क्या मोदी सरकार मध्यमवर्गीय भारतीयों को विदेश में निवेश करने से रोकना चाहती है?

'स्क्रोल' में शोएब दानियाल लिखते हैं कि मंगलवार को ज़ी बिजनेस ने अपनी वेबसाइट और टीवी नेटवर्क पर एक अहम खबर प्रसारित की. रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) भारत की उदारीकृत प्रेषण योजना (लिबरलाइज्ड रेमिटेंस स्कीम-एलआरएस) में बदलाव करने का प्रस्ताव तैयार कर रहा है. इसमें पूंजी खाते के तहत विदेशों में होने वाले स्वचालित धन हस्तांतरण को समाप्त करने का प्रस्ताव भी शामिल है.

पूंजी खाते के तहत विदेश भेजी जाने वाली रकम का इस्तेमाल विदेशी संपत्तियां खरीदने और निवेश करने के लिए किया जाता है. यदि यह प्रस्ताव लागू होता है, तो भारतीय नागरिकों के लिए विदेशी शेयर बाजारों में निवेश करना मुश्किल हो सकता है. यह कदम लाइसेंस-परमिट राज के दौर की याद दिलाता है, जब सरकार आम नागरिकों के लिए विदेशी मुद्रा के आवंटन और इस्तेमाल पर कड़े प्रतिबंध लगाती थी.

एक अहम प्रस्ताव, लेकिन अंतिम फैसला नहीं

इस खबर के साथ एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि यह एक अज्ञात सूत्र के हवाले से सामने आई है. इसका मतलब है कि आरबीआई ने अभी तक इस संबंध में कोई अंतिम फैसला नहीं लिया है. लेखक के मुताबिक, मोदी सरकार के कार्यकाल में कई बार अज्ञात सूत्रों के जरिए संभावित फैसलों की जानकारी सार्वजनिक की गई है. इसे सरकार की ओर से किसी विवादित या अलोकप्रिय निर्णय पर जनता की प्रतिक्रिया परखने के तरीके के रूप में भी देखा जा सकता है. ऐसे में इस प्रस्ताव का अंतिम स्वरूप सार्वजनिक प्रतिक्रिया पर निर्भर कर सकता है.

हालांकि, इस तरह के कठोर कदम पर विचार किया जाना भारतीय अर्थव्यवस्था की मौजूदा चुनौतियों की ओर संकेत करता है. भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले अपने रिकॉर्ड निचले स्तर के करीब पहुंच गया है. पिछले कई महीनों से रुपये के 100 प्रति डॉलर के स्तर को पार करने की आशंका बनी हुई है. जून से आरबीआई रुपये की गिरावट रोकने के लिए लगातार हस्तक्षेप कर रहा है और इस प्रक्रिया में बड़ी मात्रा में विदेशी मुद्रा खर्च कर चुका है.

यदि प्रस्तावित प्रतिबंध लागू होते हैं, तो वे रुपये पर दबाव कम करने की इसी कोशिश का हिस्सा होंगे. इस महीने की शुरुआत में भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) ने भी रुपये को सहारा देने के लिए गैर-जरूरी विदेशी धन हस्तांतरण पर अंकुश लगाने और विदेशों में प्रत्यक्ष निवेश (ओडीआई) की अधिक जांच करने का सुझाव दिया था.

सरकार के सामने दोहरी चुनौती

डॉलर के मुकाबले रुपये का मूल्य 100 के स्तर तक पहुंचना सरकार के लिए राजनीतिक रूप से मुश्किल स्थिति पैदा कर सकता है. 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले नरेंद्र मोदी ने तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की सरकार पर रुपये की गिरती कीमत को लेकर तीखा हमला किया था. 2013 में उन्होंने तंज कसते हुए कहा था कि रुपया अस्पताल में है और आईसीयू में भर्ती है. उस समय डॉलर के मुकाबले रुपये का मूल्य मौजूदा स्तर की तुलना में लगभग आधा था.

विडंबना यह है कि मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद भी रुपया कई बार एशिया की सबसे कमजोर प्रदर्शन करने वाली मुद्राओं में शामिल रहा है.

लेखक के अनुसार, सरकार एक ओर रुपये को 100 प्रति डॉलर के स्तर तक पहुंचने से रोकना चाहती है, तो दूसरी ओर विदेशों में निवेश पर प्रतिबंध लगाने से उसके अपने मध्यमवर्गीय समर्थकों में नाराजगी पैदा हो सकती है.

भारतीय शेयर बाजार में लंबे समय से अपेक्षित तेजी नहीं आने के कारण मध्यमवर्ग के कई निवेशक अब विदेशों में निवेश के विकल्प तलाश रहे हैं. ब्लूमबर्ग की सितंबर में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक, इस साल भारत दुनिया के दूसरे सबसे खराब प्रदर्शन करने वाले उभरते बाजारों में शामिल रहा. विदेशी निवेशकों ने भी भारतीय बाजार से बड़ी मात्रा में पूंजी निकाली है. एक रिपोर्ट के मुताबिक, विदेशी संस्थागत निवेशकों की लगातार बिकवाली ने भारतीय शेयर बाजार पर दबाव बढ़ाया है.

प्रसिद्ध निवेशक आकाश प्रकाश ने भी इस स्थिति पर चिंता जताते हुए लिखा कि भारतीय शेयरों में तीन दशक से अधिक समय तक निवेश करने के बावजूद उन्होंने विदेशी निवेशकों की धारणा को शायद ही कभी इतना नकारात्मक देखा हो. ऐसे माहौल में विशेषज्ञ खुदरा निवेशकों को अपने निवेश के विकल्पों में विदेशी बाजारों को भी शामिल करने की सलाह देते रहे हैं.

लेखक का तर्क है कि यदि विदेशों में धन भेजने पर सीमा लगा दी जाती है, तो इससे मध्यमवर्गीय भारतीयों की संपत्ति बढ़ाने और निवेश में विविधता लाने की योजनाओं पर असर पड़ सकता है.

भाजपा का मध्यमवर्गीय वोट बैंक

लेख में निवेशक सौरभ मुखर्जी और उनके सहलेखकों की पुस्तक ब्रेकपॉइंट: द क्राइसिस ऑफ द मिडिल क्लास एंड द फ्यूचर ऑफ वर्क का उल्लेख किया गया है. इस पुस्तक में भारतीय मध्यमवर्ग के सामने रोजगार के घटते अवसरों, वेतन में ठहराव और तेजी से बढ़ते कर्ज जैसी चुनौतियों पर चर्चा की गई है. लेख के मुताबिक, इन आर्थिक परिस्थितियों के कारण 1991 के बाद पहली बार भारतीय मध्यमवर्ग की आर्थिक स्थिति कमजोर हो रही है.

हालांकि, लेखक का मानना है कि मध्यमवर्ग की आर्थिक चुनौतियों के साथ-साथ उसकी राजनीतिक स्थिति को समझना भी जरूरी है. उनके अनुसार, भारतीय राजनीति की मौजूदा संरचना ने मध्यमवर्ग के एक बड़े हिस्से को भाजपा के साथ जोड़ रखा है.

शोएब दानियाल लिखते हैं कि भारत के मध्यमवर्ग का बड़ा हिस्सा उच्च जाति के हिंदुओं से बना है. चुनावी आंकड़ों के कई विश्लेषणों में यह वर्ग भाजपा का सबसे मजबूत और भरोसेमंद समर्थक रहा है. राजनीतिक शोधकर्ता रुक्मिणी एस ने 2018 में अपने एक विश्लेषण में लिखा था कि जिस तरह अन्य दलों के लिए मुस्लिम वोट बैंक की चर्चा होती है, उसी तरह भाजपा के लिए उच्च जाति के हिंदुओं का समर्थन एक वास्तविक और मजबूत वोट बैंक के करीब है.

लेखक के मुताबिक, मध्यमवर्ग की यही राजनीतिक निष्ठा अब उसके लिए नुकसानदेह साबित हो रही है. उनका तर्क है कि भाजपा सरकार मध्यमवर्ग के समर्थन को सुनिश्चित मानकर चल रही है और उसकी आर्थिक परेशानियों को पर्याप्त महत्व नहीं दे रही है.

लेख में कहा गया है कि मध्यमवर्ग का भाजपा के प्रति समर्थन काफी हद तक सामाजिक पहचान और विचारधारा पर आधारित है, जबकि आर्थिक मुद्दों की भूमिका अपेक्षाकृत सीमित है. इसलिए, भाजपा को इस वर्ग की आर्थिक स्थिति कमजोर होने के बावजूद अपने समर्थन में बड़ी गिरावट की आशंका नहीं दिखती.

शोएब दानियाल का निष्कर्ष है कि विदेशों में निवेश पर संभावित प्रतिबंध इसी व्यापक राजनीतिक और आर्थिक स्थिति का हिस्सा हो सकता है, जिसमें सरकार रुपये को संभालने की कोशिश के साथ अपने मध्यमवर्गीय समर्थकों की आर्थिक आकांक्षाओं पर भी असर डालने वाला कदम उठा सकती है.

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