“हमारा गुजारा मुश्किल से चलता है”: पश्चिम बंगाल का मुस्लिम मजदूर ‘बांग्लादेशी’ बताकर जेल में बंद

‘मकतूब मीडिया’ के रिपोर्ट के मुताबिक, पश्चिम बंगाल के उत्तर दिनाजपुर जिले में 66 वर्षीय मुस्लिम दिहाड़ी मजदूर जलील अख्तर करीब तीन महीने से जेल में बंद हैं. पुलिस ने उन्हें बांग्लादेशी नागरिक बताया है, जबकि उनके पास आधार कार्ड, मतदाता पहचान पत्र, राशन कार्ड और पुराने चुनावी रिकॉर्ड जैसे दस्तावेज मौजूद हैं, जो उनकी भारतीय पहचान और लंबे समय से राज्य में रहने का प्रमाण देते हैं. परिवार का आरोप है कि पुलिस ने उन्हें आधी रात को घर से उठाया और अब तक उनकी रिहाई नहीं हो सकी है.

डालखोला थाना क्षेत्र के बगरैल गांव निवासी जलील अख्तर को 19 और 20 जुलाई 2026 की दरम्यानी रात घर से हिरासत में लिया गया था. परिवार को अगली सुबह उनके गायब होने का पता चला. उनके चचेरे भाई मोहम्मद मतीउर रहमान के अनुसार, परिवार को लगा था कि जलील सुबह की नमाज पढ़ने मस्जिद गए होंगे. जब वह मस्जिद में नहीं मिले, तो परिवार ने उनकी तलाश शुरू की और डालखोला थाने पहुंचा. वहां पुलिस ने केवल इतना बताया कि उन्हें किसी “पूछताछ” के लिए ले जाया गया है.

रहमान के मुताबिक, 21 जुलाई को पुलिस ने जलील के खिलाफ 2025 के आव्रजन और विदेशी अधिनियम की धारा 21 के तहत मामला दर्ज किया और उनकी गिरफ्तारी औपचारिक रूप से दिखाई. परिवार का कहना है कि जलील के पास मतदाता पहचान पत्र, आधार कार्ड और राशन कार्ड हैं. उनका नाम 2002 की मतदाता सूची में भी दर्ज है. इससे पहले की चुनावी सूचियों में उनके पिता और दादा के नाम भी मौजूद हैं. परिवार के अनुसार, जलील ने 2026 का पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव भी वोट देकर भाग लिया था और वह कभी बांग्लादेश या किसी अन्य देश की यात्रा नहीं कर चुके हैं.

परिवार ने करंदिघी और डालखोला के पुलिस अधिकारियों के सामने सभी दस्तावेज और गवाह पेश किए, लेकिन पुलिस अब भी उन्हें बांग्लादेशी बता रही है. जलील फिलहाल इस्लामपुर जेल में बंद हैं.

उनके वकील अधिवक्ता मुख्तार अहमद ने बताया कि मामला उत्तर दिनाजपुर की निचली अदालत में चल रहा है. पुलिस की ओर से दस्तावेजों के सत्यापन की प्रक्रिया बेहद धीमी है. वकील ने आरोप लगाया कि जलील को इस्लामपुर पुलिस के निर्देश पर निजामपुर स्थित एक होल्डिंग सेंटर में रखा गया था. वहां से उन्हें कथित तौर पर भारत-बांग्लादेश सीमा के एक सुनसान हिस्से की ओर ले जाकर बांग्लादेश में धकेलने की कोशिश भी की गई. हालांकि, बांग्लादेशी नागरिक साबित न होने पर उन्हें वापस लाकर इस्लामपुर पुलिस को सौंप दिया गया.

अहमद का आरोप है कि पुलिस ने जलील के मूल दस्तावेज अपने पास रख लिए हैं. परिवार के पास उनकी डिजिटल प्रतियां मौजूद हैं. मामले की अगली सुनवाई 10 सितंबर को होगी.

मानवाधिकार संगठन बांग्लार मानवाधिकार सुरक्षा मंच ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग, सुप्रीम कोर्ट और पश्चिम बंगाल के वरिष्ठ अधिकारियों से शिकायत कर स्वतंत्र जांच की मांग की है. संगठन ने पुलिस की देरी और कार्रवाई में कथित अनियमितताओं को भी उठाया है.

जलील के परिवार की आर्थिक स्थिति बेहद खराब है. उनकी पत्नी भी बीमार हैं और उनके बेटे अलग-अलग राज्यों में दिहाड़ी मजदूरी करते हैं. रहमान ने बताया कि जलील शारीरिक और मानसिक बीमारियों से जूझ रहे हैं तथा उन्हें नियमित दवाओं की जरूरत है. परिवार का कहना है कि अदालत की हर सुनवाई में शामिल होने के लिए काम छोड़ना पड़ता है.

रहमान ने कहा, “हमारा गुजारा मुश्किल से चलता है. अगर अदालत जाने के लिए एक दिन की मजदूरी भी छूट जाए, तो घर में खाना कैसे बनेगा?” परिवार अब जलील की सुरक्षित वापसी को किसी चमत्कार से कम नहीं मान रहा है.

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