तेलंगाना एसआईआर: बीएलओ पर बिना आवेदक के हस्ताक्षर वाले फॉर्म-7 स्वीकार करने का बनाया जा रहा दबाव
‘द हिंदू’ में वी. स्वाति की रिपोर्ट है कि थोक में नाम हटाने के आवेदनों से जुड़े मुशीराबाद मामले के सार्वजनिक होने के बाद भी, मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के दावे और आपत्ति चरण के दौरान बूथ स्तर के अधिकारियों (बीएलओ) के पास अभी भी प्री-प्रिंटेड फॉर्म 7 आवेदन लाए जा रहे हैं, लेकिन उन पर आवेदकों के हस्ताक्षर नहीं हैं.
मुशीराबाद के बाद बहादुरपुरा और गोशामहल में सामने आए लगातार मामलों में, प्री-प्रिंटेड आवेदन फॉर्म बिना हस्ताक्षर के पाए गए थे. एक ताज़ा मामले में, गोशामहल निर्वाचन क्षेत्र की निर्वाचक पंजीकरण अधिकारी (ईआरओ) ने फॉर्म-7 के थोक में जमा किए जाने के खिलाफ आवाज उठाई और चेतावनी दी कि यदि बूथ स्तर के अधिकारियों पर ऐसे फॉर्म स्वीकार करने का दबाव बनाया गया तो राजनीतिक दलों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी.
ईआरओ उमा प्रकाश ने राजनीतिक दलों के साथ संवाद के लिए बनाए गए एक व्हाट्सएप ग्रुप में संदेश पोस्ट करते हुए कहा कि साईं किरण नाम का एक विशेष बीएलए (बूथ लेवल एजेंट) बीएलओ के पास कुल 180 आवेदन फॉर्म लाया और उन्हें स्वीकार करने के लिए दबाव बनाया. उन्होंने चेतावनी दी कि यदि दबाव बनाने की रणनीति जारी रही, तो आपराधिक मामले दर्ज किए जाएंगे.
संदेश का स्क्रीनशॉट सोशल मीडिया पर व्यापक रूप से साझा किया गया, जिससे मतदाताओं के नाम बड़े पैमाने पर हटाने के लिए अभी भी जारी संगठित प्रयासों का खुलासा हुआ. सभी मामलों में, यह आरोप लगाया गया है कि बूथ एजेंट भारतीय जनता पार्टी का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं, जबकि वे सभी मतदाता जिनके नाम हटाए जाने की मांग की गई थी, मुस्लिम थे, जो एक स्पष्ट राजनीतिक विभाजनकारी पहलू को उजागर करता है.
जब प्रकाश से उनका पक्ष जानने के लिए संपर्क किया गया, तो उन्होंने कहा कि एजेंट बिना हस्ताक्षर और बिना किसी दस्तावेज़ी प्रमाण के फॉर्म ला रहे थे और बूथ स्तर अधिकारियों को उन्हें स्वीकार करने के लिए मजबूर कर रहे थे.
थोक में नाम हटाने की साजिश का खुलासा सबसे पहले मुशीराबाद में हुआ था, जब भाजपा का एक बूथ एजेंट एक ही परिवार के मतदाताओं के नाम हटाने की मांग करते हुए 30 आवेदन फॉर्म (फॉर्म-7) लाया था. सत्यापन के लिए गए बीएलओ को यह दावा गलत मिला, जिसके बाद चुनाव अधिकारियों ने एजेंट के खिलाफ कार्रवाई की. इस घटना के सामने आने के बाद, ऐसे कई मामले उजागर हुए, जिससे पूरी प्रक्रिया की पवित्रता पर सवाल खड़े हो गए हैं.

