मतदाता सत्यापन घर तक, लेकिन बेघर लोगों के पास वोट का अधिकार साबित करने के दस्तावेज़ नहीं

‘आर्टिकल 14’ में बेतवा शर्मा ने दिल्ली में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के दौरान बेघर लोगों की मुश्किलों पर रिपोर्ट किया है. चुनाव आयोग ने नोटिस पाने वाले मतदाताओं के घर जाकर सत्यापन करने की व्यवस्था की है, लेकिन 2002 की मतदाता सूची से अपना या परिवार का संबंध साबित करने के लिए जरूरी दस्तावेज़ न होने की समस्या अब भी बनी हुई है. पुरानी सूची से नाम कट चुके लोगों के लिए लगाए गए पुनः पंजीकरण शिविर भी इस बाधा को दूर नहीं कर पा रहे हैं.

पुरानी दिल्ली के एक आश्रय गृह में रहने वाली मुस्लिम महिलाओं ने डर जताया कि मतदाता सूची से नाम हटने पर उन्हें जेल भेजा जा सकता है या बांग्लादेशी कहकर देश से बाहर कर दिया जाएगा. वे कभी मज़ाक में इन आशंकाओं पर हंसती हैं, लेकिन उनकी बातचीत में नागरिकता और सुरक्षा खोने का भय साफ दिखाई देता है.

दिल्ली की प्रारूप मतदाता सूची 5 अगस्त 2026 को प्रकाशित हुई थी. जिन लोगों के नाम हटाए गए या जिन्हें नोटिस मिले, उनमें कई ऐसे हैं जो अपने, माता-पिता या दादा-दादी के दस्तावेज़ों से 2002 की मतदाता सूची से संबंध साबित नहीं कर सके. नोटिस के जवाब में निर्धारित 12 दस्तावेज़ों में से कोई एक देना आवश्यक है. गरीब और बेघर लोगों के पास जन्म प्रमाणपत्र, पासपोर्ट या दसवीं की अंकतालिका जैसे प्रमाण भी अक्सर नहीं होते.

पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस.वाई. कुरैशी ने कहा कि अधिकारियों का मतदाताओं के घर जाना प्रक्रिया को आसान बना सकता है, लेकिन दस्तावेज़ों की कमी और उससे पैदा होने वाली परेशानी खत्म नहीं होती. उनके मुताबिक, दस्तावेज़ उपलब्ध न होने के कारण बड़ी संख्या में नाम हटाए गए हैं.

35 वर्षीय यास्मीन ने बताया कि वह 2015 में मतदाता पहचानपत्र बनने के बाद से लगभग हर चुनाव में वोट देती रही हैं. उनके पास 2002 की सूची से संबंध साबित करने वाले दस्तावेज़ नहीं हैं. नोटिस अंग्रेज़ी में होने के कारण आश्रय गृह की कई महिलाएं यह भी नहीं समझ पा रही थीं कि उन्हें कब और कौन-से कागज़ लेकर उपस्थित होना है.

दिल्ली के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने बेघर आश्रय गृहों में फॉर्म 6 के जरिए नए मतदाता के रूप में पंजीकरण के शिविर लगाए. लेकिन पहले से मतदाता रहे लोगों को दोबारा पंजीकरण कराने से उनका पुराना मतदान इतिहास मिट सकता है. रिपोर्ट के अनुसार, इससे उन लोगों को भी नए मतदाता की तरह आवेदन करना पड़ रहा है जिनके पास पहले से मतदाता पहचानपत्र था.

बिहार के अररिया से दिल्ली आईं 22 वर्षीय सजरा जहां और उनके पति बाबलू को भी नोटिस मिला. दोनों का कहना था कि उनके पास मांगे गए 12 दस्तावेज़ों में से कोई भी नहीं है. सजरा अपने दादा का मतदाता पहचानपत्र, आधार और राशन कार्ड लेकर निर्वाचन कार्यालय पहुंचीं, लेकिन उन्हें बताया गया कि ये दस्तावेज़ 2002 से संबंध साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं. इस प्रक्रिया में उनका समय और पैसा खर्च हुआ और उनकी कंप्यूटर की कक्षा भी छूट गई.

रिपोर्ट में दिल्ली की प्रारूप सूची से 14.51 मिलियन मतदाताओं में से 4.77 मिलियन के बाहर रह जाने का उल्लेख है. इनमें से 3.31 मिलियन मतदाताओं को नोटिस दिए गए. रिपोर्ट में उद्धृत सबर इंस्टीट्यूट के विश्लेषण के मुताबिक, कम समृद्ध इलाकों में नोटिस की दर अधिक थी और कुछ श्रेणियों में मुस्लिम मतदाता अनुपात से अधिक प्रभावित हुए.

चुनाव आयोग ने एसआईआर के दौरान पहचाने गए कथित बांग्लादेशी या रोहिंग्या मतदाताओं की संख्या सार्वजनिक नहीं की है. वहीं, पूर्व निर्वाचन अधिकारियों और शोधकर्ताओं ने दस्तावेज़ों की अनिवार्यता, प्रक्रिया में असमानता और गरीब लोगों के लिए अपील की कठिनाइयों पर सवाल उठाए हैं. आश्रय गृह में रहने वाले लोगों के लिए घर जाकर सत्यापन की व्यवस्था के बावजूद मूल समस्या वही है: उनके पास अपनी पात्रता साबित करने के लिए जरूरी कागज़ नहीं हैं.

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