चारू सुदन कस्तूरी | मोदी की वैश्विक छवि में दरारें दिखने लगी हैं
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तरह कोई भी प्रमुख वैश्विक नेता इतनी बार विदेश यात्रा नहीं करता है. उन्होंने इस साल 13 देशों का दौरा किया है — यह संख्या अमेरिका, चीन और रूस के राष्ट्रपतियों, क्रमशः डोनाल्ड ट्रम्प, शी जिनपिंग और व्लादिमीर पुतिन द्वारा 2026 में मिलाकर की गई यात्राओं से लगभग दोगुनी है. विपक्षी दल और सरकार के अन्य आलोचक यह कहना पसंद करते हैं कि प्रधानमंत्री का व्यस्त यात्रा कार्यक्रम भारत से बाहर समय बिताने की उनकी इच्छा को दर्शाता है. लेकिन हकीकत में, भारतीय प्रधानमंत्री के पास निमंत्रणों की सूची वाकई बहुत लंबी है: दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था को कौन सा देश अपने पक्ष में नहीं करना चाहेगा? मोदी के पूर्ववर्ती मनमोहन सिंह के पास भी अपने इनबॉक्स में निमंत्रणों का ऐसा ही बड़ा ढेर होता था.
जहाँ मोदी की विदेश यात्राएँ अपेक्षाकृत अनूठी रही हैं, वह यह है कि कैसे कई नेताओं ने उनकी मेजबानी की है — धूमधाम, दिखावे और व्यक्तिगत ध्यान के साथ, जो आधुनिक कूटनीति में दुर्लभ है. अगर यह बदलना शुरू हो जाए तो आश्चर्य नहीं होगा. जंतर-मंतर और उससे आगे मोदी सरकार के खिलाफ युवाओं (जनरेशन-ज़ी) के लोकप्रिय विरोध-प्रदर्शनों ने न केवल घरेलू स्तर पर सत्ता के गलियारों को हिलाकर रख दिया है, बल्कि मोदी की वैश्विक छवि में दरारें भी उजागर कर दी हैं. यह तर्क पूरी तरह सही है कि वे दरारें हमेशा से मौजूद थीं और उन्हें केवल मोदी की मजबूत जनसंपर्क (पीआर) मशीनरी द्वारा ढका गया था: टीवी चैनलों द्वारा आलोचकों की आवाज दबाना, सरकार का प्रचार करने में उससे भी आगे निकल जाना, और असहमत होने वालों को राष्ट्रविरोधी के रूप में चित्रित करना.
लेकिन बाकी दुनिया में, अधिकतर, मोदी को लंबे समय से एक ऐसे मजबूत नेता के रूप में देखा गया है जो भारत में और भारतीय प्रवासियों के बीच व्यापक रूप से लोकप्रिय हैं. देश के भीतर, लगातार तीन लोकसभा जीत को व्यापक समर्थन के सबूत के रूप में देखा गया. उनके अपने देशों में, उनकी रैलियों के लिए एनआरआई की भारी भीड़ ने प्रवासियों के बीच उनकी लोकप्रियता की धारणा को और मजबूत किया. भारत के साथ आर्थिक और सैन्य संबंधों को मजबूत करने के इच्छुक देशों के नेताओं के लिए मोदी को खुश करना समझ में आता था. इससे भारत में उनके हितों को अधिक वैधता मिलती और उन्हें भारतीय प्रवासियों के वोट भी मिलते.
लेकिन पिछले कुछ दिनों में देश भर में हुए विरोध-प्रदर्शनों में मोदी और उनकी सरकार के खिलाफ गुस्से का जो पैमाना और रूप देखने को मिला है, वह पुनर्विचार के लिए मजबूर करने वाला है. भारत एक ऐसा देश बना रहेगा जिससे अन्य देश प्राथमिकता के आधार पर जुड़ना चाहेंगे. लेकिन अब अन्य देशों के सामने यह बात पहले से कहीं अधिक स्पष्ट हो जाएगी कि 'मोदी ही भारत नहीं हैं'. निश्चित रूप से, मोदी के नेतृत्व में भारत की चुनी हुई सरकार विदेशों में देश की सबसे प्रमुख और औपचारिक प्रतिनिधि बनी हुई है. सभी जानकारियों के अनुसार, प्रधानमंत्री मिलेनियल्स (1980 और 90 के दशक में जन्मे लोग) और कई जनसांख्यिकीय पृष्ठभूमि के बुजुर्ग भारतीयों के बीच लोकप्रिय हैं. इस बात का भी बहुत कम प्रमाण है कि भारतीय प्रवासियों के सबसे मुखर वर्गों के बीच उनके समर्थन में कोई महत्वपूर्ण कमी आई है.
लेकिन निवेश — आर्थिक हो या भू-राजनीतिक — भविष्य को ध्यान में रखकर किया जाता है. और भारत का भविष्य, उसकी जनरेशन-ज़ी (युवा पीढ़ी), मोदी को चुनौती दे रही है, यहाँ तक कि उनका मजाक भी उड़ा रही है. भारतीय विदेश नीति के लिए समस्या यहीं छिपी है. बहुत लंबे समय से, देश की कूटनीति मोदी और अन्य विश्व नेताओं के साथ उनके गर्मजोशी भरे, व्यक्तिगत संबंधों के नैरेटिव (आख्यान) के इर्द-गिर्द बनाई गई है. जब मोदी अन्य देशों का दौरा करते हैं, तो सरकार और उसकी सोशल मीडिया सेना द्वारा भारत के लिए हाइलाइट किए गए लाभों में न केवल वास्तविक सौदे शामिल होते हैं, बल्कि मोदी को खुश करने के इच्छुक मेजबान देशों द्वारा दिए गए व्यक्तिगत पुरस्कार भी शामिल होते हैं; केवल निवेश की प्रतिबद्धताएं ही नहीं, बल्कि विश्व नेताओं के साथ गले मिलने, पीठ थपथपाने और जबरन हँसने की तस्वीरें भी शामिल होती हैं. क्या होगा जब उन मेजबानों को यह अहसास होगा कि उनके भविष्य के हितों को सुरक्षित करने के लिए यह पर्याप्त नहीं है?
इसमें से कुछ भी आश्चर्यजनक नहीं है. ये “एक व्यक्ति-संचालित” विदेश नीति के ठीक वही खतरे हैं. जब व्यक्ति ही कमजोर कड़ी हो, तो पूरी श्रृंखला बिखरना शुरू हो सकती है. यह वही जोखिम है, जिसका सामना अब भारतीय कूटनीतिज्ञ कर रहे हैं. नीदरलैंड से लेकर नॉर्वे और न्यूजीलैंड तक, प्रधानमंत्री और उनके तरीके — जैसे कि खुली पत्रकार वार्ताओं को संबोधित करने से उनका इनकार — भारत के विदेश मंत्रालय को रक्षात्मक होने पर मजबूर कर रहे हैं. अब बदलाव का समय आ गया है — भारत की खातिर. भारत की विदेश नीति को भारत के बारे में बनाएं, न कि प्रधानमंत्री के बारे में. इसे घरेलू राजनीति से अलग रखें. भारत किसी भी नेता या सरकार से कहीं ज्यादा मजबूत है. यह दुनिया को याद दिलाने के लायक है — ठीक वैसे ही जैसे देश के युवाओं ने अभी-अभी भारत को याद दिलाया है.
(चारू सुदन कस्तूरी एक पत्रकार हैं जो विदेश नीति और अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर लिखते हैं. हिंदी में अनुदित उनका यह लेख अंग्रेजी में यहां पढ़ा जा सकता है.)

