पाकिस्तान की मौजूदा वैश्विक प्रतिष्ठा उसके घरेलू पतन को नहीं छिपा सकती

‘द कारवां’ सुशांत सिंह ने लिखा है कि तुर्किये और सऊदी अरब के साथ मक्का संयुक्त रक्षा समझौते के बाद पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई रणनीतिक अहमियत मिली है, लेकिन यह कूटनीतिक उपलब्धि देश के भीतर बढ़ते राजनीतिक दमन, आर्थिक संकट और संस्थागत अस्थिरता की वास्तविकता को नहीं ढक सकती. यह समझौता पाकिस्तान को पश्चिम एशिया और दक्षिण एशिया की बदलती भू-राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका देता है. तुर्किये सैन्य क्षमता और रक्षा विशेषज्ञता, सऊदी अरब आर्थिक ताकत और पाकिस्तान परमाणु हथियारों से लैस बड़ी पेशेवर सेना तथा सुरक्षा सहयोग का अनुभव लेकर इस साझेदारी में शामिल हैं.

लेख के मुताबिक, समझौते की पूरी शर्तें सार्वजनिक नहीं हुई हैं, लेकिन इसका महत्व पाकिस्तान की सेना के लिए खास है. सेना प्रमुख असीम मुनीर इसे पाकिस्तान की बढ़ती अंतरराष्ट्रीय स्वीकार्यता के तौर पर पेश कर सकते हैं. इससे सेना को घरेलू राजनीतिक और आर्थिक संकट के बीच अपनी स्थिति मजबूत करने का अवसर मिलता है. लेखक का तर्क है कि ऐसे हर कूटनीतिक लाभ से सैन्य प्रतिष्ठान को अस्थायी राहत मिलती है, जबकि देश के भीतर राजनीतिक दमन और आर्थिक बदहाली गहराती जा रही है.

इसी पृष्ठभूमि में पाकिस्तान में मौजूदा चार प्रांतों को खत्म कर कई छोटे प्रशासनिक इकाइयां बनाने की चर्चा भी तेज हुई है. संघीय आंतरिक सुरक्षा मंत्री मोहसिन नकवी ने चार प्रांतों की मौजूदा व्यवस्था को बदलने का प्रस्ताव रखा है. उन्हें सेना के करीब माना जाता है और सैन्य प्रवक्ता ने भी इस विचार का समर्थन किया है. अलग-अलग प्रस्तावों में पंजाब को पांच, सिंध को तीन, खैबर पख्तूनख्वा को तीन और बलूचिस्तान को दो इकाइयों में बांटने जैसे विकल्प सामने आए हैं.

छोटे प्रांत बनाने के पक्ष में सबसे मजबूत तर्क प्रशासनिक है. पाकिस्तान की मौजूदा संघीय व्यवस्था में पंजाब का प्रभाव उसकी बड़ी आबादी, कारोबार, नौकरशाही, राजनीतिक नेटवर्क और सैन्य भर्ती में हिस्सेदारी के कारण बहुत अधिक है. सिंध में कराची और ग्रामीण सिंध के बीच प्रतिनिधित्व तथा संसाधनों को लेकर लंबे समय से तनाव है. खैबर पख्तूनख्वा में सामान्य जिलों और पूर्व कबायली क्षेत्रों की अलग प्रशासनिक पृष्ठभूमि तथा सुरक्षा संबंधी समस्याएं हैं. वहीं बलूचिस्तान विशाल क्षेत्रफल, कम आबादी और कमजोर राजनीतिक-आर्थिक एकीकरण से जूझता रहा है.

इस लिहाज से छोटे प्रांत बेहतर प्रतिनिधित्व और सार्वजनिक सेवाओं की उपलब्धता में सुधार ला सकते हैं. लेकिन लेखक के अनुसार, समस्या केवल प्रशासनिक नहीं है. प्रांतों की सीमाओं में बदलाव की मौजूदा कवायद के पीछे राजनीतिक इंजीनियरिंग का उद्देश्य भी देखा जाना चाहिए.

पाकिस्तान में सत्ता और संस्थानों के बीच शक्ति संतुलन लंबे समय से अस्थिर रहा है. सेना का राजनीतिक प्रभाव, कमजोर लोकतांत्रिक संस्थाएं, क्षेत्रीय असमानताएं और आर्थिक संकट एक-दूसरे को मजबूत करते हैं. ऐसे में प्रशासनिक पुनर्गठन अगर व्यापक राजनीतिक सहमति और लोकतांत्रिक प्रक्रिया के बजाय सत्ता प्रतिष्ठान की जरूरतों के हिसाब से किया जाता है, तो इससे संकट खत्म होने के बजाय नए क्षेत्रीय और राजनीतिक संघर्ष पैदा हो सकते हैं.

मक्का समझौता पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय मंच पर कुछ समय के लिए प्रभावशाली दिखा सकता है, लेकिन विदेश नीति की उपलब्धि घरेलू शासन की कमजोरियों का विकल्प नहीं बन सकती. वैश्विक प्रतिष्ठा और सैन्य साझेदारियां तभी स्थायी ताकत में बदल सकती हैं, जब उनके पीछे राजनीतिक स्थिरता, मजबूत लोकतांत्रिक संस्थाएं, बेहतर शासन और आर्थिक सुधार मौजूद हों. अन्यथा बाहरी सफलता केवल उस घरेलू संकट को कुछ समय के लिए ढकती रहेगी, जो पाकिस्तान के राजनीतिक और सामाजिक ढांचे को भीतर से कमजोर कर रहा है.

सुशांत सिंह पत्रकार और शोधकर्ता हैं. वे सुरक्षा, विदेश नीति और दक्षिण एशिया से जुड़े मुद्दों पर लिखते हैं. यह उनके मूल अंग्रेजी लेख का हिंदी में अनुदित अंश है.

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