'स्पर्मागेडन': क्या दुनिया पुरुष प्रजनन संकट का सामना कर रही है?
क्या दुनिया एक ऐसे दौर में प्रवेश कर रही है, जहां पुरुषों की प्रजनन क्षमता गंभीर संकट का सामना करेगी? हाल के वर्षों में प्रकाशित कई वैज्ञानिक अध्ययनों ने इस सवाल को वैश्विक बहस का विषय बना दिया है. कुछ वैज्ञानिकों का दावा है कि पिछले 50 वर्षों में पुरुषों में औसत टेस्टोस्टेरोन का स्तर लगभग आधा रह गया है और शुक्राणुओं की संख्या में भी लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है. हालांकि, इस निष्कर्ष पर वैज्ञानिक समुदाय पूरी तरह एकमत नहीं है.
‘द गार्डियन’ के मुताबिक, येल विश्वविद्यालय से जुड़े प्रोफेसर हगाई लेविन का कहना है कि टेस्टोस्टेरोन में लगभग 50 प्रतिशत की गिरावट बेहद चिंताजनक है. उनकी टीम इससे पहले भी एक अध्ययन प्रकाशित कर चुकी है, जिसे लोकप्रिय रूप से "स्पर्मागेडन" कहा गया. इस अध्ययन में दावा किया गया था कि दुनिया भर में पुरुषों के शुक्राणुओं की संख्या तेजी से घट रही है.
कुछ वैज्ञानिकों ने तो यहां तक आशंका जताई है कि यदि यही रुझान जारी रहा, तो आने वाले दशकों में मानव प्रजनन क्षमता पर गंभीर असर पड़ सकता है. अमेरिका के स्वास्थ्य मंत्री रॉबर्ट एफ. केनेडी जूनियर ने भी घटती शुक्राणु संख्या को "अस्तित्व का संकट" बताया है.
हालांकि, सभी वैज्ञानिक इस निष्कर्ष से सहमत नहीं हैं. यूनिवर्सिटी ऑफ मैनचेस्टर के एंड्रोलॉजी विशेषज्ञ प्रोफेसर एलन पेसी का कहना है कि उपलब्ध आंकड़े इतने स्पष्ट नहीं हैं कि वैश्विक स्तर पर शुक्राणुओं की संख्या में लगातार गिरावट का दावा किया जा सके. उनकी टीम के हालिया विश्लेषण में शुक्राणुओं की कुल संख्या में बड़ी गिरावट के पर्याप्त प्रमाण नहीं मिले, हालांकि शुक्राणुओं की गुणवत्ता में कुछ कमी जरूर दिखाई दी.
विशेषज्ञों का मानना है कि पुरुष प्रजनन क्षमता को केवल शुक्राणुओं की संख्या से नहीं आंका जा सकता. यह पुरुषों के समग्र स्वास्थ्य से भी गहराई से जुड़ी है. इसी कारण मोटापा, मधुमेह और खराब जीवनशैली को सबसे महत्वपूर्ण कारणों में माना जा रहा है.
इम्पीरियल कॉलेज लंदन के प्रजनन अंतःस्रावी विशेषज्ञ प्रोफेसर चन्ना जयसेना के अनुसार, बढ़ता मोटापा टेस्टोस्टेरोन को एस्ट्रोजन में बदलने की प्रक्रिया तेज कर देता है और शरीर के हार्मोन संतुलन को प्रभावित करता है. इससे शुक्राणु उत्पादन पर भी असर पड़ सकता है. मधुमेह भी टेस्टोस्टेरोन के स्तर में कमी, शुक्राणुओं के डीएनए को नुकसान और यौन स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से जुड़ा पाया गया है.
इसके अलावा माइक्रोप्लास्टिक, वायु प्रदूषण, रासायनिक प्रदूषकों और जलवायु परिवर्तन जैसे पर्यावरणीय कारणों पर भी व्यापक शोध हो रहा है. कुछ अध्ययनों में मानव वीर्य और अंडकोष में माइक्रोप्लास्टिक कण मिलने की बात सामने आई है. वहीं कुछ शोध वायु प्रदूषण और शुक्राणुओं के डीएनए में बदलाव के बीच संबंध की ओर संकेत करते हैं.
फिर भी वैज्ञानिकों का कहना है कि इन कारणों और पुरुष प्रजनन क्षमता के बीच प्रत्यक्ष संबंध अभी पूरी तरह स्थापित नहीं हुआ है. यूनिवर्सिटी ऑफ एडिनबर्ग के प्रोफेसर रॉड मिशेल के अनुसार, कई प्रयोगों में प्लास्टिक से जुड़े रसायनों का टेस्टोस्टेरोन या अंडकोष के विकास पर कोई स्पष्ट प्रभाव नहीं मिला. उनका मानना है कि पशुओं पर हुए कई अध्ययन सीधे मनुष्यों पर लागू नहीं किए जा सकते.
इस बीच विशेषज्ञ एक दूसरी चिंता भी जता रहे हैं. सोशल मीडिया पर "लो-टी" यानी कम टेस्टोस्टेरोन के नाम पर टेस्टोस्टेरोन जेल और इंजेक्शन का प्रचार तेजी से बढ़ रहा है. डॉक्टरों के अनुसार बिना चिकित्सकीय सलाह के टेस्टोस्टेरोन लेना उल्टा नुकसान पहुंचा सकता है. बाहरी टेस्टोस्टेरोन लेने से शरीर अपने प्राकृतिक हार्मोन का उत्पादन कम कर देता है, जिससे शुक्राणु बनना भी रुक सकता है.
हालांकि भविष्य को लेकर कुछ उम्मीदें भी हैं. वैज्ञानिक कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) की मदद से सबसे स्वस्थ शुक्राणु चुनने की तकनीक, माइक्रोफ्लूडिक्स आधारित नई जांच प्रणालियां और प्रयोगशाला में विकसित शुक्राणुओं जैसी तकनीकों पर काम कर रहे हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले कुछ वर्षों में पुरुष बांझपन के इलाज के नए विकल्प उपलब्ध हो सकते हैं.
फिलहाल वैज्ञानिकों के बीच इस बात पर सहमति है कि पुरुष प्रजनन स्वास्थ्य को गंभीरता से लेने की जरूरत है. लेकिन साथ ही यह भी जरूरी है कि अधूरे वैज्ञानिक प्रमाणों के आधार पर घबराहट न फैलाई जाए. स्वस्थ जीवनशैली अपनाना, मोटापे और मधुमेह पर नियंत्रण रखना, प्रदूषण कम करना और बिना डॉक्टर की सलाह के हार्मोन उपचार से बचना ऐसे कदम हैं जो अभी भी सबसे प्रभावी माने जाते हैं.
पुरुष प्रजनन क्षमता पर शोध अभी जारी है. इसलिए यह बहस अभी खत्म नहीं हुई है, लेकिन इतना तय है कि यह केवल प्रजनन का नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य का भी एक महत्वपूर्ण मुद्दा बन चुका है.

