ईरान का साथ छोड़ने के लिए भारत ने जो कीमत चुकाई
आनंद तेलतुंबडे ने भारत-ईरान संबंधों के पतन का एक विस्तृत और आलोचनात्मक विश्लेषण किया है. उनका मुख्य तर्क यह है कि मोदी सरकार ने अमेरिकी दबाव के आगे घुटने टेककर न केवल एक ऐतिहासिक मित्र खो दिया है, बल्कि भारत के दीर्घकालिक रणनीतिक और आर्थिक हितों को भी गहरी क्षति पहुँचाई है.
लेख की शुरुआत भारत और ईरान के बीच हजारों साल पुराने संबंधों के उल्लेख से होती है. उनका कहना है कि यह रिश्ता केवल कूटनीतिक औपचारिकता नहीं था, बल्कि सभ्यतागत था. सिंधु घाटी सभ्यता से लेकर मुगल काल तक, फारसी भाषा और संस्कृति भारतीय शासन, साहित्य और संगीत (विशेषकर सूफी परंपरा) का अभिन्न हिस्सा रही. स्वतंत्रता के बाद भी, भारत ने 1950 में ईरान के साथ अपनी शुरुआती मित्रता संधियों में से एक पर हस्ताक्षर किए थे. उनका मानना है कि वर्तमान सरकार ने इन गहरे सांस्कृतिक और ऐतिहासिक बंधनों की अनदेखी कर दी है.
ईरान भारत के लिए ऊर्जा का एक विश्वसनीय और सस्ता स्रोत था. 1990 से 2018 के बीच, वह भारत का दूसरा या तीसरा सबसे बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता था. ईरान न केवल तेल देता था, बल्कि माल ढुलाई में छूट, लंबी उधारी और सबसे महत्वपूर्ण रूप से 'रुपया भुगतान प्रणाली' की सुविधा देता था, जिससे भारत का विदेशी मुद्रा भंडार सुरक्षित रहता था.
तेलतुंबडे फरज़ाद-बी गैस क्षेत्र का उदाहरण देते हुए बताते हैं कि कैसे भारतीय पूंजी और इंजीनियरों ने इसकी खोज की, लेकिन मोदी सरकार के "कॉम्प्राडोर पक्षाघात" (दबाव में निर्णय न ले पाना) के कारण भारत ने इस 6.2 बिलियन डॉलर के अवसर को खो दिया. 2021 में ईरान ने यह ठेका अपनी स्थानीय कंपनी को दे दिया, जिससे भारत के करोड़ों डॉलर का निवेश डूब गया.
भारत के लिए ईरान का सबसे बड़ा महत्व 'भूगोल' था. पाकिस्तान को दरकिनार कर अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुँचने के लिए ईरान एकमात्र जमीनी रास्ता प्रदान करता था. इसी रणनीतिक सोच के तहत चाबहार बंदरगाह का विकास किया गया था.
चाबहार बंदरगाह 'अंतर्राष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारा' (आईएनएसटीसी) का दक्षिणी द्वार था, जो मुंबई को मास्को से जोड़ता. इससे परिवहन समय और लागत में 30-40% की कमी आती.
भारत ने चाबहार-जाहेदान रेलवे और अफगानिस्तान में जरंज-देलाराम राजमार्ग बनाकर एक ऐसा गलियारा तैयार किया था जो चीन के 'बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव' (बीआरआई) और 'सीपीईसी' (चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा) का एकमात्र प्रभावी मुकाबला था. लेकिन चाबहार को छोड़ना मध्य एशिया में चीनी प्रभुत्व के सामने आत्मसमर्पण करने जैसा है.
मनमोहन सिंह सरकार और मोदी सरकार के बीच एक तीखी तुलना करते हुए वह लिखते हैं कि 2011-12 में भी अमेरिका ने ईरान पर कड़े प्रतिबंध लगाए थे. लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री ने संप्रभु स्वायत्तता का परिचय देते हुए सार्वजनिक रूप से कहा कि भारत तेल आयात जारी रखेगा. उन्होंने अमेरिकी डॉलर के तंत्र से बचते हुए 'यूको बैंक' के माध्यम से रुपया भुगतान प्रणाली विकसित की. यह एक स्वतंत्र राष्ट्र का आचरण था. जबकि 2018 में जब ट्रम्प ने प्रतिबंध लगाए, तो मोदी सरकार ने बिना किसी प्रतिरोध के तेल आयात शून्य कर दिया. तेलतुंबडे इसे "व्यावहारिक" होने के नाम पर रणनीतिक आपदा बताते हैं.
लेख में हालिया घटनाओं (2025-26) को भारत की विदेश नीति का सबसे काला अध्याय बताया गया है. मसलन, चाबहार से विदाई. अमेरिका द्वारा प्रतिबंधों की छूट रद्द किए जाने के बाद भारत ने विरोध करने के बजाय चाबहार परियोजना से किनारा करना शुरू कर दिया. 2026-27 के बजट में इस परियोजना के लिए 'शून्य' राशि आवंटित की गई. वह आशंका जताते हैं कि जिस बंदरगाह को भारत ने चीन को रोकने के लिए बनाया था, उसे अब चीन ही संचालित कर सकता है.
लेख के अनुसार, भारत-ईरान में एक तरह से यह द्विपक्षीय व्यापार का अंत है. जो व्यापार कभी 17 बिलियन डॉलर था, वह गिरकर 1.68 बिलियन डॉलर रह गया. ईरान के साथ व्यापार गिर रहा है, वहीं इजरायल की ओर झुकाव दिखाई पड़ रहा है. फरवरी 2026 में मोदी की इजरायल यात्रा और उसके तुरंत बाद ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामेनेई पर अमेरिकी-इजरायली हमले ने आग में घी का काम किया. भारत द्वारा हमले की निंदा न करना और खामेनेई की मृत्यु पर शोक व्यक्त न करना, ईरान के साथ संबंधों के ताबूत में आखिरी कील साबित हुआ.
निष्कर्ष यह है कि भारत ने अपनी ऊर्जा विविधता खो दी है और अब वह महंगे अमेरिकी और खाड़ी तेल पर निर्भर है. मध्य एशिया में भारत की विश्वसनीयता खत्म हो गई है और पाकिस्तान व चीन की स्थिति मजबूत हुई है.
आनंद तेलतुंबडे के अनुसार, भारत अब एक संप्रभु शक्ति के बजाय एक अधीनस्थ राज्य की तरह व्यवहार कर रहा है, जिसने अपनी दशकों की मेहनत और रणनीतिक बढ़त को केवल अमेरिका और इजरायल को खुश करने के लिए दांव पर लगा दिया है. यह नुकसान केवल आर्थिक नहीं, बल्कि अस्तित्वगत और कूटनीतिक है, जिसकी भरपाई निकट भविष्य में असंभव लगती है. अंग्रेजी में यह लंबा लेख यहां पढ़ा जा सकता है.
(आनंद तेलतुंबडे पीआईएल के पूर्व सीईओ, आईआईटी खड़गपुर और जीआईएम गोवा के प्रोफेसर हैं. वे एक लेखक और नागरिक अधिकार कार्यकर्ता भी हैं.)

