शशि थरूर | टीएमसी से शिवसेना तक, जनता के जनादेश की सत्ता के लिए सौदेबाज़ी हो रही है.

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों की धूल अभी ठीक से बैठी भी नहीं थी कि ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के भीतर हुए एक बड़े आंतरिक बिखराव ने वहाँ की राजनीति का परिदृश्य ही बदल कर रख दिया है. चुनावी हार से अलग, पार्टी इस समय एक अस्तित्वगत बगावत का सामना कर रही है: दर्जनों विधायक, स्थानीय नगर पार्षदों का एक बड़ा हुजूम और 20 सांसद पार्टी तोड़कर सत्ताधारी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के साथ जा मिले हैं. वहीं दूसरी ओर, ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना के दो-तिहाई सांसद शिंदे गुट में शामिल हो चुके हैं और अन्य पार्टियों को लेकर भी अफवाहों का बाजार गर्म है.

इसके पीछे चल रही अंतर्धाराएँ बेहद जानी-पहचानी हैं. आम जनता का स्पष्ट मानना है कि यह सब एक सोची-समझी रणनीति के तहत हो रहा है, जिसमें बीजेपी एक बेहद कुशल सूत्रधार की भूमिका निभा रही है. लेकिन यह लेख पार्टियों के टूटने का कोई पोस्टमार्टम नहीं है, और न ही इस बात का रोना है कि कैसे नई दिल्ली में दल-बदल विरोधी कानून को लगातार दरकिनार किया जा रहा है. इसके बजाय, यह नाटकीय बिखराव, जो भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और विभिन्न क्षेत्रीय क्षत्रपों से पिछले लगभग एक दशक से सत्ताधारी दल में हो रहे सामूहिक दलबदल के सिलसिले की ही अगली कड़ी है. हमें रुकने और एक बुनियादी सवाल का सामना करने पर मजबूर करता है: आखिरकार, राजनीति किसलिए है?

अपने सबसे सच्चे अर्थों में, राजनीति वह ढांचा है जिसके जरिए इंसान एक बेहतर समाज, एक अधिक न्यायसंगत अर्थव्यवस्था और एक मजबूत राष्ट्र के निर्माण के लिए खुद को संगठित करता है. यह एक साझा सभ्यतागत लक्ष्य को हासिल करने का जरिया है. इसलिए, राजनीतिक मैदान में उतरने के लिए एक दृष्टिकोण (विज़न) की जरूरत होती है, इस बुनियादी सवाल के जवाब की जरूरत होती है कि: एक बेहतर भारत कैसे बनेगा?

कुछ लोगों के लिए, वह दृष्टिकोण कल्याणकारी अर्थशास्त्र, धर्मनिरपेक्षता और सत्ता के विकेंद्रीकरण पर आधारित होता है; दूसरों के लिए यह बाजार के उदारीकरण, राष्ट्रीय सुरक्षा और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के पक्ष में हो सकता है. ये अलग-अलग दृष्टिकोण ही वह वजह हैं जिसके कारण राजनीतिक दल अस्तित्व में आते हैं. एक पार्टी को विचारों की प्रयोगशाला होना चाहिए, एक वैचारिक समूह होना चाहिए जहाँ लोग देश को आगे ले जाने के लिए सिद्धांतों, नीतियों और मूल्यों के एक विशिष्ट सेट से खुद को बांधते हैं. आप किसी पार्टी में शामिल इसलिए होते हैं क्योंकि उसका घोषणापत्र देश के लिए आपके पसंदीदा खाके को दर्शाता है. संसदीय प्रणाली में, पार्टी आपके बेहतर भारत के सपने को साकार करने का जरिया होती है.

जब हम हालिया घटनाओं को देखते हैं, या पिछले एक दशक में दलबदलुओं की उस लंबी कतार को देखते हैं जिन्होंने केंद्रीय कैबिनेट में एक सीट के लिए अपनी मूल पार्टी के रंग को बदल लिया, तो हमें वहाँ सिद्धांतों का पूर्ण अभाव दिखता है. हाल के इतिहास में एक भी बड़ा दलबदल ऐसा नहीं हुआ है जिसके पीछे कोई वैचारिक हृदय-परिवर्तन रहा हो. हमने ऐसा कोई नेता नहीं देखा जिसने इसलिए इस्तीफा दे दिया हो क्योंकि उसे अचानक एहसास हुआ कि वह केंद्र-वाम कल्याणवाद के बजाय दक्षिणपंथी अर्थशास्त्र को पसंद करता है, या संघीय ढांचे को लेकर उसके मन में कोई गहरा बदलाव आ गया हो.

इसके विपरीत, यहाँ वैचारिक स्विच पलक झपकते ही बदल दिया जाता है. जीवन भर की बयानबाजी को रातों-रात कूड़ेदान में फेंक दिया जाता है. ये राजनेता पूरी तरह से सिर्फ और सिर्फ सत्ता की भूख से प्रेरित हैं, जिससे वे इस पेशे से जनसेवा के ढोंग को भी पूरी तरह खत्म कर देते हैं. भारत का राजनीतिक मुकाबला विचारों की लड़ाई से बदलकर व्यक्तिगत लाभ के बाजार में तब्दील हो गया है.

जब कोई राजनेता हारी हुई पार्टी को छोड़कर जीती हुई पार्टी में जाता है, तो वह विशुद्ध रूप से सौदेबाजी का गणित लगा रहा होता है. टीएमसी के बिखराव के मामले में, बागी नेता खुले तौर पर स्वीकार करते हैं कि विपक्ष में रहने से वे जनता के गुस्से, स्थानीय कमजोरियों और केंद्रीय जांच एजेंसियों की सख्ती के सीधे दायरे में आ जाते हैं. सत्ताधारी खेमे में शामिल होना या उसका समर्थन करना उन्हें एक तत्काल बीमा कवर और कथित तौर पर भारी धन-दौलत की सुरक्षा देता है.

यह बुनियादी तौर पर लोकतांत्रिक जनादेश का अपमान है. जब नागरिक वोट देते हैं, तो वे आमतौर पर सिर्फ किसी नाम को वोट नहीं देते; वे एक घोषणापत्र, एक वादे और सत्ता के सामने एक मजबूत विपक्ष को वोट देते हैं. जब कोई निर्वाचित प्रतिनिधि पाला बदलता है, तो वह वास्तव में हजारों नागरिकों के वोटों को मिटा देता है. वे जनता के जनादेश को अपनी व्यक्तिगत जागीर समझने लगते हैं, एक ऐसी वस्तु जिसे मंत्री पद या किसी कॉर्पोरेट फायदे के लिए बेचा जा सके. अगर राजनीतिक वफादारी को बिना किसी जवाबदेही के खरीदा, डराया या बेचा जा सकता है, तो मतपेटी जनता के साथ एक धोखा बन जाती है और राजनीति महज एक सौदागर संभ्रांत वर्ग का स्वार्थी साधन बनकर रह जाती है.

यह हमें सबसे महत्वपूर्ण सवाल पर लाता है: यदि राजनीति केवल व्यक्तिगत तरक्की के बारे में है, तो हम राजनीतिक दलों और संसदीय प्रणाली के इस महंगे और तड़क-भड़क वाले नाटक को क्यों बनाए हुए हैं? हमारी व्यवस्था को शासन करने के लिए एक मजबूत सत्ता पक्ष और सत्ता को चुनौती देने व सवाल पूछने के लिए एक सैद्धांतिक विपक्ष की आवश्यकता होती है, जिसमें राजनीतिक दल एक मजबूत ढांचे के रूप में काम करते हैं ताकि बहसें व्यक्तिगत कीचड़ उछालने के बजाय नीतिगत मतभेदों पर केंद्रित हों.

हालांकि, अगर पार्टियों का इस्तेमाल सिर्फ टिकट हासिल करने के लिए किया जाए और हवा का रुख बदलते ही उन्हें छोड़ दिया जाए, तो पूरी व्यवस्था ढह जाती है. तब संसद एक विचारशील सभा से बदलकर अवसरवादिता का एक 'चलता-फिरता दरवाजा' (रिवॉल्विंग डोर) बन जाती है. दल-बदल विरोधी कानून जिसे मूल रूप से 1960 के दशक की कुख्यात "आया राम, गया राम" संस्कृति को रोकने के लिए बनाया गया था आज सिर्फ एक कमजोर बाधा बनकर रह गया है जिसे आसानी से पार किया जा सकता है. राजनेता अब एक-एक करके पाला नहीं बदलते; वे सीधे दो-तिहाई का विभाजन तैयार करते हैं, और अपनी सीटें सुरक्षित रखते हुए अपने आकाओं को बदलने के लिए पूरे गुट को ही खिसका देते हैं. यह भारत के किसी भी दृष्टिकोण (विज़न) से कटी हुई राजनीति है.

नई दिल्ली में एनडीए के प्रति वफादारी की कसम खाने के लिए टीएमसी सांसदों का इकट्ठा होना राजनीतिक जोड़-तोड़ की कोई इकलौती घटना नहीं है; यह एक गहरे, व्यवस्थागत सड़न का लक्षण है. यह उस राजनीतिक संस्कृति का तार्किक परिणाम है जो किसी भी कीमत पर जीत को सही ठहराती है और नैतिकता को लाचारों की बीमारी मानती है. अगर भारत को 1947 की उम्मीदों को पूरा करना है, तो उसके राजनीतिक वर्ग को यह याद रखना होगा कि राजनीति की खोज किसलिए की गई थी. इसे सत्ता की मलाई लूटने की एक सिद्धांतहीन होड़ बनकर नहीं रहने दिया जा सकता. हमें एक ऐसा राजनीतिक माहौल तैयार करना होगा जहाँ दलबदल करने वाले को एक कभी न मिटने वाला सामाजिक और चुनावी कलंक झेलना पड़े; जहाँ नीति पर किसी गंभीर और स्पष्ट असहमति के बिना पार्टी छोड़ना साफ तौर पर एक सार्वजनिक विश्वासघात माना जाए.

जब तक विचारधारा और जनसेवा के सिद्धांतों को हमारी राजनीतिक लड़ाई के केंद्र में वापस नहीं लाया जाता, तब तक हमारी लोकतांत्रिक संस्थाएं अपनी नैतिक साख खोती रहेंगी जब तक कि मतदाता खुद उनसे वोट मांगते वक्त यह साबित करने के लिए मजबूर न कर दें कि वे एक बेहतर भारत के लिए लड़ रहे हैं, न कि केवल टेबल पर एक बेहतर सीट पाने के लिए.

शशि थरूर तिरुवनंतपुरम से चौथी बार के कांग्रेस सांसद हैं.


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