कहानी का प्लॉट खो गया: कैसे भगवा पार्टी के माहिर कहानीकारों के पास कहानी खत्म हो गई

निहार नलिनी सारंगी के मुताबिक, हर प्रभुत्वशाली राजनीतिक मशीन के सामने आखिरकार एक ही संरचनात्मक समस्या आती है: जिन औजारों ने उसका प्रभुत्व बनाया, वे जरूरी नहीं कि उसे बनाए रखने के लिए भी काम आएं. पिछले एक दशक में भारतीय जनता पार्टी का उभार बड़े पैमाने पर नैरेटिव इंजीनियरिंग की उपलब्धि रहा है — यानी हर बातचीत की दिशा तय करने की ऐसी क्षमता, जिसमें विपक्ष पिछली बात का जवाब देना भी पूरा नहीं कर पाता और सत्ता पक्ष अगली कहानी तय कर चुका होता है. अभी जो हो रहा है, वह कोई एक घोटाला या खबरों का कोई एक खराब दौर नहीं है. यह कुछ धीमा है: मशीनरी खुद अपनी गति और ताकत खो रही है. कोई घोटाला मौसम की एक घटना है. लेकिन मशीन का अपनी ताकत खोना एक बीमारी का निदान है.

बिना संपर्क की कमान

पार्टी का मूल नवाचार ऐसा नेता था, जो हर जगह दिखाई देता था और किसी एक व्यक्ति या संस्था के सामने जवाबदेह नहीं दिखता था . रैलियां, एकालाप, चुनिंदा साक्षात्कार, संचार की एकतरफा धारा, जिसे विपक्ष कभी ठीक से बाधित नहीं कर पाया. यह मॉडल एक शर्त पर निर्भर करता है: नेता के पास मंच का नियंत्रण हो. भारतीय लोकतंत्र में संसद वह एक मंच है, जहां उसके पास यह नियंत्रण नहीं है. इसे अपनी सुविधा के हिसाब से तय नहीं किया जा सकता, संपादित नहीं किया जा सकता और न ही बीच में वाक्य अधूरा छोड़कर इससे बाहर निकला जा सकता है.

यही वजह है कि हाल में दिखाई दिया परहेज का पैटर्न संवैधानिक रूप से जिन बैठकों का सामना करना मंत्रियों के लिए जरूरी है, उनसे उनकी अनुपस्थिति और जवाबदेही तब दिखाना, जब राजनीतिक कैलेंडर उसे सुरक्षित बना दे . महज रणनीतिक सावधानी से कहीं अधिक दिखाई देता है. जिस कमरे को ही एकतरफा संवाद की इस मशीन का सामना करने के लिए बनाया गया है, वहीं उसकी मूल कार्यप्रणाली विफल होती नजर आ रही है. आदेश और नियंत्रण की राजनीति किसी प्रसारण पर हावी हो सकती है. लेकिन जिस सदन की बहस को पहले से लिखकर नियंत्रित नहीं किया जा सकता, उसका उसके पास कोई स्वाभाविक जवाब नहीं है.

प्रतीकों की थकान

एक दशक तक पार्टी की सबसे खास राजनीतिक रणनीति यह रही कि विवादित नीतियों को स्थापित पहचान में बदल दिया जाए. विधायी सवाल को राष्ट्रवाद, आस्था और इस सवाल पर जनमत संग्रह में बदल देना कि वास्तव में कौन इस देश का हिस्सा है. यह रूपांतरण तभी तक काम करता है, जब तक वे प्रतीक शासन की सामान्य भ्रष्टताओं से अछूते बने रहें.

मंदिर के इर्द-गिर्द राजनीतिक पहचान बनाना एक बात है. लेकिन उसी संस्था पर लगे कथित चोरी के आरोपों को समझाना दूसरी बात है, जिसे ईमानदारी और पवित्रता का प्रतीक बनाने के लिए खड़ा किया गया था. जब कोई पवित्र प्रतीक रैली के नारे का आधार होने के बजाय संसद में पूछे जाने वाले सवाल का विषय बन जाता है, तो उसकी राजनीतिक उपयोगिता उलट जाती है. वह बहस खत्म नहीं करता, बल्कि बहस शुरू कर देता है.

ऐसा विपक्ष जिसने इंतजार करना सीख लिया

शायद इस राजनीतिक फीकेपन का सबसे कम आंका गया कारण वह नहीं है, जो भाजपा ने किया, बल्कि वह है, जो उसके विरोधियों ने करना बंद कर दिया. वर्षों तक विपक्ष सरकार द्वारा तय किए गए समाचार चक्र पर प्रतिक्रिया देता रहा, जिसका मतलब था कि वह हमेशा उस मशीन से एक कदम पीछे रहता था, जो गति के लिए बनाई गई थी. अब जो बदला है, वह है धैर्य. ऐसा विपक्ष, जो किसी अनुत्तरित सवाल को हफ्तों तक सामने रख सकता है, जो हर सत्र में एक खाली मंत्री की कुर्सी को अपने आप अर्थ पैदा करने देता है, एक अलग खेल खेल रहा है. ऐसा खेल जिसमें तेजी से ज्यादा धैर्य और निरंतरता मायने रखती है.

तेज समाचार चक्र के लिए तैयार की गई नैरेटिव मशीन के पास ऐसे प्रतिद्वंद्वी का कोई स्वाभाविक जवाब नहीं है, जिसने बस धीमा, लगातार और दृढ़ बने रहने का फैसला कर लिया हो. क्षरण, किसी वायरल क्षण की तरह, संदेशों से नहीं रोका जा सकता. उसका मुकाबला केवल इंतजार करके किया जा सकता है और हाल के दिनों में विपक्ष ने साबित किया है कि वह इंतजार करने में बेहतर है.

यह फीका पड़ना क्या नहीं है

इसे भाजपा के अंतिम पतन के रूप में पढ़ना एक गलती होगी और बौद्धिक रूप से आलसी निष्कर्ष भी. भाजपा के पास आज भी ऐसा संगठनात्मक विस्तार, कैडर नेटवर्क और मीडिया तंत्र है, जिसका कोई प्रतिद्वंद्वी मुकाबला नहीं करता. ये फायदे इससे भी कठिन राजनीतिक दौर झेल चुके हैं और यह गंभीर तर्क मौजूद है कि आज का व्यवधान ठीक उसी तरह का शोर है, जिसे पार्टी पहले भी झेल चुकी है और जिसके बाद वह और मजबूत होकर उभरी है. संसदीय गतिरोध भी निष्पक्ष रूप से देखें तो दोतरफा विफलता है वॉकआउट पर आधारित विपक्षी रणनीति की अपनी संस्थागत कीमत है और इसे सिद्धांत के बजाय महज अवरोध के रूप में देखे जाने का अपना जोखिम भी है.

यहां जिस फीकेपन की बात की जा रही है, वह ज्यादा सीमित और सटीक है: यह सत्ता के पतन की बात नहीं है, बल्कि उस एक चीज के स्पष्ट रूप से कमजोर पड़ने की बात है, जिसने इस मशीन को अजेय जैसा महसूस कराया था. हर कहानी को अपनी शर्तों पर खत्म करने की उसकी क्षमता.

असली संकेत

पार्टी के रणनीतिकारों को किसी एक विवाद से नहीं, बल्कि इस बदलाव से चिंतित होना चाहिए कि अब नियंत्रण आखिर कहां है. एक दशक तक भाजपा तय करती थी कि देश किस मुद्दे पर बहस करेगा. मानसून सत्र में पहली बार लंबे समय बाद विपक्ष एजेंडा तय करता दिखाई दिया. उसने सरकार को प्रतिक्रिया देने, हिसाब लगाने और संवाद का ऐसा प्रस्ताव तैयार करने के लिए मजबूर किया, जिसे उस समय रखा जा सके जब उसकी राजनीतिक कीमत सबसे कम हो. शर्तें तय करने के लिए बनी एक मशीन कुछ समय के लिए उन्हीं शर्तों पर प्रतिक्रिया देने तक सीमित हो गई.

यह उलटफेर चाहे जितने समय के लिए हो, असली कहानी यही है. राजनीति में जो व्यक्ति कहानी की शर्तें तय करता है, वह आमतौर पर नतीजे को भी नियंत्रित कर लेता है और एक दशक में पहली बार, कलम भगवा खेमे के हाथ में नहीं है.

निहार नलिनी सारंगी का यह लेख हिंदी में अनूदित है. मूल अंग्रेजी लेख यहां पढ़ सकते हैं

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