रघुराम राजन | युवाओं ने अपना काम कर दिया, अब विपक्ष को आगे आना होगा
'इंडियन एक्सप्रेस' में रघुराम राजन लिखते हैं कि युवाओं में वर्षों से परीक्षा, रोजगार और भविष्य को लेकर जमा असंतोष अब खुले विरोध में बदल चुका है. परीक्षा में अनियमितताओं और पेपर लीक के खिलाफ हुए आंदोलनों में युवाओं ने पुलिस की लाठियां, आंसू गैस और मुकदमों का सामना किया. इसके बाद सरकार ने परीक्षा सुधार के लिए नंदन नीलेकणि की अध्यक्षता में उच्चस्तरीय टास्क फोर्स बनाने की घोषणा की. हालांकि, युवाओं की बेचैनी को केवल परीक्षा सुधार तक सीमित करके देखना उनके व्यापक असंतोष को नजरअंदाज करना होगा.
युवाओं की चिंता रोजगार को लेकर भी है. 15 से 29 वर्ष की उम्र के लोगों में बेरोजगारी की दर कुल बेरोजगारी दर से तीन गुने से अधिक है. शिक्षा और कौशल की कमियां, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और स्वचालन का बढ़ता प्रभाव तथा बेहतर प्रशिक्षित वैश्विक कार्यबल के साथ प्रतिस्पर्धा युवाओं के भविष्य को लेकर चिंता बढ़ा रही है.
युवाओं को लगता है कि सरकार 2047 तक भारत को विकसित देश बनाने के लक्ष्य पर जोर तो देती है, लेकिन पर्याप्त अच्छे रोजगार पैदा नहीं हो रहे हैं. उन्हें यह भी शिकायत है कि सरकार आलोचना सुनने के बजाय आलोचकों को जल्दी "राष्ट्र-विरोधी" करार देती है. आंदोलनों और युवाओं के बीच बातचीत में अधिनायकवाद, विभाजनकारी राजनीति, कारोबारी पक्षपात और भ्रष्टाचार को लेकर भी असंतोष दिखाई दिया.
इसी स्थिति में विपक्ष की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है. विपक्ष केवल सरकार का विरोध करके प्रभावी विकल्प नहीं बन सकता. उसे सरकार की योजनाओं से बेहतर वैकल्पिक नीतियां पेश करनी होंगी और युवाओं की चिंताओं को सार्वजनिक बहस के केंद्र में लाना होगा.
शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार पर नई सोच
आर्थिक मोर्चे पर विपक्ष को मानव पूंजी को अपनी आर्थिक नीति के केंद्र में रखना चाहिए. सरकार द्वारा बुनियादी ढांचे के निर्माण को महत्वपूर्ण उपलब्धि बताते हुए राजन कहते हैं कि केवल सड़क, पुल और दूसरी भौतिक संरचनाएं बेहतर मानव संसाधन का विकल्प नहीं हो सकतीं. शिक्षा और स्वास्थ्य पर सार्वजनिक खर्च का हिस्सा ठहरा हुआ है, जबकि बुनियादी ढांचे पर खर्च तेजी से बढ़ा है.
विपक्ष को शिक्षा, कौशल विकास और सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए अतिरिक्त संसाधनों के इस्तेमाल की प्राथमिकताएं तय करनी होंगी. बच्चों के पोषण, प्री-स्कूल और प्राथमिक शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार जरूरी है. ग्रामीण इलाकों में कक्षा पांच के लगभग आधे बच्चे अब भी कक्षा दो के स्तर का पाठ नहीं पढ़ पाते.
देश को बेहतर शोध और शिक्षण वाली अधिक उच्च गुणवत्ता वाली यूनिवर्सिटियों तथा उद्योगों के साथ मजबूत सहयोग की भी जरूरत है. इसके लिए सरकारों को कठिन प्राथमिकताएं तय करनी पड़ सकती हैं, जैसे कुछ क्षेत्रों में सब्सिडी घटाकर कुपोषण और बुनियादी शिक्षा पर अधिक खर्च करना.
विभाजनकारी राजनीति के बजाय समावेशी राष्ट्रवाद
राजनीतिक स्तर पर राजन विभाजनकारी बहुसंख्यकवादी राष्ट्रवाद के मुकाबले "समावेशी देशभक्ति" को विकल्प बताते हैं. भारत की विविधता को स्वीकार करते हुए सभी समुदायों को समान स्थान देने की नीति देश को अधिक मजबूत बना सकती है.
परिसीमन और अल्पसंख्यकों के साथ असमान व्यवहार को वह देश के सामने दो बड़ी राजनीतिक चुनौतियों के रूप में रखते हैं. यदि परिसीमन में उन राज्यों के हितों की अनदेखी हुई, जिन्होंने जनसंख्या वृद्धि को सफलतापूर्वक नियंत्रित किया है, तो खासकर दक्षिणी राज्यों में लंबे समय तक असंतोष पैदा हो सकता है.
इसी तरह नागरिकता संशोधन कानून और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण जैसी प्रक्रियाओं को लेकर अल्पसंख्यकों में चिंता का उल्लेख किया गया है. लेख में "बुलडोजर राज" की भी आलोचना की गई है और कहा गया है कि कई मामलों में लोगों को बिना मुकदमे के दंडित किए जाने की शिकायतें सामने आई हैं.
एक प्रभावी विपक्ष को यह साबित करना होगा कि उसका भारत का विचार देश को ज्यादा मजबूती से जोड़ सकता है. उसे राज्यों के बीच परिसीमन पर सहमति बनाने और अल्पसंख्यकों को समान नागरिक अधिकारों का भरोसा दिलाने की कोशिश करनी होगी.
2029 से पहले विपक्ष को करना होगा काम
विपक्ष को 2029 के चुनाव का इंतजार करने के बजाय अभी से काम शुरू करना चाहिए. संविधान के उल्लंघन, प्रशासनिक एजेंसियों के कथित दुरुपयोग और "बुलडोजर राज" के खिलाफ जहां भी और जिसके खिलाफ भी कार्रवाई हो, वहां सामूहिक विरोध की जरूरत है. राज्यों में विपक्षी दलों के बीच आपसी टकराव कम करके साझा न्यूनतम कार्यक्रम तैयार किया जाना चाहिए.
विपक्षी राज्यों में लोकतांत्रिक संस्थाओं की सुरक्षा और पुलिस के इस्तेमाल पर ऐसी व्यवस्थाएं लागू की जा सकती हैं, जिनकी मांग विपक्ष केंद्र से करता रहा है. साथ ही शिक्षा, स्वास्थ्य और कौशल विकास के सफल मॉडलों को साझा राष्ट्रीय एजेंडे में शामिल किया जा सकता है.
राजन दिल्ली में शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में आम आदमी पार्टी की पहलों, ओडिशा के कौशल विकास कार्यक्रम और तमिलनाडु में स्कूल छोड़ चुके बच्चों को दोबारा शिक्षा से जोड़ने की योजनाओं जैसे उदाहरणों से सीख लेने की बात कहते हैं. विपक्षी राज्य 2029 से पहले इन नीतियों को लागू कर अपने वैकल्पिक मॉडल को जनता के सामने रख सकते हैं.
राजन का निष्कर्ष है कि मजबूत विपक्ष केवल सरकार के लिए चुनौती नहीं, बल्कि लोकतंत्र और देश के लिए भी उपयोगी है. युवाओं ने अपने असंतोष और मांगों के जरिए राजनीतिक व्यवस्था को एक अवसर दिया है. अब विपक्ष की जिम्मेदारी है कि वह उस ऊर्जा को ठोस नीतियों, साझा राजनीतिक एजेंडे और लोकतांत्रिक कार्रवाई में बदले.
रघुराम राजन भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर हैं. यह उनके मूल अंग्रेजी लेख का हिंदी में अनुदित अंश है.

