प्रियांक खड़गे ने आरएसएस को ला खड़ा किया ‘कागज नहीं दिखाएंगे’ वाले मोड़ पर, और यह शुरुआत भर है

‘साउथ फर्स्ट’ में अनुषा रवि सूद लिखती हैं, इसे विडंबना कहिए या इंटरनेट की भाषा में "यूएनओ रिवर्स", लेकिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) आज उसी तरह के "हम कागज नहीं दिखाएंगे" वाले क्षण का सामना कर रहा है, जिसकी वजह बने हैं कर्नाटक के गृह मंत्री प्रियांक खड़गे.

"हम कागज नहीं दिखाएंगे" वरुण ग्रोवर की वह कविता थी जो 2019-20 में नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) के खिलाफ हुए आंदोलनों का प्रतीक बन गई थी.

यह पंक्तियां उस कोशिश के प्रतिरोध का साहित्यिक औजार थीं, जिसमें केंद्र की भाजपा सरकार भारतीयों से अपनी नागरिकता और कानूनी पहचान साबित करने के लिए दस्तावेज मांग रही थी. आलोचकों का तर्क था कि सीएए के साथ एनआरसी का इस्तेमाल उन हिंदुओं को संरक्षण देने के लिए होगा जो एनआरसी की कसौटी पर खरे नहीं उतर पाएंगे, जबकि अन्य समुदायों के लोगों को "अवैध विदेशी" घोषित किया जा सकता है.

जैसा आशंका जताई गई थी, असम में यह प्रक्रिया बड़ी संख्या में मुसलमानों को प्रभावित करने का माध्यम बन गई. कई आलोचकों ने इसे आरएसएस के उस लंबे समय से घोषित लक्ष्य की दिशा में कदम बताया जिसे उसके प्रमुख विचारकों में से एक माधव गोलवलकर ने हिंदू राष्ट्र के रूप में परिकल्पित किया था.

उस समय आरएसएस और भाजपा के नेता सीएए-एनआरसी का जोरदार बचाव करते हुए कहते थे कि जिन भारतीयों के पास दस्तावेज हैं, उन्हें घबराने की जरूरत नहीं है. आखिर अगर किसी के पास अपनी पहचान और वैध नागरिकता साबित करने के लिए कागजात मौजूद हैं, तो सरकार को वे दिखाने में परेशानी कैसी?

लेकिन छह साल बाद वही आरएसएस, जो भारतीयों से नागरिकता साबित करने के लिए दस्तावेज मांगने वाली सत्ता के वैचारिक केंद्र के रूप में देखा जाता है, अपनी पहचान और दस्तावेजी स्थिति को लेकर पूछे जा रहे सवालों से असहज दिखाई दे रहा है.

आठ सवालों की चुनौती

प्रियांक खड़गे ने सिर्फ कुछ लोगों को नाराज नहीं किया है, उन्होंने उस धारणा को चुनौती दी है कि आरएसएस से सवाल नहीं पूछे जा सकते. लंबे समय से यह कथा गढ़ी जाती रही है कि आरएसएस की आलोचना का मतलब हिंदुओं की आलोचना है, आरएसएस की आलोचना राजनीतिक नुकसान पहुंचा सकती है और समझदार राजनेता संघ को नाराज नहीं करते.

आरएसएस से जवाबदेही और पारदर्शिता की मांग कर खड़गे ने दूसरे नेताओं और नागरिकों के लिए भी ऐसे सवाल पूछने का रास्ता खोल दिया है. आरएसएस दावा करता है कि देशभर में उसकी 57,000 से अधिक शाखाएं और 15 लाख से ज्यादा सदस्य हैं.

आरएसएस स्वयं को "व्यक्तियों का समूह" बताता है, जो राष्ट्र निर्माण के लिए साथ आता है. संगठन न तो पंजीकृत है और न ही कर का भुगतान करता है. इसके बावजूद भारत का प्रधानमंत्री कौन बनेगा, इस सवाल पर उसका प्रभाव व्यापक माना जाता है.

भाजपा में राष्ट्रीय संगठन महामंत्री का पद आरएसएस से आए बी. एल. संतोष के पास है. राज्यों में भी संगठनात्मक ढांचे में आरएसएस की भूमिका स्पष्ट दिखाई देती है. भाजपा की राजनीतिक मशीनरी को शक्ति देने वाले प्रमुख स्रोत के रूप में आरएसएस को देखा जाता है.

प्रियांक खड़गे ने सवाल उठाया, "जब भारत में एक रेहड़ी लगाने वाला व्यक्ति, एक गैर-सरकारी संगठन या एक धर्मार्थ संस्था तक पंजीकृत होती है, तो लाखों सदस्यों वाला और सार्वजनिक स्थानों पर लाठी के साथ पथ संचलन करने वाला संगठन पंजीकृत क्यों नहीं है?"

खड़गे ने आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत को लिखे पत्र में आठ सवाल पूछे. उन्होंने एक वीडियो का भी हवाला दिया, जिसमें मोहन भागवत यह कहते दिखाई देते हैं कि आरएसएस हर पैसे का हिसाब रखता है और यदि सरकार कभी ऑडिट रिपोर्ट मांगेगी तो उसे उपलब्ध कराया जाएगा.

हालांकि संगठन ने खड़गे के सवालों का सीधे जवाब नहीं दिया है. आरएसएस से जुड़े कई स्वयंसेवकों और समर्थकों ने संगठन के पंजीकरण न कराने और पारदर्शिता संबंधी सवालों पर विस्तृत तर्क दिए हैं. दूसरी ओर भाजपा सांसद रमेश जिगजिनागी ने यह पूछते हुए कि एक "दलित व्यक्ति" को आरएसएस की चिंता क्यों है, इस कानूनी बहस को सामाजिक मुद्दे की दिशा में मोड़ने की कोशिश की.

और भी होगा

क्या आरएसएस सवालों से ऊपर है, या फिर जैसा भाजपा सांसद ने संकेत दिया, क्या आरएसएस पर सवाल पूछने का अधिकार किसी "दलित व्यक्ति" को नहीं है?

कुछ लोग तर्क दे सकते हैं कि एक अंबेडकरवादी दलित नेता ही ब्राह्मणवादी वर्चस्व और बहुसंख्यकवादी राष्ट्रवाद को चुनौती देने का सबसे स्वाभाविक दावेदार हो सकता है. यह संघर्ष एक धर्मनिरपेक्ष और समानतावादी संविधान तथा भेदभावपूर्ण मनुवादी सोच के बीच टकराव की तरह भी देखा जा सकता है.

हालांकि प्रियांक खड़गे का कहना है कि उनकी मांग वैचारिक नहीं बल्कि कानूनी आधार पर है.

उन्होंने कहा, "मुझे उनकी विचारधारा में कोई दिलचस्पी नहीं है. वे जो चाहें उसका पालन करें. लेकिन कर्नाटक के गृह मंत्री के तौर पर यह जानना मेरी जिम्मेदारी है कि लाखों सदस्यों वाला यह संगठन, जो पथ संचलन करता है और भारत की नीतियों, राजनीति तथा समाज पर चर्चा करता है, आखिर क्या कर रहा है और क्यों कर रहा है. यह सवाल वैधानिकता और संवैधानिकता से जुड़ा हुआ है."

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