क्या नेपाल की तरह भारत को भी जातिगत अन्याय के लिए माफी मांगनी चाहिए?

'स्क्रॉल' के मुताबिक, नेपाल द्वारा दलितों के खिलाफ सदियों से चले आ रहे जातिगत अन्याय के लिए औपचारिक माफी मांगने के फैसले के बाद भारत में भी ऐसी माफी की मांग उठी है. सवाल यह है कि क्या भारत को भी जातिगत अन्याय के लिए औपचारिक रूप से माफी मांगनी चाहिए या केवल माफी के बजाय ऐतिहासिक नुकसान की भरपाई के लिए ठोस कदम उठाए जाने चाहिए.

भारत में जातिगत हिंसा, भेदभाव और आरक्षण पर बहस के दौरान अक्सर सवर्ण समुदायों की ओर से यह सवाल उठाया जाता है कि "मेरे पूर्वजों ने जो किया, उसकी कीमत मुझे क्यों चुकानी चाहिए?". जुलाई के अंत में सोशल मीडिया पर सामने आए "आरक्षण हटाओ आंदोलन" में भी जातिगत आरक्षण खत्म करने और "मेरिट" तथा समान प्रतिस्पर्धा की बात कही गई.

बोधि रामटेके के मुताबिक, ऐसी सोच जाति के कारण पीढ़ियों से भूमि, संपत्ति, शिक्षा, सामाजिक नेटवर्क और संस्थानों पर बने नियंत्रण को नजरअंदाज करती है. ऐतिहासिक असमानता से पैदा हुए परिणामों को आज समान प्रतिस्पर्धा का नतीजा बताने से जातिगत विशेषाधिकार की निरंतरता छिप जाती है.

इसी संदर्भ में नेपाल का फैसला महत्वपूर्ण है. नेपाल सरकार ने दलितों के खिलाफ सदियों से चले आ रहे जातिगत उत्पीड़न के लिए औपचारिक माफी देने का फैसला किया है. अप्रैल में आजाद समाज पार्टी के सांसद चंद्रशेखर आजाद ने संसद में सवाल उठाया था कि जब नेपाल दलितों से माफी मांग सकता है तो भारत ऐसा कब करेगा.

माफी बनाम पुनरुत्थानात्मक न्याय

भारत अगर नेपाल की तरह माफी मांगता है तो इसे केवल प्रतीकात्मक कदम नहीं होना चाहिए. इसके लिए संसद का प्रस्ताव और केंद्र सरकार की ओर से औपचारिक बयान होना चाहिए, जिसमें अस्पृश्यता और जातिगत उत्पीड़न को कायम रखने में राज्य तथा सामाजिक संस्थाओं की भूमिका को स्वीकार किया जाए.

इसके साथ ही प्रभुत्वशाली जातियों और उन धार्मिक-सामाजिक संस्थाओं की जिम्मेदारी स्वीकार की जानी चाहिए, जिन्होंने जाति व्यवस्था को वैधता दी और उससे लाभ उठाया. लेकिन केवल माफी न्याय का विकल्प नहीं हो सकती. ऐतिहासिक अन्याय को स्वीकार करने के साथ उसके भौतिक और संस्थागत प्रभावों की भरपाई भी जरूरी है.

भारत के संदर्भ में इसका मतलब जाति को केवल अतीत की सामाजिक बुराई मानने के बजाय ऐसी ऐतिहासिक व्यवस्था के रूप में स्वीकार करना है, जिसने श्रम, संसाधनों, शिक्षा और सम्मान तक पहुंच को असमान बनाया और जिसका प्रभाव आज भी दिखाई देता है.

आधुनिक भारत में जाति का असर

अस्पृश्यता खत्म किए जाने के संवैधानिक प्रावधान और सामाजिक न्याय की नीतियों के बावजूद जातिगत भेदभाव के उदाहरण सामने आते रहे हैं. ओडिशा के केंद्रापड़ा जिले में नवंबर 2025 से करीब तीन महीने तक अभिभावकों ने आंगनवाड़ी का बहिष्कार किया, क्योंकि वहां एक दलित महिला को रसोइया नियुक्त किया गया था.

मध्य प्रदेश में इस साल एक दलित दूल्हे को घोड़ी से उतारकर पीटे जाने की घटना भी सामने आई. जातिगत आरक्षण के खिलाफ लगातार होने वाला विरोध भी इसी सामाजिक तनाव का एक हिस्सा है.

ऐतिहासिक रूप से जाति और अस्पृश्यता ने पानी, जमीन, संपत्ति और ज्ञान तक पहुंच निर्धारित की. इसके परिणामस्वरूप आज भी भूमिहीनता, शिक्षा और स्वास्थ्य में असमानता, अलग-अलग बस्तियां, संपत्ति में अंतर और जातिगत हिंसा दिखाई देती है.

जातिगत अन्याय की भरपाई कैसे हो?

पनरुत्थानात्मक न्याय की शुरुआत इस स्वीकार से होनी चाहिए कि जिन समुदायों को पीढ़ियों तक संसाधनों, सम्मान, श्रम के उचित मूल्य और समान अवसरों से वंचित किया गया, उनके प्रति समाज की जिम्मेदारी है.

इसके तहत जाति के इतिहास और उसके प्रभावों को शिक्षा व्यवस्था में सही तरीके से शामिल करना होगा. पाठ्यक्रमों, अभिलेखों और संवैधानिक शिक्षा के माध्यम से जातिगत उत्पीड़न तथा इसके खिलाफ हुए आंदोलनों का दस्तावेजीकरण जरूरी है. संग्रहालयों, स्मारकों और सार्वजनिक स्मृति के माध्यम से वंचित समुदायों के अनुभवों को भी दर्ज किया जाना चाहिए.

दूसरा कदम ऐतिहासिक रूप से हुए नुकसान का आकलन होना चाहिए. इसमें जमीन, मजदूरी, शिक्षा, सम्मान, सार्वजनिक जीवन में भागीदारी और समान नागरिक अधिकारों से वंचित किए जाने को शामिल करना होगा. साथ ही प्रभुत्वशाली जातियों को अपने ऐतिहासिक और विरासत में मिले सामाजिक-आर्थिक लाभों को स्वीकार करना होगा.

तीसरा, मौजूदा कल्याणकारी और सकारात्मक भेदभाव की नीतियों को केवल सरकारी योजनाओं के रूप में नहीं, बल्कि ऐतिहासिक अन्याय को दूर करने की जिम्मेदारी के रूप में देखा जाना चाहिए.

राष्ट्रीय एकता और बंधुत्व

डॉ. भीमराव आंबेडकर के लिए बंधुत्व का अर्थ सभी भारतीयों के बीच साझा भाईचारा और समानता की भावना था. इसका मतलब केवल शांतिपूर्वक साथ रहना नहीं, बल्कि सामाजिक पदानुक्रम को खत्म कर नागरिकों के बीच बराबरी का संबंध स्थापित करना था.

सच्चा बंधुत्व तभी संभव है जब राष्ट्रीय एकता को न्याय, सत्य और जिम्मेदारी के साथ जोड़ा जाए. जाति व्यवस्था से लाभ पाने वाले समुदायों को इस ऐतिहासिक अन्याय की जिम्मेदारी स्वीकार करनी होगी.

केवल औपचारिक माफी पर्याप्त नहीं है. भारत को यह सवाल उठाना होगा कि सदियों में दलित समुदायों से क्या छीना गया, स्वतंत्र भारत ने विरासत में मिली असमानताओं को किस तरह कायम रखा और अस्पृश्यता खत्म करने के संवैधानिक निर्णय के बावजूद पुराने नुकसान की भरपाई क्यों नहीं हुई.

भारत को केवल औपचारिक पश्चाताप के बजाय जातिगत अन्याय का व्यापक नैतिक और लोकतांत्रिक मूल्यांकन करना चाहिए. पुनरुत्थानात्मक न्याय को समानता, सम्मान और संवैधानिक अधिकारों की वास्तविक स्थापना के लिए राष्ट्र निर्माण की बुनियादी प्रक्रिया का हिस्सा बनाया जाना चाहिए.

बोधि रामटेके वकील, एक्टिविस्ट-स्कॉलर और जमीनी स्तर के सामाजिक कार्यकर्ता हैं. वह पूर्व इरास्मस मुंडस स्कॉलर रहे हैं और उनका शोध विशेष रूप से दलित समुदायों के संदर्भ में पुनरुत्थानात्मक न्याय पर केंद्रित है.

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