बिनु मैथ्यू | संसद में युवाओं का भरोसा जीतने के लिए विपक्ष को अपनानी चाहिए ये 11 रणनीतियां

बिनु मैथ्यू के इस लेख में हालिया जेन जी प्रदर्शनों के जरिए सामने आए युवाओं के असंतोष को संसद की राजनीति और ठोस नीतियों से जोड़ने की जरूरत पर जोर दिया गया है.उनके मुताबिक, परीक्षा में गड़बड़ी, पेपर लीक, भर्ती में देरी और बेरोजगारी केवल अलग-अलग समस्याएं नहीं हैं, बल्कि शिक्षा और रोजगार के बीच गहरे संकट का हिस्सा हैं. विपक्ष को केवल अमित शाह के इस्तीफे या सरकार की विफलताओं को उठाने के बजाय युवाओं की आवाज को संसद में नीतिगत एजेंडे में बदलना चाहिए.

हालिया जेन जी आंदोलन मुख्य रूप से शिक्षित, शहरी और डिजिटल रूप से जुड़े युवाओं का प्रतिनिधित्व करता है, लेकिन भारत के करोड़ों ग्रामीण युवाओं की समस्या भी इससे जुड़ी हुई है. उच्च शिक्षा तक नहीं पहुंच पाने वाले युवाओं के सामने स्थानीय रोजगार के अभाव और मजबूरी में शहरों की ओर पलायन की चुनौती है. इसलिए विपक्ष की रणनीति में दोनों समूहों को शामिल करना जरूरी है.

1. शिक्षा से रोजगार तक के संकट को केंद्रीय मुद्दा बनाना

पेपर लीक, परीक्षा रद्द होना, भर्ती में देरी, सरकारी नौकरियों की कमी, शिक्षा की बढ़ती लागत और अस्थायी रोजगार एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं. विपक्ष को शिक्षा से रोजगार तक की पूरी प्रक्रिया को संसद का स्थायी मुद्दा बनाना चाहिए. साथ ही उन युवाओं की समस्याओं पर भी ध्यान देना चाहिए जो प्रतियोगी परीक्षाओं तक पहुंच ही नहीं पाते.

2. सरकार से आंकड़ों के साथ जवाब मांगना

विपक्ष को सरकार से लगातार पूछना चाहिए कि कितने सरकारी पद खाली हैं, कितनी परीक्षाएं रद्द हुईं, कितने उम्मीदवार प्रभावित हुए और भर्ती में कितना समय लग रहा है. ग्रामीण भारत में युवाओं के पलायन, कृषि रोजगार, ग्रामीण MSME और कौशल प्रशिक्षण से जुड़े आंकड़े भी संसद में मांगे जाने चाहिए.

3. शिक्षा से रोजगार संकट पर जेपीसी की मांग

विपक्ष को शिक्षा से रोजगार तक के संकट पर संयुक्त संसदीय समिति बनाने की मांग करनी चाहिए. समिति को शिक्षा की गुणवत्ता और लागत से लेकर पेपर लीक, भर्ती में देरी, खाली पदों, बेरोजगारी और सुरक्षित रोजगार की कमी तक पूरे तंत्र की जांच करनी चाहिए. इसमें छात्र, शिक्षक, अर्थशास्त्री, बेरोजगार युवा, परिवार और विशेषज्ञों को भी सुना जाना चाहिए.

4. ग्रामीण भारत को मजबूत कर मजबूर पलायन कम करना

युवा संकट को केवल शहरी रोजगार तक सीमित नहीं किया जा सकता. कृषि, खाद्य प्रसंस्करण, ग्रामीण उद्यम, एमएसएमई, शिक्षा, स्वास्थ्य और पोषण को मजबूत करना होगा, ताकि युवाओं को रोजगार के लिए घर छोड़ने की मजबूरी न हो.

5. आर्थिक नीति के केंद्र में रोजगार

सिर्फ बेहतर परीक्षा व्यवस्था से युवा संकट हल नहीं होगा. अर्थव्यवस्था को पर्याप्त उत्पादक रोजगार पैदा करना होगा. विनिर्माण, कृषि, स्वास्थ्य, शिक्षा, बुनियादी ढांचे, MSME, देखभाल कार्य और पर्यावरण आधारित रोजगार को बढ़ावा देना चाहिए. GDP वृद्धि के साथ रोजगार की संख्या और गुणवत्ता को भी आर्थिक सफलता का पैमाना बनाया जाना चाहिए.

6. युवाओं की बात सुनने के लिए यूथ कमीशन

विपक्षी सांसदों का एक आयोग बनाकर देशभर के शहरों, कस्बों और गांवों में युवाओं से सीधे संवाद किया जाना चाहिए. छात्रों, बेरोजगार स्नातकों, युवा किसानों, श्रमिकों, उद्यमियों और प्रवासी युवाओं की समस्याओं को दर्ज कर उनके आधार पर साझा युवा कार्यक्रम तैयार किया जा सकता है.

7. युवा आंदोलन को अपने राजनीतिक समर्थन में बदलने की कोशिश न हो

विपक्ष को यह मानकर नहीं चलना चाहिए कि प्रदर्शन कर रहे युवा उसके समर्थक हैं. कई युवा स्थापित राजनीतिक दलों से भी दूरी रखते हैं. इसलिए जरूरी है कि उनकी बात सुनी जाए और उनकी समस्याओं को बिना राजनीतिक स्वामित्व जताए संसद में उठाया जाए.

8. शांतिपूर्ण प्रदर्शन और लोकतांत्रिक रास्तों की रक्षा

युवाओं को शांतिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार मिलना चाहिए. विपक्ष को पुलिस कार्रवाई में अति होने पर जवाबदेही मांगनी चाहिए और साथ ही प्रदर्शन से उठे सवालों को संसदीय समितियों, प्रश्नों और कानून निर्माण की प्रक्रिया से जोड़ना चाहिए.

9. ग्रामीण युवाओं को बराबर राजनीतिक जगह

राष्ट्रीय युवा विमर्श केवल शिक्षित और डिजिटल रूप से जुड़े युवाओं तक सीमित नहीं होना चाहिए. छोटे किसान, शहरों में काम करने वाले ग्रामीण युवा, उच्च शिक्षा से वंचित युवा महिलाएं और अस्थायी मजदूर भी युवा संकट का हिस्सा हैं. उनके रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण और कृषि से जुड़े सवाल संसद में बराबर उठने चाहिए.

10. ग्रामीण उद्यम और स्थानीय रोजगार

ग्रामीण युवाओं को केवल कृषि मजदूर या प्रवासी श्रमिक मानने के बजाय उन्हें उद्यमी, तकनीशियन, कारीगर और छोटे उत्पादक बनने के अवसर दिए जाने चाहिए. कृषि को प्रसंस्करण, भंडारण, पैकेजिंग, परिवहन और विपणन से जोड़कर ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार पैदा किया जा सकता है.

11. हर आलोचना के साथ वैकल्पिक प्रस्ताव

विपक्ष की राजनीति का मूल सिद्धांत होना चाहिए कि हर आलोचना के साथ समाधान भी दिया जाए. भर्ती में देरी है तो समयबद्ध भर्ती व्यवस्था का प्रस्ताव हो, परीक्षा में गड़बड़ी है तो संस्थागत सुधार की योजना हो, खाली पद हैं तो वैकेंसी ऑडिट और भर्ती कैलेंडर हो और बेरोजगारी है तो रोजगार रणनीति पेश की जाए.

इस्तीफे की राजनीति से आगे बढ़कर बड़ी दृष्टि

लेखक के अनुसार किसी मंत्री की राजनीतिक जिम्मेदारी साबित होने पर इस्तीफे की मांग उचित हो सकती है, लेकिन अमित शाह या किसी अन्य मंत्री का इस्तीफा अपने आप उन समस्याओं का समाधान नहीं कर सकता, जिनके कारण युवा सड़कों पर उतरे हैं.

असल सवाल उस भारत का है जो देश अपने युवाओं को दे रहा है. सुरक्षित नौकरी की तलाश में संघर्ष कर रहा शहरी स्नातक और रोजगार के लिए शहर की ओर पलायन करने वाला ग्रामीण युवा अलग दिखाई दे सकते हैं, लेकिन दोनों आर्थिक सुरक्षा और सम्मान की तलाश में हैं. भारत को ऐसा देश नहीं बनना चाहिए जहां अवसर पाने का एकमात्र रास्ता गांव से शहर की ओर पलायन हो या युवा वर्षों तक कुछ सुरक्षित नौकरियों के लिए अविश्वसनीय परीक्षाओं की तैयारी करते रहें.

विपक्ष को युवाओं के मुद्दे को स्थायी संसदीय एजेंडा बनाना चाहिए और हर वर्ष शिक्षा, रोजगार, भर्ती, ग्रामीण विकास, कृषि, पलायन, स्वास्थ्य, पोषण और आर्थिक अवसरों पर बहस करानी चाहिए. युवा विपक्ष पर केवल इसलिए भरोसा नहीं करेंगे कि सरकार विफल रही है. उन्हें यह भी जानना होगा कि सत्ता में आने का दावा करने वाले दलों के पास विश्वसनीय विकल्प क्या है.

इसलिए विपक्ष को आरोप से जवाबदेही और आलोचना से रचनात्मक राजनीति की ओर बढ़ना होगा. संसद का इस्तेमाल केवल सरकार की विफलताएं उजागर करने के लिए नहीं, बल्कि युवाओं की आकांक्षाओं को नीतियों में बदलने के लिए करना होगा. युवा भारत की आवाज केवल आंदोलनों और चुनावों के दौरान नहीं, बल्कि संसद और देश की नीतियों में भी दिखाई देनी चाहिए.

बिनु मैथ्यू Countercurrents.org के संपादक हैं.

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