“अगर ये होटल बन गए, तो काजीरंगा तबाह हो जाएगा” असम में ज़मीन के लिए एक समुदाय की लड़ाई

असम में प्रसिद्ध काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान के किनारे स्थित 'इनले पथर' ज़मीन को लेकर स्थानीय आदिवासी समुदाय और राज्य सरकार के बीच एक बड़ा विवाद खड़ा हो गया है. यह पूरा मामला पर्यावरण संरक्षण, कॉरपोरेट विकास और स्थानीय मूल निवासियों के भूमि अधिकारों के बीच टकराव का प्रतीक बन चुका है.

‘द टेलीग्राफ’ में अरिजित सेन की रिपोर्ट के अनुसार, विवाद की मुख्य जड़ काजीरंगा के कोहोरा रेंज के पास स्थित 10 एकड़ ज़मीन ('इनले पथर') है. जून 2024 में, असम पर्यटन विकास निगम (एटीडीसी) ने इस ज़मीन को अधिग्रहित किया. इसके बाद, सार्वजनिक-निजी भागीदारी (पीपीपी) मॉडल के तहत 'जुनिपर होटल्स' (हयात ग्रुप से संबद्ध) ने इस भूमि पर एक लग्जरी पांच सितारा होटल और रिसॉर्ट बनाने की योजना की घोषणा की.

काजीरंगा यूनेस्को की एक विश्व धरोहर स्थल और टाइगर रिजर्व है, जो एक सींग वाले गैंडों के लिए प्रसिद्ध है. वर्ष 2025-26 में यहाँ 5.48 लाख से अधिक पर्यटक आए, जिससे सरकार को लगभग 11 करोड़ रुपये का राजस्व मिला. इसी बढ़ते पर्यटन और आर्थिक लाभ को देखते हुए सरकार ने यहाँ उच्च-स्तरीय पर्यटन बुनियादी ढांचे के विस्तार को मंजूरी दी है.

स्थानीय आजीविका और पारिस्थितिकी पर संकट

इनले पथर कार्बी आंगलोंग की पहाड़ियों और हाथीखुली चाय बागान के पास स्थित है.  यह क्षेत्र बाढ़ के समय वन्यजीवों के सुरक्षित आवागमन और आश्रय के लिए एक प्राकृतिक मार्ग (कॉरिडोर) का काम करता है. स्थानीय आदिवासियों, विशेषकर 45 प्रभावित परिवारों का दावा है कि वे पीढ़ियों से इस ज़मीन पर खेती करते आ रहे हैं.

गीता गोवाला जैसी स्थानीय निवासियों के अनुसार, ज़मीन का नुकसान सिर्फ आर्थिक नहीं है, बल्कि उनकी पहचान और भावी पीढ़ियों के अस्तित्व से जुड़ा है. अब प्रशासन द्वारा इस क्षेत्र में बाड़ (फ़ेंसिंग) लगा दी गई है और पुलिस बल तैनात कर दिया गया है, जिससे किसानों का अपनी ही कृषि भूमि तक पहुंचना बंद हो गया है. स्थानीय लोगों और पर्यावरणविदों को डर है कि इस तरह के व्यावसायिक प्रोजेक्ट्स से जानवरों का प्राकृतिक आवास सिकुड़ेगा और काजीरंगा का नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र तबाह हो जाएगा.

इको-सेंसिटिव ज़ो नियमों में बदलाव

इस विवाद का एक कानूनी और पर्यावरणीय पहलू इको-सेंसिटिव ज़ोन (ईएसज़ेड) के नियमों में बदलाव से जुड़ा है. पहले संरक्षित क्षेत्रों के आसपास 10 किलोमीटर तक के दायरे को बफ़र ज़ोन माना जाता था.  हालांकि, सुप्रीम कोर्ट के हालिया दिशा-निर्देशों के बाद इसे घटाकर 1 किलोमीटर कर दिया गया है.

याचिकाकर्ताओं के वकील शांतनु बोरठाकुर का तर्क है कि बफ़र ज़ोन को छोटा करने से पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील भूमि कॉरपोरेट घरानों और शक्तिशाली ताकतों के व्यावसायिक उपयोग के लिए खुल जाएगी.  इसके अलावा, कई परिवारों के पास वैध भूमि अधिकार या सरकारी आवंटन होने के बावजूद राजस्व अधिकारी अब उनके स्वामित्व को खारिज कर रहे हैं.

कानूनी लड़ाई और दमन के आरोप

स्थानीय संघर्ष का नेतृत्व 'ग्रेटर काजीरंगा लैंड एंड ह्यूमन राइट्स प्रोटेक्शन कमेटी' (जीकेएलएचआरपीसी) और आदिवासी अधिकार कार्यकर्ता प्रणब डोले कर रहे हैं. विरोध प्रदर्शनों में भाग लेने के कारण प्रणब डोले को गिरफ्तार किया गया और जमानत मिलने के तुरंत बाद उन पर राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (एनएसए) लगा दिया गया.

ग्रामीणों का आरोप है कि सरकार और होटल कारोबारियों के हितों के लिए असंतोष की आवाज दबाने हेतु झूठे मुकदमे थोपे जा रहे हैं और भय का माहौल बनाया जा रहा है. प्रभावित परिवारों ने सरकार के अनौपचारिक मुआवजे के प्रस्तावों को भी ठुकरा दिया है क्योंकि वे अपने कानूनी भूमि अधिकारों की मान्यता चाहते हैं.

रिपोर्ट के अनुसार, यह मामला गुवाहटी उच्च न्यायालय में विचाराधीन है. वकील और कार्यकर्ता कानूनी लड़ाई के साथ-साथ ज़मीनी स्तर पर विरोध जारी रखने की बात कह रहे हैं. काजीरंगा का यह संघर्ष केवल भूमि स्वामित्व की लड़ाई नहीं है, बल्कि यह एक बड़ा नैतिक और नीतिगत सवाल खड़ा करता है कि विकास की इस दौड़ में उन मूल निवासियों और वन्यजीवों की क्या जगह होगी, जो पीढ़ियों से इस परिदृश्य का हिस्सा रहे हैं.

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