अंजलि भारद्वाज | क्यों जरूरत है सरकार को पीएम केयर्स ट्रस्ट को ये सब छुपाने की
हरकारा डीप डाइव के इस लाइव एपिसोड में निधीश त्यागी की अंजलि भारद्वाज के साथ बातचीत पीएम केयर्स फंड को लेकर उठे गंभीर सवालों पर है. करीब 8,450 करोड़ रुपये के फंड में 2024-25 के दौरान सिर्फ करीब 88 लाख रुपये खर्च होने की जानकारी सामने आई है. ऐसे समय में जब असम समेत देश के कई हिस्से बाढ़ और दूसरी आपदाओं से जूझ रहे हैं, सवाल है कि आपदा के लिए बनाए गए इस फंड का इस्तेमाल आखिर क्यों नहीं हो रहा.
पीएम केयर्स फंड 27 मार्च 2020 को कोविड और दूसरी आपात स्थितियों में लोगों की मदद के लिए बनाया गया था. शुरुआत में इसे केंद्र सरकार द्वारा बनाया गया फंड बताया गया और इसमें कंपनियों के सीएसआर फंड समेत दूसरे स्रोतों से पैसा आया. लेकिन जब लोगों ने फंड की आय और खर्च को लेकर आरटीआई के जरिए सवाल पूछने शुरू किए, तो इसे पब्लिक अथॉरिटी मानने से इनकार कर दिया गया.
अंजलि भारद्वाज कहती हैं, "जब सवाल पूछने लगे लोग तो इन्होंने यूटर्न लिया और कहा नहीं, हम पब्लिक अथॉरिटी नहीं हैं." उनके मुताबिक, आज नागरिकों को पीएम केयर्स के पूरे कागज उपलब्ध नहीं हैं और सामने आई ऑडिट रिपोर्ट भी सीएजी की नहीं, बल्कि प्राइवेट ऑडिट की रिपोर्ट है.
सबसे बड़ा सवाल यही है कि करीब 8 हजार करोड़ रुपये जमा होने के बावजूद आपदा के समय पैसा खर्च क्यों नहीं हो रहा. अंजलि भारद्वाज पूछती हैं, "अगर इस फंड को इस्तेमाल ही नहीं करना आपने इमरजेंसी में, नेचुरल डिजास्टर्स में, मैनमेड डिजास्टर्स में, तो फंड को क्यों रख रखा है?"
सीएसआर के पैसे को एफडी में रखे जाने का सवाल भी इसी बहस को आगे बढ़ाता है. कंपनियों से जुटाया गया पैसा अगर जरूरतमंदों तक नहीं पहुंच रहा, तो उसके उद्देश्य और इस्तेमाल पर सवाल उठना स्वाभाविक है. अंजलि भारद्वाज के मुताबिक, "पारदर्शिता नहीं है तो जवाबदेही का तो कोई मतलब ही नहीं होता."
बात पीएम केयर्स और इलेक्ट्रोरल बॉन्ड के बीच संभावित समानताओं तक भी पहुंचती है. पीएम केयर्स में प्रधानमंत्री के साथ गृह मंत्री, वित्त मंत्री और रक्षा मंत्री ट्रस्टी हैं, लेकिन फंड की पूरी जानकारी सार्वजनिक नहीं है. ऐसे में संभावित क्विड प्रो क्वो को लेकर सवाल उठना भी इसी अपारदर्शिता से जुड़ा है.
अंजलि भारद्वाज का सवाल है, "क्यों जरूरत है सरकार को पीएम केयर्स ट्रस्ट को ये सब छुपाने की?" उनका कहना है कि सरकार को खुद सामने आकर बताना चाहिए कि पैसा कहां से आया, कहां खर्च हुआ और जरूरतमंदों तक कितना पहुंचा.
बातचीत के अंत में वह साफ करती हैं कि किसी नए फंड के गठन से समस्या नहीं है, समस्या उसकी पारदर्शिता और जवाबदेही से बचने की है. उनके शब्दों में, "आप जो भी फंड चलाएं, चाहे वो पीएम एनआरएफ हो चाहे वो पीएम केयर्स हो, सबको आप पारदर्शी तरीके से चलाइए, जवाबदेह तरीके से चलाइए."
पीएम केयर्स का सवाल इसलिए सिर्फ 8 हजार करोड़ रुपये का सवाल नहीं है. यह उस लोकतांत्रिक अधिकार का सवाल है जिसमें नागरिक जानना चाहते हैं कि उनके नाम पर जुटाया गया पैसा कहां है, क्यों खर्च नहीं हो रहा और उसका हिसाब कौन देगा.

