श्रवण गर्ग | जो डराने वाले हैं, वो डरे हुए हैं
‘हरकारा डीप डाइव’ के लाइव एपिसोड में निधीश त्यागी ने वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग के साथ मानसून सत्र के आखिरी दिन से पहले संसद में बने गतिरोध और अमित शाह के बयान को लेकर चल रही सियासी खींचतान पर चर्चा की।
मानसून सत्र का आखिरी दिन अब सिर्फ एक संसदीय औपचारिकता नहीं रह गया है. तीन हफ्तों से संसद में अमित शाह के बयान की मांग कर रहा विपक्ष अब उस मुकाम पर पहुंच गया है, जहां सरकार के लिए पीछे हटना भी मुश्किल है और आगे बढ़ना भी. 20 जुलाई को बिहार में छात्रों पर हुई पुलिस कार्रवाई को लेकर राहुल गांधी और विपक्ष लगातार सवाल पूछ रहे हैं कि गोली चलाने का आदेश किसने दिया और अगर गृह मंत्री के आदेश के बिना यह हुआ, तो उनके नाक के नीचे इतना बड़ा घटनाक्रम कैसे हो गया.
श्रवण गर्ग के मुताबिक, अब असली सवाल यह है कि अमित शाह आखिरी दिन क्या करते हैं. उनका मानना है कि अगर शाह सदन में पहुंचते हैं और बयान पढ़ना शुरू करते हैं, तो विपक्ष उन्हें रोकने की कोशिश कर सकता है. ऐसी स्थिति में सरकार के पास बयान को रिकॉर्ड पर रखने का रास्ता होगा. दूसरी संभावना यह है कि स्पीकर चर्चा की अनुमति दें और सत्र को आगे बढ़ाया जाए.
अमित शाह ने सदन में प्रवेश करते समय मीडिया के जरिए विपक्ष को संदेश दिया कि वह अगले दिन 3 बजे तक जवाब देने को तैयार हैं. लेकिन राहुल गांधी ने साफ कर दिया कि विपक्ष को भाषण नहीं, सिर्फ दो सवालों का जवाब चाहिए. अगर गोली चलाने का आदेश शाह ने दिया तो इस्तीफा दें और अगर उनके आदेश के बिना गोली चली तो भी उन्हें जिम्मेदारी लेनी चाहिए.
श्रवण गर्ग इस पूरे घटनाक्रम को पिछले कुछ वर्षों के राजनीतिक बदलाव के संदर्भ में देखते हैं. उनके मुताबिक, जिस अमित शाह की छवि सदन में बेहद आक्रामक और निर्णायक नेता की रही है, उनकी मौजूदा बॉडी लैंग्वेज और सदन से दूरी अपने आप में राजनीतिक संकेत है. वह कहते हैं, "जो डराने वाले हैं वो डरे हुए हैं."
उनके मुताबिक राहुल गांधी इस मौके को सिर्फ अमित शाह के बयान तक सीमित नहीं रखना चाहते. विपक्ष अब इस्तीफे की मांग तक पहुंच चुका है. साथ ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सदन में गैरमौजूदगी भी सवाल पैदा करती है. अगर विवाद गृह मंत्री से जुड़ा है, तो प्रधानमंत्री सदन में क्यों नहीं आ रहे हैं?
इस बीच श्रवण गर्ग ने अमित शाह के राजनीतिक भविष्य पर भी बड़ा सवाल उठाया. उनका कहना है कि छात्रों के आंदोलन से पहले तक "हू आफ्टर मोदी" की बहस में अमित शाह को सबसे मजबूत विकल्प माना जाता था, लेकिन मौजूदा घटनाक्रम ने उनकी राजनीतिक छवि को बड़ा नुकसान पहुंचाया है.
वह परिसीमन विधेयक को लेकर भी कहते हैं कि अब वह खत्म हो चुका है. तमिलनाडु विधानसभा में इसके खिलाफ प्रस्ताव और डीएमके के समर्थन को वह सरकार के लिए बड़ा झटका मानते हैं.
अब आखिरी सवाल यह है कि सरकार इस पूरे संकट का सामना किस तरह करेगी. क्या अमित शाह सदन में बयान देंगे, क्या विपक्ष को चर्चा का मौका मिलेगा या फिर पूरा मामला हंगामे और स्थगन में खत्म हो जाएगा? श्रवण गर्ग के शब्दों में, "शाह और मात है." और अगर ऐसा हुआ, तो यह अमित शाह के करीब 40 साल के राजनीतिक करियर में शायद पहली बार होगा जब उनकी राजनीतिक पकड़ पर इतना बड़ा सवाल खड़ा होगा.पूरी बातचीत यहां सुन सकते हैं.

