अरावली पर विवाद: सुप्रीम कोर्ट की समिति में सिर्फ सेवानिवृत्त अधिकारी और वरिष्ठ नौकरशाह भरे हुए हैं, बदलाव की मांग
अरावली पर्वतमाला की सुरक्षा से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के फैसले की समीक्षा के लिए गठित नई समिति पर विवाद खड़ा हो गया है. देश भर के वैज्ञानिकों, पर्यावरणविदों, नीति विशेषज्ञों और नौकरशाहों ने भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) को कम से कम 10 पत्र सौंपकर इस समिति में तत्काल बदलाव और इसके पुनर्गठन की मांग की है.
जितेंद्र चौबे के मुताबिक, हस्ताक्षरकर्ताओं का आरोप है कि 25 मई, 2026 को गठित यह समिति पक्षपातपूर्ण है. समिति की अध्यक्ष (आईसीएफआरई की महानिदेशक कंचन देवी) केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के सचिव को रिपोर्ट करती हैं. पूर्व आईएफएस अधिकारी प्रकृति श्रीवास्तव के अनुसार, उसी प्रशासनिक पदानुक्रम से जुड़ी रिपोर्ट की समीक्षा करना सीधे तौर पर 'हितों के टकराव' को दर्शाता है.
आलोचकों का कहना है कि समिति में केवल सेवानिवृत्त अधिकारी और वरिष्ठ नौकरशाह भरे हुए हैं. इसमें स्वतंत्र विषय विशेषज्ञों जैसे—पारिस्थितिकी, जल विज्ञान, वन्यजीव, जीआईएस पेशेवरों और भू-तकनीकी विज्ञान के दिग्गजों को जगह नहीं मिली है.
पर्यावरणविद डॉ. रवि चोपड़ा सहित अन्य विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि सरकारी अधिकारियों पर अत्यधिक निर्भरता के कारण समिति में स्वतंत्र वैज्ञानिक दृष्टिकोण की कमी है. इसके अलावा, सदस्यों के पास हरियाणा और राजस्थान जैसे उन प्रमुख राज्यों का जमीनी अनुभव नहीं है, जहाँ अरावली पर खनन और रियल एस्टेट का सबसे अधिक दबाव है.
विशेषज्ञों ने याद दिलाया कि इसी प्रशासनिक ढांचे ने पहले अरावली की परिभाषा बदलकर छोटी पहाड़ियों को कानूनी सुरक्षा से बाहर कर दिया था, जिससे वहां खनन को बढ़ावा मिला.
याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि वर्तमान ढांचा पर्यावरण सुरक्षा उपायों को कमजोर कर सकता है. उन्होंने मुख्य न्यायाधीश से मांग की है कि 'गोदावर्मन ढांचे' के तहत वन सीमांकन का अधूरा कार्य पहले पूरा किया जाए. साथ ही, अरावली क्षेत्र की जलवायु चुनौतियों से निपटने के लिए समिति का विस्तार कर इसमें स्वतंत्र वैज्ञानिकों, जलविदों और सामाजिक-आजीविका विशेषज्ञों को शामिल करके इसे अधिक पारदर्शी, निष्पक्ष और व्यापक बनाया जाए.

