीईसी के खिलाफ जंतर-मंतर पर होने वाले प्रदर्शन से पहले, 2 अक्टूबर 2026 को पूरे नई दिल्ली जिले में धारा 163 (बीएनएसएस) के तहत निषेधाज्ञा लागू कर दी गई थी. कई मेट्रो स्टेशन बंद कर दिए गए और यातायात पर भारी प्रतिबंधों की घोषणा की गई.

इन उपायों ने प्रदर्शनकारियों के हौसले पस्त नहीं किए, लेकिन दिल्ली पुलिस द्वारा किए गए सामूहिक कस्टडी/हिरासत और प्रतिबंध कई ऐसे कठिन सवाल खड़े करते हैं जिनका जवाब मिलना बाकी है: यह राजधानी किसकी है? ये सड़कें किसकी हैं? जुलाई 2026 में, राजधानी के तय विरोध स्थल 'जंतर-मंतर' ने वर्ष के सबसे बड़े युवा विरोध प्रदर्शनों में से एक देखा, जो अंततः प्रदर्शनकारियों के लिए एक बड़ी जीत में तब्दील हुआ. 20 जुलाई के नीट विरोध प्रदर्शनों के बाद से, दिल्ली पुलिस ने इस इलाके में बैरिकेडिंग को काफी बढ़ा दिया है. सड़कों को बंद करना और मतपत्रों में हेरफेर करना एक ही सिक्के के दो पहलू हैं. सरकार के खिलाफ विरोध जताने के लिए नागरिकों को पहले सरकार से ही अनुमति लेनी पड़ती है. शोषितों को उत्पीड़क के खिलाफ बोलने की इजाजत तभी मिलती है जब उत्पीड़क इसकी अनुमति देता है, जैसा कि ‘द हिंदू’ में प्रकाशित एम.ए. बेबी के लेख में कहा गया है.

विरोध प्रदर्शन के भूगोल का विलोपन

दिल्ली में विरोध प्रदर्शन के भूगोल का इतिहास धीरे-धीरे मिटाया जा रहा है. जंतर-मंतर पर स्थानांतरित करने से पहले बोट क्लब कभी प्रदर्शनों के लिए निर्धारित स्थल हुआ करता था. हालांकि जंतर-मंतर अब भी निर्धारित विरोध स्थल बना हुआ है, लेकिन "अनुमति न मिलने" के बहाने इसे अक्सर अवरुद्ध कर दिया जाता है. कोविड-19 लॉकडाउन तक, पारंपरिक रैली मार्ग मंडी हाउस से जंतर-मंतर या पार्लियामेंट स्ट्रीट (संसद मार्ग) पुलिस स्टेशन तक हुआ करता था. बड़ी रैलियां अक्सर रामलीला मैदान से शुरू होकर पार्लियामेंट स्ट्रीट पर समाप्त होती थीं.  लॉकडाउन के बाद से, कुछ अपवादों को छोड़कर, लगभग कोई अनुमति नहीं दी गई है. पार्लियामेंट स्ट्रीट वह स्थान था जहाँ लोग अपने चुने हुए प्रतिनिधियों के सामने प्रतीकात्मक रूप से अपना विरोध व्यक्त करते थे.

इन रुकावटों को लागू करने वाला कानूनी हथियार भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 163 है, जिसने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 144 का स्थान लिया है. बार-बार लागू की जाने वाली निषेधाज्ञाओं ने यह चिंता बढ़ा दी है कि क्या प्रदर्शनों को विनियमित करने के लिए बनाए गए प्रतिबंध वास्तव में उन्हें पूरी तरह से रोक रहे हैं, और सरकार या उसकी नीतियों को चुनौती देने वाले प्रदर्शनों की अनुमति न देने का अनियंत्रित विवेकाधिकार इस्तेमाल हो रहा है.

'मजदूर किसान शक्ति संगठन बनाम भारत संघ' के अपने 2018 के फैसले में, सर्वोच्च न्यायालय ने शांतिपूर्ण विरोध को एक मौलिक अधिकार माना और अधिकारियों को जंतर-मंतर पर नियमित प्रदर्शनों की अनुमति देने वाले दिशानिर्देश तैयार करने का निर्देश दिया. उससे पहले, 2012 के रामलीला मैदान मामले में भी अदालत ने इसी सिद्धांत की पुष्टि की थी.

यह केवल दिल्ली तक सीमित नहीं है. बेंगलुरु में, टाउन हॉल में होने वाले प्रदर्शनों को फ्रीडम पार्क में स्थानांतरित कर दिया गया, केवल वहां भी प्रतिबंधों का सामना करने के लिए. 2022 में, कर्नाटक उच्च न्यायालय ने प्रदर्शनों को केवल फ्रीडम पार्क तक सीमित कर दिया. दिसंबर 2025 में, बिजली और पानी की आपूर्ति काटकर "पुनर्विकास" के नाम पर पार्क को पूरी तरह से बंद कर दिया गया. हैदराबाद में केवल धरना चौक पर प्रदर्शन की अनुमति है. 2024 की शुरुआत में दिल्ली की ओर मार्च कर रहे किसानों को हरियाणा सीमा पर बैरिकेड्स, कांटेदार तारों, आंसू गैस और यहां तक कि गड्ढों का सामना करना पड़ा. निवारक हिरासत, मजदूरों की हड़तालों और छात्रों के मार्च को लक्षित करने वाली निषेधाज्ञाएं, और इंटरनेट बंद (ब्लैकआउट) करना सभी राज्यों में मानक प्रतिक्रिया बन गए हैं. भारतीय जनता पार्टी इस राष्ट्रीय ढर्रे की मुख्य चालक है: विरोध प्रदर्शनों को पहले स्थानांतरित किया जाता है, फिर सीमित किया जाता है, और अंततः प्रतिबंधित कर दिया जाता है.

असंतोष को दबाया नहीं जा सकता

इतिहास गवाह है कि जब भी सत्ता में बैठे लोगों ने सार्वजनिक दायरे को सीमित, प्रतिबंधित या सील किया है, आम जनता ने हमेशा कोई न कोई रास्ता निकाल लिया है. 2011 का तहरीर स्क्वायर आंदोलन, ऑक्यूपाई वॉल स्ट्रीट, पेरिस कम्यून और पेट्रोग्रैड सोवियत इसके कुछ उदाहरण हैं.

भारत ने भी हाल के वर्षों में बड़े विरोध प्रदर्शन देखे हैं, जिनमें नागरिकता (संशोधन) अधिनियम (सीएए) और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) के खिलाफ शाहीन बाग का ऐतिहासिक धरना, दिल्ली की सीमाओं पर 2020-21 का किसान आंदोलन, और वामपंथ के नेतृत्व में मजदूरों और किसानों के लामबंदी जैसे कि महापड़ाव और किसान लॉन्ग मार्च शामिल हैं. नवंबर 2023 के महापड़ाव ने तीन दिवसीय धरने के लिए देश भर के राज्य मुख्यालयों में मजदूरों और किसानों को सड़कों पर ला दिया था.

बेबी के अनुसार, स्थान संघर्ष के माध्यम से निर्मित होते हैं. जब राज्य औपचारिक सार्वजनिक स्थान को सील कर देता है, तो प्रतिरोध सीमाओं, राजमार्गों, परिसरों, डिजिटल नेटवर्क और मोहल्लों में नए स्थान बना लेता है. दमन ही ऐसे प्रतिरोध की परिस्थितियां पैदा करता है. हर बैरिकेड असंतोष का प्रतीक और लामबंदी का केंद्र बन जाता है. मोहन भागवत, नरेंद्र मोदी और अमित शाह को यह समझना होगा कि फरमान जारी करके असंतोष को खत्म नहीं किया जा सकता. इंटरनेट बंद करने, मेट्रो बंद करने, निवारक हिरासत और जेलों ने लोगों की लोकतांत्रिक आकांक्षाओं को समाप्त नहीं किया है. जैसा कि पाब्लो नेरुदा ने कहा था, “वे सारे फूलों को काट सकते हैं, लेकिन वसंत को आने से नहीं रोक सकते.” सत्तावादी आत्मविश्वास क्षणभंगुर होता है, और दमन अक्सर राजनीतिक असुरक्षा का प्रतीक होता है.

चुनावी निष्कासन पर

स्थान की यह लड़ाई संविधान और लोकतांत्रिक संस्थाओं की रक्षा की एक बड़ी लड़ाई का हिस्सा है. मतदाता सूचियों का विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) गरीबों, प्रवासियों, अल्पसंख्यकों और महिलाओं के बड़े पैमाने पर मताधिकार छीनने का खतरा पैदा करता है. चुनाव आयोग के अपने आंकड़े बताते हैं कि अल्पकालिक प्रवासी, निरक्षर मतदाता और शादीशुदा महिलाओं जैसे संवेदनशील वर्गों के नाम मतदाता सूची से हटाए जाने का जोखिम है.

बेबी के अनुसार, सार्वजनिक रूप से असंतोष को रोककर और निजी तौर पर मतदाता सूचियों में हेरफेर करके, भाजपा शासन हमारे लोकतांत्रिक गणराज्य को दोनों छोरों से खोखला कर रहा है. लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष ताकतों को सड़क, अदालत और मतपत्र को एक ही लोकतांत्रिक प्रतिरोध में जोड़ने की जरूरत है. विरोध करने का अधिकार जनता का अंतर्निहित अधिकार है, जो स्वतंत्रता संग्राम के माध्यम से हासिल किया गया था और अनुच्छेद 19 में निहित है. लोकतंत्र की रक्षा तभी की जा सकती है जब इसका प्रयोग किया जाए, और हमारा काम इसका अभ्यास करने के लिए व्यापक संघर्ष का निर्माण करना है.

वसंत ज़रूर आएगा.

(लेखक एम.ए. बेबी, सीपीआई (मार्क्सवादी) के महासचिव हैं. यह उनका हिंदी में अनूदित लेख है.)

Previous
Previous

मणिपुर के गुटों ने भारत में राज्य के 1949 के विलय के खिलाफ बंद का आह्वान किया

Next
Next

आकार पटेल | लोकतांत्रिक गिरावट