वंदे मातरम् की सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल की ‘नक्सली’ टिप्पणी पर डॉ. मुरलीधर ने जताई आपत्ति

डेबी जैन के अनुसार, याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. एस. मुरलीधर ने कहा कि संशोधन में यह परिभाषित नहीं किया गया है कि "राष्ट्रीय गीत" क्या था, और इस अस्पष्टता से इसका दुरुपयोग हो सकता है. उन्होंने आगे कहा कि गृह मंत्रालय का कार्यालय ज्ञापन राजपत्र (गेजेट) में प्रकाशित नहीं किया गया है.

इस पर न्यायमूर्ति बागची ने इशारा किया कि अमेरिकी राष्ट्रगान में "इन गॉड वी ट्रस्ट" (हम ईश्वर में विश्वास करते हैं) शब्दों का उपयोग होता है, हालांकि संयुक्त राज्य अमेरिका को सकारात्मक धर्मनिरपेक्षता के एक मॉडल के रूप में उद्धृत किया जाता है. इसके बाद भारत के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने हस्तक्षेप करते हुए याचिका पर अपनी असहमति जताई और कहा कि "धर्मनिरपेक्षता इतनी संकीर्ण नहीं हो सकती."

मुरलीधर ने फिर से ध्यान दिलाया कि संशोधन में "राष्ट्रीय गीत" क्या था, इसे परिभाषित नहीं किया गया है. न्यायमूर्ति बागची ने जवाब दिया कि पारंपरिक रूप से इसे "वंदे मातरम्" के रूप में समझा गया है. मुरलीधर ने तुरंत जवाब दिया, "केवल दो छंदों (स्तबकों) के साथ." वरिष्ठ वकील ने कहा कि "वंदे मातरम्" से जुड़ी इस समझ को सरकार ने एक कार्यालय ज्ञापन के माध्यम से अचानक बदल दिया है. मुरलीधर ने आगे कहा कि कोई भी राष्ट्रीय आम सहमति बनाए बिना इस संशोधन को जल्दबाजी में पारित किया गया है.

सॉलिसिटर जनरल ने इस बिंदु पर टिप्पणी की कि "कानून बनाना नक्सलियों के विचार के अनुसार नहीं हो सकता." मुरलीधर ने "नक्सली" वाली टिप्पणी पर कड़ा ऐतराज जताया और मांग की कि सॉलिसिटर जनरल इसे वापस लें. उन्होंने कहा कि इस तरह की टिप्पणी किसी विधि अधिकारी (लॉ ऑफिसर) को शोभा नहीं देती. हालांकि सॉलिसिटर जनरल अपने रुख पर कायम रहे और कहा कि वह उन लोगों का जिक्र कर रहे थे जो कानून बनाने की प्रक्रिया का सम्मान नहीं कर रहे थे.

सॉलिसिटर जनरल ने पीठ से याचिका पर नोटिस जारी न करने का भी आग्रह किया और कहा कि इससे यह मुद्दा "सनसनीखेज" बन जाएगा. उन्होंने याचिकाकर्ता को इसके बजाय याचिका की एक प्रति उन्हें सौंपने (सर्व करने) के लिए कहा.

केंद्र सरकार से अपना जवाब दाखिल करने के लिए कहते हुए न्यायमूर्ति बागची ने कहा, "मिस्टर सॉलिसिटर, हम नोटिस जारी करने के पक्ष में नहीं हैं. लेकिन, हम उम्मीद करेंगे कि देश का कानून, जैसा कि इस अदालत द्वारा 'बिजोई इमैनुएल' मामले में घोषित किया गया है, इस अधिनियम को संचालित करेगा. राष्ट्रीय गीत क्या है, इस पर कोई विवाद नहीं है. बिजोई इमैनुएल में कानून की घोषणा पर अभी तक कोई सवाल नहीं उठाया गया है. यह लोकतांत्रिक राज्य को तय करना है कि राष्ट्रीय गीत क्या है—चाहे दो छंद हों या चार छंद. लेकिन कोई भी व्यक्ति जो अनुच्छेद 25, 26 के अधिकारों का उल्लंघन महसूस करता है या जो विवेक के आधार पर विरोध (कंसीएंशियस ऑब्जेक्टर) करने वाला व्यक्ति है, उसे दंडात्मक परिणामों के अधीन नहीं किया जाएगा. राष्ट्रीय भावना या वंदे मातरम् से जुड़ी आकांक्षाएं क्या हैं, इसका अंदाजा लगाना अदालत का काम नहीं है. यह राज्य के लिए है. विवेक के आधार पर विरोध करने वाले व्यक्ति को एक या सभी छंद न गाने का फैसला नहीं करना है, और राज्य उस पर कोई आपराधिक कार्रवाई नहीं करने जा रहा है."

सुनवाई खत्म होने के बाद मुरलीधर ने सॉलिसिटर जनरल की ‘नक्सली’ वाली टिप्पणी पर फिर से आपत्ति जताई और मांग की कि वह इसे वापस लें. सॉलिसिटर जनरल ने इनकार करते हुए कहा कि उन्हें इस पर कोई खेद नहीं है.

सॉलिसिटर जनरल ने कहा, "मैंने जो कहा, मैं उसे दोहरा सकता हूं. इंसान को कानून के हिसाब से चलना पड़ता है. मैंने जो कहा, उसके लिए मुझे कोई खेद नहीं है. मैंने कहा कि वह संवैधानिक तरीका है, वह नहीं जो नक्सली चाहते हैं. और मुझे इस पर कोई पछतावा नहीं है."

मुरलीधर ने कहा कि सॉलिसिटर जनरल "सस्ती लोकप्रियता पाने की कोशिश (प्लेइंग टू द गैलरी)" कर रहे थे और उनका आचरण किसी विधि अधिकारी के अनुकूल नहीं था. पीठ ने इन टिप्पणियों पर संज्ञान न लेने की बात कहने के अलावा कोई हस्तक्षेप नहीं किया.

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