टी.एम. कृष्णा | सीधे-सादे लोग

प्रसिद्ध संगीतकार और सार्वजनिक बुद्धिजीवी टी.एम. कृष्णा द्वारा लिखित इस लेख में भारतीय राजनीति के एक बेहद चिंताजनक पहलू—‘चुनावी दलबदल, अवसरवाद और मतदाता की राजनीतिक साक्षरता’—का तीखा और दार्शनिक विश्लेषण किया गया है. कृष्णा ने यह समझाने का प्रयास किया है कि कैसे राजनीतिक दलों ने भाषा और राष्ट्रवाद का दुरुपयोग करके लोकतांत्रिक मूल्यों को विकृत कर दिया है, और कैसे हम (मतदाता) इस पूरे तमाशे के मूक गवाह और अनजाने में भागीदार बन चुके हैं. ‘द टेलीग्राफ’ में अंग्रेजी में प्रकाशित इस लेख का हिंदी में अनुदित सारांश प्रस्तुत है:

अपने व्यक्तिगत अनुभवों से शुरुआत करते हुए टी.एम. कृष्णा बताते हैं कि उन्होंने पहली बार 'ऑपरेशन' शब्द 1980 के दशक में 'ऑपरेशन ब्लू स्टार' के दौरान सुना था. इस घटना के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या हुई और सिख विरोधी दंगे भड़के. अन्यथा, चिकित्सा क्षेत्र से अलग, 'ऑपरेशन' शब्द हमेशा से सैन्य कार्रवाई, बाहरी आक्रमण के खिलाफ प्रतिरोध, या देश के भीतर पनप रहे राष्ट्र-विरोधी तत्वों को कुचलने की भावना से जुड़ा रहा है. इस शब्द के साथ एक ऐसी अति-राष्ट्रवादी भावना जुड़ी होती है, जिसमें कार्रवाई के दौरान या उसके ठीक बाद किसी भी प्रकार की आलोचना, सवाल या असहमति को 'देशद्रोह' करार दे दिया जाता है. सवाल उठाने वालों को 'बाधक' मान लिया जाता है.

नागरिकों को बिना शर्त समर्थन देने के लिए मजबूर किया जाता है. सोशल मीडिया पर लोग अपनी प्रोफाइल पिक्चर (डीपी) बदलकर तिरंगा लगा लेते हैं, दुश्मनों का मजाक उड़ाने वाले और हिंसा को महिमामंडित करने वाले मीम्स साझा किए जाते हैं, और नागरिक समाज एकजुटता के कार्यक्रम आयोजित करता है.

लेकिन हाल के वर्षों में, 'ऑपरेशन' शब्द का प्रयोग सैन्य बैरकों से निकलकर भारतीय राजनीति के गलियारों में होने लगा है. आज 'ऑपरेशन लोटस' भारतीय राजनीतिक विमर्श का एक सामान्य हिस्सा बन चुका है. 'ऑपरेशन लोटस' का सीधा अर्थ भारतीय जनता पार्टी द्वारा विपक्षी दलों के विधायकों और सांसदों को तोड़कर अपने पाले में लाना है. विपक्षी नेता अचानक अपनी मूल पार्टी से मोहभंग का दावा करते हैं और भाजपा व नरेंद्र मोदी के प्रति निष्ठा व्यक्त करने लगते हैं.

जैसे ही यह दलबदल पूरा होता है, इन नेताओं के खिलाफ चल रहे भ्रष्टाचार और अन्य आपराधिक मामले जादुई रूप से गायब हो जाते हैं.  इसे समाज में 'भाजपा वाशिंग मशीन' का नाम दिया गया है. इनमें से कई पाला बदलने वाले नेताओं को ईनाम के तौर पर मुख्यमंत्री या मंत्री पद तक सौंप दिया जाता है.

कृष्णा ताज़ा उदाहरण देते हुए बताते हैं कि कैसे तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) में एक अज्ञात पार्टी (नेशनलिस्ट सिटीजन्स पार्टी ऑफ इंडिया) को मुखौटा बनाकर विभाजन कराया गया, और कैसे शिवसेना (यूबीटी) के खिलाफ 'ऑपरेशन टाइगर' की सुगबुगाहट है. हालांकि भारत में कपटपूर्ण दलबदल का पुराना इतिहास रहा है (जैसे तमिलनाडु में एआईएडीएमके के विधायकों को रिसॉर्ट में बंद करना), लेकिन आज के दौर में जो बात अलग है, वह है—इस अवसरवाद को बिना किसी छुपाव के, पूरी बेशर्मी के साथ अंजाम देना.

राजनीतिक दलबदल के लिए 'ऑपरेशन' शब्द का उपयोग करना बेहद खतरनाक और दुर्भावनापूर्ण है. इसके पीछे एक गहरा मनोवैज्ञानिक और वैचारिक खेल काम कर रहा है: चूंकि 'ऑपरेशन' शब्द में एक अंतर्निहित राष्ट्रवादी गूंज होती है, इसलिए आम जनता को अचेतन रूप से लगने लगता है कि सत्ता का यह केंद्रीकरण देश को मजबूत करने और आंतरिक-बाहरी दुश्मनों से लड़ने के लिए जरूरी है. इसके बाद, साम, दाम, दंड, भेद से सत्ता हासिल करना 'धर्म' मान लिया जाता है.

जो नेता पाला नहीं बदलते या भाजपा का विरोध करते हैं, उन्हें 'दुश्मन लड़ाके' या 'जासूस' मान लिया जाता है, जो देश में 'रावणराज' लाना चाहते हैं. यहाँ 'रावण' शब्द वास्तव में वामपंथियों, मुसलमानों और उदारवादियों को निशाना बनाने का एक राजनीतिक कोड बन जाता है. यह नैरेटिव नरेंद्र मोदी और अमित शाह की उस छवि के साथ बिल्कुल फिट बैठता है जिसमें वे खुद को हिंदुत्व राज की रक्षा करने वाले राष्ट्र के योद्धाओं के रूप में पेश करते हैं. इस युद्ध में संवैधानिक नैतिकता या नियमों के लिए कोई जगह नहीं है; या तो आप उनके सामने आत्मसमर्पण कर दें या फिर नष्ट हो जाएं.

कृष्णा इस बात पर गहरी चिंता व्यक्त करते हैं कि इस पूरे तमाशे को देखकर देश के नागरिकों और मतदाताओं की प्रतिक्रिया क्या है. सोशल मीडिया फीड्स को देखने पर एक कड़वी सच्चाई सामने आती है: इस अनैतिक व्यवहार को लेकर जनता में कोई वास्तविक गुस्सा या आक्रोश नहीं दिखता. लोग इस पर लतीफे और व्यंग्य बनाकर हंसते हैं. इन दलबदलों के रणनीतिकार अमित शाह की चतुराई और बंद कमरों के ऑपरेशनों का जश्न मनाया जाता है. उन्हें 'चाणक्य' का खिताब देकर उनके मंच-कौशल की सराहना की जाती है. यहाँ तक कि विपक्ष के समर्थक भी उनकी इस कला के कायल दिखते हैं.

अपने विधायकों को एकजुट न रख पाने के लिए विपक्षी दलों का मजाक उड़ाया जाता है. जनता के मन में यह अंतर्निहित धारणा बन चुकी है कि यदि राजनेता अपनी जांच बचाने या पैसे के लिए पाला बदल रहे हैं, तो इसमें कुछ भी गलत नहीं है. लोग चतुर और चालाक भाजपा की शिकायत तो करते हैं, लेकिन इस बात से बेखबर हैं कि इस प्रक्रिया में उन्होंने एक नागरिक के तौर पर खुद का क्या हश्र कर लिया है.

टी.एम. कृष्णा का सबसे कड़ा प्रहार भारतीय मतदाताओं पर है. वे कहते हैं कि इस पूरी लोकतांत्रिक गिरावट की असली जड़ उस क्षण में है जब हम अपना वोट डालते हैं. बड़े-बड़े उदारवादी भी मतदाता की आलोचना करने से डरते हैं. सिर्फ इसलिए कि मतदाताओं ने किसी पार्टी को बहुमत दे दिया, इसका मतलब यह नहीं है कि उनके फैसले की तार्किक समीक्षा नहीं की जा सकती. मतदाता हमेशा सही नहीं होता.

चाहे कोई अमीर हो या गरीब, शिक्षित हो या अशिक्षित—हमारा वोट हमेशा सामाजिक बुराइयों (जाति, धर्म, भाषा, जातीयता और लिंग) से दूषित रहता है. मतदान का निर्णय व्यापक सामाजिक भलाई के बजाय तात्कालिक लाभ और तर्कहीन भावनाओं से संचालित होता है.

(अंग्रेजी में मूल लेख यहां पढ़ा जा सकता है) 

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