‘ज्ञानेश कुमार की बेटी’: इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा नोएडा डीएम को फटकार लगाए जाने के बाद विपक्ष के निशाने पर

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने नोएडा में मजदूरों के विरोध प्रदर्शन के सिलसिले में दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा आकृति चौधरी को हिरासत में लेने के मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाया था. कोर्ट ने याचिकाकर्ता को 5 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया था और कहा था कि इसकी वसूली गौतमबुद्धनगर (नोएडा) के जिला मजिस्ट्रेट (डीएम) और फैसले में शामिल अन्य अधिकारियों के वेतन से वसूली जाए, जिन्होंने बिना दिमाग लगाए एनएसए के तहत हिरासत आदेश पारित किया. सवाल है कि गौतमबुद्धनगर (नोएडा) का डीएम है कौन? तो जवाब है- मेधा रूपम, जो भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की बेटी हैं. बहरहाल, इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की बेटी व नोएडा की डीएम मेधा रूपम को फटकार लगाए जाने के बाद, मंगलवार को कांग्रेस अन्य विपक्ष ने मुख्य चुनाव आयुक्त पर निशाना साधा.

‘टेलीग्राफ वेब डेस्क’ के अनुसार, फैसले से जुड़ी खबर को ‘एक्स’ पर साझा करते हुए कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने लिखा, "इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ज्ञानेश कुमार गुप्ता की बेटी को 'निरंकुश अधिकारी' करार दिया है. समाचार समाप्त हुए."

तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा ने भी इसी मुद्दे पर हमला बोला. मोइत्रा ने ‘एक्स’ पर लिखा, "जैसा शर्मनाक बाप, वैसी ही शर्मनाक बेटी — लोकतंत्र के लिए कलंक, कानून की उचित प्रक्रिया के लिए कलंक. नोएडा की डीएम मेधा रूपम मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की नामचीन बेटी हैं. हमें भारत को इस अभिशाप से मुक्त करने की जरूरत है."

कांग्रेस नेता शमा मोहम्मद ने लिखा: "...पिता भारत के स्तर पर लोकतंत्र की हत्या कर रहे हैं, और बेटी नोएडा में यह काम कर रही है."

नोएडा में एक अन्य छात्र के खिलाफ कार्रवाई से जुड़ी एक अलग पोस्ट में, कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के सह-संयोजक सौरव दास ने गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय के छात्र अक्षत त्रिपाठी से सीजेपी के एक विरोध प्रदर्शन में शामिल होने पर ₹5 लाख का बांड भरने के कथित आदेश पर सवाल उठाए.

दास ने लिखा, "क्या डीएम गौतम बुद्ध नगर ने सुप्रीम कोर्ट का 1 सितंबर का ऐतिहासिक आदेश नहीं पढ़ा है? सीजेपी के विरोध प्रदर्शनों में भाग लेने के कारण सभी प्रदर्शनकारियों को किसी भी कानूनी कार्रवाई से स्थायी और पूर्ण छूट प्राप्त है. अक्षत त्रिपाठी को 5 लाख रुपये का बेल बांड भरने की कोई आवश्यकता नहीं है.

हमने केंद्र सरकार से तुरंत इसके अनुसार कार्रवाई करने और विद्वान डीएम को फैसले की एक प्रति भेजने का अनुरोध किया है. हम किसी भी छात्र को निशाना नहीं बनने देंगे."

पिछले हफ्ते, इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति अचल सचदेव की खंडपीठ ने माना कि एनएसए के तहत चौधरी को लगातार हिरासत में रखना अनुच्छेद 21 के तहत उनके मौलिक अधिकार का उल्लंघन है. अदालत ने पाया कि हिरासत के आदेश में पर्याप्त आधार या सामग्री की कमी थी और यह "बिना दिमाग लगाए" जारी किया गया था.

अदालत ने कहा, "गौतम बुद्ध नगर की ज़िलाधिकारी, जिन्होंने यह विवादित आदेश पारित किया, का आचरण निंदनीय है."

खंडपीठ ने कहा कि रूपम चौधरी का "उदाहरण पेश" करना चाहती थीं ताकि दूसरों को श्रमिकों के समर्थन में अपने बोलने की स्वतंत्रता के अधिकार का उपयोग करने से रोका जा सके. उन्होंने चेतावनी दी कि अधिकारियों का ऐसा "निरंकुश" आचरण उत्तर प्रदेश को एक "ऑरवेलियन डिस्टोपिया" (दमनकारी समाज) में बदल सकता है.

दिल्ली विश्वविद्यालय से इतिहास में स्नातक और एलएलबी प्रथम वर्ष की छात्रा चौधरी को 11 अप्रैल को हिरासत में लिया गया था—नोएडा में श्रमिकों के विरोध प्रदर्शन के दौरान हिंसा भड़कने से दो दिन पहले—और 13 मई को उन पर एनएसए लगा दिया गया था.

अदालत ने कहा कि राज्य सरकार ऐसा कोई व्हाट्सएप संदेश या वीडियो पेश नहीं कर सकी जिससे यह साबित हो सके कि उन्होंने हिंसा भड़काई थी. प्रदर्शन से दर्ज हुई 11 प्राथमिकी के सिलसिले में वह फिलहाल न्यायिक हिरासत में हैं.

Previous
Previous

एफिल टावर पर हिंदू प्रतिनिधिमंडल के दौरे के दौरान महिला कर्मचारियों को हटाने के आरोप की जांच

Next
Next

“हमारा गुजारा मुश्किल से चलता है”: पश्चिम बंगाल का मुस्लिम मजदूर ‘बांग्लादेशी’ बताकर जेल में बंद