रक्षा मंत्री श्री राजनाथ सिंह ने हाल ही में टाइम्स ऑफ इंडिया में एक लेख लिखा, जिसकी शुरुआत इस कथन से हुई कि युद्ध में सबसे पहले सत्य की बलि चढ़ती है. उनके तर्क का सार यह है कि चुनाव आयोग की आलोचना गढ़ी हुई है, सुप्रीम कोर्ट ने आयोग के कामकाज को सही ठहराया है और उसके खिलाफ सड़क पर प्रदर्शन अराजकता की ओर बढ़ना है. लेकिन चुनाव आयोग के भीतर उठ रहे सवालों पर चर्चा करते हुए उन्होंने उस दस्तावेज का जिक्र नहीं किया, जो इस पूरे मामले को समझने के लिए बेहद महत्वपूर्ण है.
23 सितंबर को द इंडियन एक्सप्रेस में ऋतिका चोपड़ा की प्रकाशित पड़ताल अक्टूबर 2025 से अगस्त 2026 तक के लिखित नोट्स और पत्राचार पर आधारित है. इसमें सामने आया कि तीन में से दो चुनाव आयुक्तों, सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने दस महीनों में 14 बार आयोग के कुछ फैसलों पर लिखित आपत्ति दर्ज कराई. इनमें मतदाताओं के नाम जोड़ने, हटाने और मतदाता सूची की निगरानी से जुड़े फैसले शामिल थे. कुछ कदमों को उन्होंने “अनधिकृत और अवैध” भी बताया. ये आपत्तियां विपक्ष ने नहीं, बल्कि चुनाव आयुक्तों ने स्वयं दर्ज की थीं.
राजनाथ सिंह की इस बात से सहमति होनी चाहिए कि असहमति तथ्यों पर आधारित होनी चाहिए. लेकिन यदि चुनाव आयुक्तों की आपत्तियां गलत हैं, तो आयोग को संबंधित फाइल नोट्स और सॉफ्टवेयर एक्सेस लॉग सार्वजनिक करने चाहिए. इससे पता चल सकेगा कि राज्य के अधिकारियों को दरकिनार कर मतदाता डेटाबेस को दिल्ली में केंद्रीकृत करने का फैसला किसने लिया. दस्तावेज सामने रखे बिना किसी संस्था से आंख मूंदकर भरोसा करने की अपेक्षा करना जवाबदेही नहीं, बल्कि बिना सवाल किए आदेश मानने की मांग है.
विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के मामले में यह अपारदर्शिता सीधे मतदाताओं को प्रभावित करती है. राजनाथ सिंह का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट ने बिहार में एसआईआर को मंजूरी दी. हालांकि, अदालत ने प्रक्रिया पर रोक लगाने से इनकार किया, लेकिन आयोग को कुछ महत्वपूर्ण निर्देश भी दिए. करीब 65 लाख हटाए गए मतदाताओं के नाम और उन्हें हटाने के व्यक्तिगत कारण सार्वजनिक करने को कहा गया, क्योंकि लोगों को यह जानने का अधिकार है. अदालत ने नाम जुड़वाने के लिए आधार को पहचान के प्रमाण के रूप में स्वीकार करने का भी निर्देश दिया. इससे स्पष्ट है कि प्रक्रिया पर गंभीर कानूनी सवाल उठे और अदालत को उसमें सुधार के निर्देश देने पड़े. इसे पूरी तरह कानूनी और प्रशासनिक रूप से उचित बताना वास्तविक स्थिति को नजरअंदाज करना है.
एसआईआर को अयोग्य मतदाताओं को हटाने की प्रक्रिया के रूप में पेश किया गया, लेकिन इसका असर गरीबों, प्रवासी मजदूरों, अशिक्षित लोगों और उन विवाहित महिलाओं पर भी पड़ सकता है जिनका नाम अब तक पति के परिवार की मतदाता सूची में स्थानांतरित नहीं हुआ है. सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि चुनाव आयोग नागरिकता का फैसला नहीं कर सकता और ऐसे मामलों को नागरिकता कानून के तहत सक्षम प्राधिकारी के पास भेजा जाना चाहिए. गृह मंत्रालय से सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई जानकारी से यह सवाल उठा कि संबंधित मंत्रालय को भी ऐसे मामलों के फैसले के लिए सक्षम प्राधिकारी की स्पष्ट जानकारी नहीं है. इस निर्देश पर आगे क्या कार्रवाई हुई, यह भी स्पष्ट नहीं है.
राजनाथ सिंह ने चुनावी प्रक्रिया पर उठने वाली आलोचना को ईवीएम विवाद तक सीमित करने की कोशिश की है. सुप्रीम कोर्ट द्वारा ईवीएम संबंधी आपत्तियों को स्वीकार न करने का अर्थ यह नहीं कि लोगों के मन में उठ रहे सभी सवाल समाप्त हो गए हैं. शत-प्रतिशत वीवीपैट पर्चियों के मिलान की मांग पर भी पुनर्विचार होना चाहिए. हालांकि, हमारी मुख्य आपत्ति मतदाता सूची से लोगों के नाम हटाने की अपारदर्शी प्रक्रिया है.
मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति को संस्थागत बनाने के दावे पर भी सवाल उठते हैं. मार्च 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया था कि कानून बनने तक चयन समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा में नेता विपक्ष और भारत के मुख्य न्यायाधीश शामिल होंगे. इसके कुछ महीनों बाद संसद ने कानून बनाकर मुख्य न्यायाधीश की जगह केंद्रीय कैबिनेट मंत्री को शामिल कर दिया. इससे समिति में सरकार को दो-एक का बहुमत मिल गया. ऐसे में विपक्ष के नेता की असहमति का परिणाम पहले से तय हो सकता है. राजनाथ सिंह ने राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (एनजेएसी) पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का सम्मान करने की बात कही, लेकिन चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति संबंधी निर्देश को बदलने के अपने सरकार के फैसले का उल्लेख नहीं किया.
चुनाव आयुक्तों को कानूनी संरक्षण देने वाले 2023 के कानून की धारा 16 भी गंभीर चिंता पैदा करती है. इसके तहत आधिकारिक कर्तव्य निभाते समय किए गए कार्यों के लिए मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों के खिलाफ दीवानी या आपराधिक कार्यवाही अदालत में नहीं चलाई जा सकती. यह संरक्षण पद छोड़ने के बाद भी जारी रहता है. लेख के अनुसार, इस तरह का संरक्षण राष्ट्रपति को संविधान के अनुच्छेद 361 के तहत मिलने वाली पदावधि तक सीमित प्रतिरक्षा से भी अधिक व्यापक है. सवाल है कि यदि आयोग का कामकाज पूरी तरह निष्पक्ष है, तो ऐसे स्थायी संरक्षण की जरूरत क्यों है?
राजनाथ सिंह ने अपने लेख में संविधान के पहले संशोधन और आपातकाल का भी उल्लेख किया. लेकिन कम्युनिस्ट आंदोलन ने पहले संशोधन का विरोध किया था और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) ने आपातकाल के दौरान किए गए संवैधानिक संशोधनों का संसद और सड़कों, दोनों जगह विरोध किया. आपातकाल में पार्टी के हजारों कार्यकर्ताओं और नेताओं को जेल में डाला गया. हालांकि, अतीत के उदाहरण आज चुनाव आयोग की जवाबदेही से जुड़े सवालों का उत्तर नहीं देते.
कृषि कानूनों को वापस लेने के मामले में भी राजनाथ सिंह सरकार की सुनने की क्षमता का उदाहरण देते हैं. लेकिन वे यह नहीं बताते कि सितंबर 2020 में राज्यसभा में विपक्ष की मत विभाजन की मांग के बावजूद ध्वनिमत से कानून पारित किए गए थे. आठ सांसद निलंबित थे. कानूनों की वापसी एक साल के आंदोलन, 700 से अधिक किसानों की मौत और सड़कों पर बैरिकेड, खाइयों तथा आंसू गैस का सामना करने के बाद हुई. अंततः सरकार को उसी जनविरोध के दबाव में पीछे हटना पड़ा, जिसे आज अराजकता कहा जा रहा है.
2 अक्टूबर 2026 को नई दिल्ली जिले में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 163 के तहत निषेधाज्ञा लागू की गई. मेट्रो स्टेशन बंद किए गए और विपक्षी नेताओं तथा पत्रकारों सहित हजारों लोगों को हिरासत में लिया गया. सुप्रीम कोर्ट को हस्तक्षेप कर निर्देश देना पड़ा कि शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों को अवैध रूप से हिरासत में न लिया जाए, मेट्रो सामान्य रूप से चले और निषेधाज्ञा को लोगों को पकड़ने का खुला अधिकार न माना जाए. लेखक के अनुसार, 10 अक्टूबर को भी कानून-व्यवस्था के नाम पर सभा करने पर रोक लगाई गई, जबकि पिछले दिन सुप्रीम कोर्ट के निर्देश आ चुके थे. दोनों दिनों प्रदर्शनकारियों की ओर से हिंसा की खबर नहीं आई; हिंसा हिरासत की कार्रवाई में दिखाई दी. प्रदर्शनकारी मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग कर रहे थे, जिन पर उनके ही सहकर्मियों ने असंवैधानिक तरीके से काम करने के आरोप लगाए थे. सरकार ने इस मांग का जवाब बैरिकेड लगाकर दिया.
प्रदर्शन के लिए उपलब्ध सार्वजनिक स्थान भी लगातार सीमित हुए हैं. 1993 में बोट क्लब में प्रदर्शन बंद कराए गए और लोगों को जंतर-मंतर की ओर भेजा गया. कोविड लॉकडाउन तक मंडी हाउस से संसद मार्ग तक मार्च आम तौर पर आयोजित होते थे, लेकिन उसके बाद अनुमति मिलना कठिन हो गया. 2018 में मजदूर किसान शक्ति संगठन मामले और 2012 में रामलीला मैदान मामले में सुप्रीम कोर्ट शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार को मान्यता दे चुका है. लेकिन यदि प्रदर्शन के लिए दस दिन पहले अनुमति मांगनी पड़े और सरकार कभी भी स्थान बंद कर सके, तो यह अधिकार कितना सार्थक रह जाता है?
राजनाथ सिंह ने डॉ. भीमराव आंबेडकर का भी हवाला दिया. आंबेडकर ने असंवैधानिक तरीकों से बचने की चेतावनी उस परिस्थिति में दी थी, जब संवैधानिक रास्ते खुले हों. जब निष्पक्ष संस्था पर सवाल हों, अधिकारियों को व्यापक कानूनी संरक्षण मिले और सड़कों पर प्रदर्शन की जगह सीमित कर दी जाए, तो यह आधार ही कमजोर हो जाता है. आंबेडकर ने संविधान सभा में राजनीतिक समानता और सामाजिक-आर्थिक असमानता के बीच मौजूद विरोधाभास की भी चेतावनी दी थी. गरीबों, प्रवासियों और नवविवाहित महिलाओं के नाम मतदाता सूची से हटना इसी विरोधाभास का उदाहरण है.
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को इस्तीफा देना चाहिए या उनके पद से हटाने की प्रक्रिया अदालत की निगरानी में जांच के साथ शुरू की जानी चाहिए. 2023 के कानून में संशोधन कर चयन समिति को कार्यपालिका के पक्ष में झुके संतुलन से मुक्त करना और धारा 16 को हटाना चाहिए. एसआईआर के तहत हटाए गए नामों का पूरा विवरण सार्वजनिक किया जाए और किसी मतदाता का नाम हटाने से पहले प्रभावी सुनवाई की व्यवस्था हो. जंतर-मंतर और संसद मार्ग पर प्रदर्शन के रास्ते फिर खोले जाएं तथा धारा 163 के व्यापक इस्तेमाल पर रोक लगे. लोकतंत्र में असहमति अराजकता नहीं है. बैरिकेड लगाकर सवालों को दबाया जा सकता है, लेकिन उनका जवाब नहीं दिया जा सकता.
(एम. ए. बेबी, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के महासचिव और पूर्व सांसद हैं. ‘काउंटरकरंट्स’ में प्रकाशित उनके मूल लेख को अंग्रेजी में यहां पढ़ा जा सकता है.)

