विशाल शिवहरे | मोदी-ट्रंप की दोस्ती से भारत-अमेरिका संबंधों तक, क्या बदला?

'हरकारा डीप डाइव' में निधीश त्यागी ने ग्लोबल गांधी के कनाडा कोऑर्डिनेटर विशाल शिवहरे के साथ भारत-अमेरिका संबंधों में आए बदलाव और नरेंद्र मोदी तथा डोनाल्ड ट्रंप के व्यक्तिगत समीकरण के असर पर बातचीत की. सवाल यह है कि क्या दो देशों के बीच का रिश्ता अब संस्थागत और रणनीतिक संबंधों से आगे बढ़कर दो नेताओं के व्यक्तित्व पर ज्यादा निर्भर हो गया है.

विशाल शिवहरे के मुताबिक भारत और अमेरिका के संबंधों का लंबा इतिहास रहा है. पोखरण-2 के बाद अमेरिकी प्रतिबंधों से लेकर कारगिल युद्ध, मनमोहन सिंह सरकार के दौर की परमाणु समझौते और रणनीतिक सहयोग तक, दोनों देशों के संबंधों में उतार-चढ़ाव आए, लेकिन लंबे समय तक रिश्ते "सच, सम्मान और सामरिक विषय" पर आधारित रहे. उनका तर्क है कि मोदी सरकार के दौर में विदेश नीति में व्यक्तिगत संबंधों और नेतृत्व-केंद्रित कूटनीति की भूमिका बढ़ी.

ट्रंप के पहले कार्यकाल में मोदी और ट्रंप की सार्वजनिक दोस्ती ने इस रिश्ते को एक अलग राजनीतिक रूप दिया. विशाल शिवहरे के अनुसार दोनों नेताओं की राजनीतिक शैली में कई समानताएं हैं और भारतीय-अमेरिकी डायस्पोरा भी अमेरिकी राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. लेकिन ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में तस्वीर बदलती दिखाई दी. व्यापार, टैरिफ, एच-1बी वीजा, भारतवंशियों से जुड़े मुद्दों और ऑपरेशन सिंदूर के बाद युद्धविराम को लेकर ट्रंप के दावों ने रिश्ते में तनाव बढ़ाया.

बातचीत में पाकिस्तान और चीन का मुद्दा भी प्रमुख रहा. विशाल शिवहरे का दावा है कि अमेरिका-पाकिस्तान संबंधों में बढ़ती गर्माहट और अमेरिका-चीन के बीच सीधे संवाद की कोशिशों से भारत के सामने नई रणनीतिक चुनौतियां पैदा हुई हैं. उनका कहना है कि विदेश नीति को व्यक्तिगत दोस्ती के बजाय राष्ट्रीय हित, रणनीतिक जरूरतों और पारस्परिक सम्मान के आधार पर संचालित करने की जरूरत है.

कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी के उदाहरण के जरिए उन्होंने यह भी बताया कि अमेरिकी दबाव से निपटने के लिए देश के भीतर राजनीतिक दलों और संस्थाओं के बीच व्यापक सहमति बनाने की जरूरत होती है. उनके मुताबिक भारत को भी अमेरिका के साथ बातचीत में अधिक संस्थागत और रणनीतिक दृष्टिकोण अपनाना चाहिए.

ट्रेड के मोर्चे पर उन्होंने प्रधानमंत्री के सीधे नियंत्रण में एक विशेष दूत नियुक्त करने का सुझाव दिया, जो अमेरिकी प्रशासन के साथ व्यापार और टैरिफ संबंधी बातचीत को आगे बढ़ाए. उनके मुताबिक इसमें उद्योग, निर्यात, आयात और आईटी क्षेत्र के विशेषज्ञों की भागीदारी होनी चाहिए.

पूरी बातचीत हरकारा रोज़ाना के यूट्यूब चैनल पर सुन सकते हैं.

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