'अगर शिक्षक ही कक्षा में नहीं होंगे तो बच्चों का भविष्य क्या होगा?' मुंबई के स्कूलों पर एसआईआर का असर
महाराष्ट्र में चल रहे विशेष गहन मतदाता सूची पुनरीक्षण (एसआईआर ) अभियान का असर अब सिर्फ चुनावी प्रक्रिया तक सीमित नहीं रह गया है. इसका सीधा प्रभाव स्कूलों और बच्चों की पढ़ाई पर भी दिखाई देने लगा है. सरकारी और अनुदानित निजी स्कूलों के हजारों शिक्षकों को बूथ लेवल ऑफिसर (बीएलओ) बनाकर चुनावी काम में लगा दिया गया है, जिससे स्कूलों में शिक्षकों की भारी कमी हो गई है और पढ़ाई प्रभावित हो रही है.
‘स्क्रोल’ के मुताबिक, मुंबई के सायन स्थित डीएस हाई स्कूल की 37 वर्षीय शिक्षिका श्वेता पाटिल इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं. वे पिछले 15 वर्षों से दूसरी कक्षा को पढ़ा रही हैं. उनके पास 39 छात्र हैं, लेकिन अब स्कूल की जिम्मेदारी निभाने के बाद उन्हें SIR के तहत महिम विधानसभा क्षेत्र के 1,159 मतदाताओं का सत्यापन और गणना फॉर्म भरने का काम भी करना पड़ रहा है.
श्वेता सुबह पांच बजे उठती हैं, पूरे दिन स्कूल में पढ़ाने के बाद शाम को मतदाताओं के घर-घर जाकर फॉर्म भरवाती हैं और रात लगभग दस बजे घर लौटती हैं. इसके बाद भी उनका काम खत्म नहीं होता. उन्हें घर पर बैठकर घंटों तक ऑनलाइन फॉर्म अपलोड करने पड़ते हैं. उनका कहना है कि व्यक्तिगत मोबाइल नंबर भी बिना अनुमति मतदाताओं को दे दिया गया, जिससे रोज 50 से अधिक फोन आते हैं. लोग सूची में नाम न होने या फॉर्म न मिलने पर नाराजगी भी जाहिर करते हैं.
इस अतिरिक्त जिम्मेदारी का असर उनके निजी जीवन पर भी पड़ा है. उनका 11 वर्षीय बेटा शिकायत करता है कि मां अब उसके साथ समय नहीं बिता पातीं. डेढ़ साल के छोटे बेटे को पूरे दिन बेबी सिटर के पास छोड़ना पड़ता है और लगातार बाहर रहने की वजह से उन्हें स्तनपान तक बंद करना पड़ा. देर रात घर लौटने के कारण रोज बाहर का खाना खाना पड़ रहा है.
श्वेता अकेली नहीं हैं. मुंबई में सरकारी और निजी अनुदानित स्कूलों के छह हजार से अधिक प्राथमिक शिक्षक एसआईआर ड्यूटी में लगाए गए हैं. शिक्षकों के संगठन शिक्षण सेना के अनुसार पहले से ही शिक्षकों की कमी थी, अब स्थिति और गंभीर हो गई है. कई स्कूलों में दो-दो कक्षाओं को मिलाकर पढ़ाया जा रहा है. कुछ जगह दूसरी और तीसरी कक्षा के विद्यार्थियों को एक साथ बैठाना पड़ रहा है, जबकि कई स्कूलों में एक शिक्षक कई सेक्शन संभाल रहा है.
डीएस हाई स्कूल के ट्रस्टी अध्यक्ष राजेंद्र प्रधान बताते हैं कि उनके प्राथमिक विभाग के 12 में से 7 शिक्षक चुनावी ड्यूटी पर हैं. इससे स्कूल को समय-सारिणी बदलनी पड़ी. शिक्षक पढ़ाने के तुरंत बाद चुनावी काम के लिए निकल जाते हैं, जिससे उन्हें अगली कक्षाओं की तैयारी का समय भी नहीं मिल पाता. उनका कहना है कि 40 वर्ष से अधिक उम्र के कई शिक्षक लगातार दोहरी जिम्मेदारी के कारण शारीरिक और मानसिक रूप से थक चुके हैं. इसका सीधा असर शिक्षा की गुणवत्ता पर पड़ रहा है.
शिक्षकों के अनुसार एसआईआर की प्रक्रिया भी बेहद अव्यवस्थित रही है. शुरुआत में उन्हें केवल मतदाताओं का "मैपिंग" करने को कहा गया, लेकिन गणना फॉर्म बाद में उपलब्ध कराए गए. परिणामस्वरूप शिक्षकों को एक ही घर में कई बार जाना पड़ रहा है. मुंबई जैसी भारी बारिश और ट्रैफिक के बीच फॉर्म और दस्तावेज लेकर लगातार क्षेत्र में घूमना अतिरिक्त चुनौती बन गया है. कई इलाकों में एक-एक फॉर्म भरवाने में 15 से 20 मिनट लगते हैं और बाद में हर फॉर्म को ऑनलाइन अपलोड करने में भी काफी समय खर्च होता है.
शिक्षकों का कहना है कि इस व्यवस्था में बच्चों की पढ़ाई सबसे बड़ी कीमत चुका रही है. दूसरी कक्षा जैसे छोटे बच्चों के लिए अपने नियमित शिक्षक से अलग होना भावनात्मक रूप से भी कठिन है. श्वेता बताती हैं कि उनके स्कूल से निकलते ही उनकी कक्षा के बच्चों को दूसरी कक्षाओं में भेज दिया जाता है. बच्चे परेशान हो जाते हैं और पढ़ाई पर ध्यान नहीं लगा पाते. खुद शिक्षिका भी स्वीकार करती हैं कि अब उनका ध्यान पढ़ाने से ज्यादा इस बात पर रहता है कि दिन भर में कितने फॉर्म पूरे किए जा सकेंगे.
स्थिति इतनी तनावपूर्ण हो चुकी है कि कुछ शिक्षकों ने चुनावी ड्यूटी करने से इनकार कर दिया. नवी मुंबई के गणित शिक्षक तुषार म्हात्रे का कहना है कि वे पहले जनगणना का काम कर चुके हैं, लेकिन दसवीं के छात्रों की पढ़ाई छोड़कर SIR करना उचित नहीं मानते. उन्हें चुनाव आयोग की ओर से नोटिस मिल चुका है. शिक्षकों के संगठनों का दावा है कि मुंबई में चुनावी ड्यूटी से इनकार करने वाले शिक्षकों के खिलाफ 95 एफआईआर दर्ज की जा चुकी हैं और कई अन्य को कार्रवाई की चेतावनी दी गई है.
शिक्षक संगठनों का तर्क है कि चुनाव लोकतंत्र के लिए जरूरी हैं, लेकिन उनकी जिम्मेदारी शिक्षा की कीमत पर नहीं निभाई जानी चाहिए. उनका कहना है कि शिक्षक का प्राथमिक दायित्व बच्चों को पढ़ाना है, न कि लगातार अलग-अलग सरकारी कार्यों में लगाया जाना. उनका सबसे बड़ा सवाल यही है—यदि शिक्षक ही कक्षा में मौजूद नहीं होंगे, तो आने वाली पीढ़ी का भविष्य आखिर कैसे सुरक्षित रहेगा?

