‘वह खाना खरीदने के लिए बाहर निकली थी’: मुंबई से एक और बंगाली महिला को जबरन बांग्लादेश भेजा गया

‘स्क्रॉल’ के मुताबिक, नवी मुंबई की रहने वाली 38 वर्षीय साहिदा फकीर को पुलिस ने "अवैध प्रवासी होने के संदेह" में हिरासत में लेने के बाद कथित तौर पर बांग्लादेश भेज दिया. उनके पति जुम्मन फकीर का कहना है कि साहिदा भारतीय नागरिक हैं और परिवार ने पुलिस को उनका जन्म प्रमाणपत्र, स्कूल प्रमाणपत्र, मतदाता पहचान पत्र और जमीन के दस्तावेज समेत कई प्रमाण दिए थे. इसके बावजूद उन्हें "बांग्लादेशी" बताकर बिना किसी नोटिस, जांच या अदालत के आदेश के सीमा पार भेज दिया गया.

19 जुलाई की शाम साहिदा अपने 10 वर्षीय बेटे को घर पर छोड़कर रात के खाने के लिए खाना खरीदने नवी मुंबई में अपने घर के पास बाजार गई थीं. वह वापस नहीं लौटीं. कुछ घंटों बाद उनके पति को मुंबई पुलिस की चेंबूर क्राइम ब्रांच से फोन आया कि साहिदा को "अवैध प्रवासी होने के संदेह" में हिरासत में लिया गया है.

जुम्मन पुलिस स्टेशन पहुंचे तो साहिदा ने बताया कि पुलिसकर्मी उन्हें जबरन एक ऐसी इमारत में ले गए, जहां कथित तौर पर "अवैध प्रवासियों" के रूप में संदिग्ध लोगों को रखा गया था. जुम्मन के मुताबिक, पुलिस ने उनके पास से खरीदा हुआ खाना, फोन और आधार कार्ड भी ले लिया. उनका आरोप है कि साहिदा को सिर्फ इसलिए हिरासत में लिया गया क्योंकि वह बंगाली थीं.

अगले चार दिनों तक जुम्मन अपनी पत्नी के पहचान संबंधी दस्तावेज लेकर पुलिस स्टेशन जाते रहे. उन्होंने साहिदा का जन्म प्रमाणपत्र भी पुलिस को दिया. लेकिन पुलिस ने इसे पर्याप्त नहीं माना और उनके माता-पिता के जन्म प्रमाणपत्र मांगे. जुम्मन के मुताबिक, उनके माता-पिता के समय जन्म प्रमाणपत्र बनवाने की व्यवस्था आम नहीं थी.

23 जुलाई को पांचवें दिन जुम्मन को बताया गया कि साहिदा वहां नहीं हैं और उन्हें बांग्लादेश भेज दिया गया है. कुछ दिनों बाद साहिदा ने बांग्लादेश से फोन कर बताया कि सतखीरा जिले में एक परिवार ने उन्हें शरण दी है.

'स्क्रॉल' ने मुंबई पुलिस आयुक्त और नवी मुंबई पुलिस आयुक्त से साहिदा की हिरासत के आधार के बारे में सवाल किए. पुलिस अधिकारियों ने सीधे जवाब नहीं दिया. मामले को संयुक्त पुलिस आयुक्त और फिर अतिरिक्त पुलिस आयुक्त को भेजा गया. पुलिस की प्रतिक्रिया मिलने पर खबर अपडेट किए जाने की बात कही गई है.

इस मामले में एक मानवाधिकार संगठन ने 23 जुलाई को कलकत्ता हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखकर साहिदा की कथित "अवैध गिरफ्तारी, मनमानी हिरासत, संवैधानिक सुरक्षा से वंचित करने और बांग्लादेशी बताए जाने" का मुद्दा उठाया. बांग्लार मानवाधिकार सुरक्षा मंच के सचिव किरीटी रॉय ने कहा कि केवल संदेह या पहचान के आधार पर कार्यपालिका किसी व्यक्ति को विदेशी नागरिक घोषित नहीं कर सकती. उन्होंने कहा कि साहिदा के पास भारतीय नागरिकता साबित करने वाले दस्तावेज होने के बावजूद उन्हें बिना मजिस्ट्रेट के सामने पेश किए हिरासत में रखना गंभीर मनमानी को दर्शाता है.

साहिदा के पति के पास उनकी पत्नी का 2008 में जारी मतदाता पहचान पत्र, 1988 में स्वरूपदाहा गांव में जन्म का प्रमाणपत्र, स्कूल प्रमाणपत्र और गोबिंदापुर गांव में उनके नाम दर्ज जमीन के दस्तावेज मौजूद हैं. साहिदा के माता-पिता के नाम 2002 की मतदाता सूची में भी दर्ज हैं. हालांकि, हालिया विशेष गहन पुनरीक्षण में साहिदा का नाम "निर्णयाधीन" के रूप में दर्ज किया गया है और उनके नाम को लेकर अपील संबंधित न्यायाधिकरण में लंबित है.

साहिदा के पिता और दादा का पैतृक गांव उत्तर 24 परगना का गोबिंदापुर है. गांव के निवासियों ने 5 अगस्त को जिलाधिकारी को पत्र लिखकर उन्हें तत्काल बांग्लादेश से वापस लाने की मांग की. पत्र में कहा गया कि साहिदा इसी गांव में पली-बढ़ी हैं और स्थानीय लोग उनके परिवार को कई पीढ़ियों से जानते हैं.

करीब 20 साल पहले साहिदा अपने पति के साथ रोजगार की तलाश में मुंबई चली गई थीं. वह घरेलू काम करती थीं, जबकि उनके पति कार साफ करने का काम करते हैं. उनके दो बेटे हैं.

27 जुलाई को जुम्मन ने बांग्लादेश से साहिदा से बात की. उनके मुताबिक, सतखीरा के सोनाबरिया इलाके में एक बांग्लादेशी परिवार ने उन्हें शरण दी है, लेकिन स्थानीय मीडिया में खबर आने के बाद उस परिवार पर दबाव बढ़ गया है. जुम्मन का कहना है कि वह स्थानीय लोगों की मदद से साहिदा को वापस ला सकते हैं, क्योंकि वह सीमा के दूसरी ओर नदी के पार ही हैं, लेकिन वह उन्हें कानूनी प्रक्रिया के जरिए भारत वापस लाना चाहते हैं. उनका कहना है कि साहिदा को बांग्लादेश भेजने के लिए पुलिस को जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए.

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