रक्त संबंधी बीमारियों से जूझ रहे लोगों तक दिव्यांगता सहायता अब भी क्यों नहीं पहुंच पाती
‘स्क्रोल’ की लेखिका नोलिना मिंज ने झारखंड में सिकल सेल एनीमिया और थैलेसीमिया से जूझ रहे परिवारों की स्थिति पर रिपोर्ट की है. भारत में इन बीमारियों को दिव्यांगता के रूप में मान्यता मिलने के बावजूद, जांच, इलाज और सरकारी सहायता तक पहुंच की कमी मरीजों के लिए बड़ी समस्या बनी हुई है.
सूर्योदय कुम्हार की बीमारी का पता संयोग से चला. झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम जिले के धाटकीडी गांव में रहने वाले छह वर्षीय सूर्योदय कुम्हार को अक्सर जोड़ों और मांसपेशियों में तेज दर्द और अत्यधिक थकान होती थी. उसके माता-पिता कई डॉक्टरों के पास गए, लेकिन बीमारी की सही पहचान नहीं हो सकी. उसकी 16 वर्षीय बहन सोनी में भी ऐसे ही लक्षण थे और वह हर साल कई महीनों तक स्कूल नहीं जा पाती थी.
परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर है. पिता सुनील कुंभार राजमिस्त्री हैं और महीने में 12 से 15 हजार रुपये कमाते हैं. परिवार इलाज पर लाखों रुपये खर्च कर चुका है और इसके लिए कर्ज भी लिया है.
जून में सूर्योदय कुम्हार का आधार बनवाने के लिए परिवार गोइलकेरा गया था. वहां कर्मचारियों ने उसकी खराब हालत देखकर पास में लगे स्वास्थ्य शिविर में जाने की सलाह दी. सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र की चिकित्सा अधिकारी डॉ. जयश्री पार्डिहा ने सिकल सेल एनीमिया की आशंका जताई और रैपिड टेस्ट कराया. रिपोर्ट में बीमारी के संकेत मिले. परिवार की जांच में सूर्योदय कुम्हार और उसके पिता में सिकल सेल से जुड़े संकेत सामने आए.
बाद में उसकी मेडिकल फाइल देखने पर पता चला कि जुलाई 2025 में राउरकेला के एक निजी क्लीनिक में सूर्योदय कुम्हार का सिकल सेल ट्रेट पॉजिटिव आया था. लेकिन डॉक्टर ने परिवार को इसकी जानकारी नहीं दी. परिवार अंग्रेजी की सीमित समझ के कारण रिपोर्ट भी नहीं समझ पाया.
भारत में सिकल सेल एनीमिया, थैलेसीमिया और हीमोफीलिया को दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम के तहत दिव्यांगता के रूप में मान्यता दी गई है. सरकार ने जुलाई 2023 में राष्ट्रीय सिकल सेल एनीमिया उन्मूलन मिशन शुरू किया था, जिसका लक्ष्य 2047 तक बीमारी को खत्म करना है. इसके तहत जागरूकता, स्क्रीनिंग और जांच सुविधाओं को बढ़ाने की योजना है.
इसके बावजूद ग्रामीण इलाकों में बीमारी की पहचान और इलाज बड़ी चुनौती है. झारखंड के पूर्वी और पश्चिमी सिंहभूम जिलों में स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी के कारण मरीजों को लंबे समय तक इलाज के लिए भटकना पड़ता है.
इलाज के साथ जानकारी की भी कमी
जमशेदपुर के बाबलू लोहरा के दो बच्चों शेखर और सुमन को सिकल सेल एनीमिया है. परिवार को लंबे समय तक यह नहीं बताया गया कि माता-पिता दोनों बीमारी के ट्रेट कैरियर हैं और भविष्य के बच्चों में बीमारी पहुंचने का जोखिम हो सकता है.
इलाज का खर्च भी परिवार के लिए बड़ी समस्या है. सरकारी अस्पतालों में कुछ दवाएं मुफ्त उपलब्ध होने के बावजूद वे अक्सर नहीं मिलतीं. परिवार को करीब 2,500 रुपये महीने दवाओं पर खर्च करने पड़ते हैं. बीमारी की जटिलताओं के कारण दोनों बच्चों के ऑपरेशन भी हुए, जिन पर लाखों रुपये खर्च हुए.
जनवरी में दोनों को यूनिक डिसेबिलिटी आईडी कार्ड मिले और वे 1,000 रुपये मासिक दिव्यांगता पेंशन के पात्र बने. लेकिन परिवार के अनुसार उन्हें अब तक पेंशन की राशि नहीं मिली है.
विशेषज्ञों का कहना है कि सिकल सेल बीमारी को केवल आदिवासी समुदायों तक सीमित मानना सही नहीं है. टाटा स्टील फाउंडेशन के डॉ. आकाश सत्पथी के मुताबिक स्क्रीनिंग बढ़ने पर अन्य समुदायों में भी इसके मामले सामने आ रहे हैं.
ग्रामीण मरीजों के लिए रक्त और इलाज की समस्या
18 वर्षीय अमृता करवा को बचपन में सिकल सेल एनीमिया का पता चला था. तीन साल पहले आठवीं कक्षा की परीक्षा देने जाते समय वह गर्मी और कमजोरी के कारण बेहोश हो गईं. इसके बाद उन्होंने पढ़ाई छोड़ दी.
अमृता को लगभग हर महीने रक्त चढ़ाने की जरूरत होती है. लेकिन इस साल फरवरी से मई तक चाईबासा में रक्त उपलब्ध नहीं था. परिवार को रक्त के लिए जमशेदपुर जाना पड़ा.
इस समस्या को पिछले साल सामने आए एक गंभीर मामले ने और बढ़ाया. झारखंड में थैलेसीमिया से पीड़ित पांच बच्चों में HIV संक्रमण पाया गया था. जांच में इसका संबंध चाईबासा सदर अस्पताल के ब्लड बैंक में चढ़ाए गए रक्त से सामने आया. जांच के बाद पता चला कि ब्लड बैंक बिना लाइसेंस चल रहा था और उसे अस्थायी रूप से बंद कर दिया गया.
अमृता की 21 वर्षीय बहन मधु की भी थैलेसीमिया से मौत हो गई. परिवार का आरोप है कि अस्पताल पहुंचने के बाद कई घंटे तक उन्हें डॉक्टर नहीं मिला.
बार-बार रक्त चढ़ाने वाले मरीजों में शरीर में अतिरिक्त आयरन जमा होने का खतरा रहता है, जिससे लिवर और हृदय को नुकसान हो सकता है. इसके लिए आयरन चेलेशन थेरेपी जरूरी होती है. लेकिन मरीजों और स्वास्थ्यकर्मियों में इसके बारे में भी पर्याप्त जानकारी नहीं है.
बेहतर सुविधा से बदल सकती है जिंदगी
चाईबासा की बसंती बिरुली की स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर है. उन्हें बचपन में थैलेसीमिया मेजर का पता चला था. परिवार के सहयोग और बेहतर इलाज की वजह से वह पढ़ाई जारी रख सकीं. उन्हें दिव्यांगता पहचान पत्र और पेंशन भी मिल रही है. वह अर्थशास्त्र की पढ़ाई कर रही हैं और शिक्षक बनना चाहती हैं.
बसंती का उदाहरण दिखाता है कि उचित इलाज, जानकारी और आर्थिक सहायता मिलने पर थैलेसीमिया और सिकल सेल एनीमिया से पीड़ित लोग सामान्य और सम्मानजनक जीवन जी सकते हैं.
लेकिन दूरदराज के ग्रामीण इलाकों में रहने वाले मरीजों के लिए ऐसी सुविधाएं अब भी आसानी से उपलब्ध नहीं हैं. बीमारी की समय पर पहचान, विशेषज्ञ डॉक्टरों, नियमित दवाओं, सुरक्षित रक्त और दिव्यांगता पेंशन तक पहुंच की कमी उनकी मुश्किलें बढ़ाती है. सरकार की योजनाओं और जमीन पर उनकी पहुंच के बीच यह अंतर दूर करना जरूरी है.

