"मुझे गोली क्यों मारी गई?" पेलेट गन से अंधी हुई छात्रा की कहानी, जो फिल्म ‘चौहान’ से गायब कश्मीरियों की सच्चाई सामने लाती है
साल 2016 में हिजबुल मुजाहिदीन कमांडर बुरहान वानी की मौत के बाद कश्मीर में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए. इन्हीं प्रदर्शनों के दौरान 14 वर्षीय छात्रा इंशा मुश्ताक की जिंदगी हमेशा के लिए बदल गई. वह न तो प्रदर्शन में शामिल थी और न ही किसी हिंसा का हिस्सा. अपने घर की रसोई की खिड़की से बाहर का शोर सुनकर उसने केवल एक बार झांकने की कोशिश की. उसी क्षण सुरक्षा बलों की ओर से दागी गई पेलेट गन के सैकड़ों धातु के छर्रों ने उसके चेहरे, गले, सीने और दोनों आंखों को छलनी कर दिया.
‘आर्टिकल 14’ में हरिंदर बावेजा की रिपोर्ट के मुताबिक, कई सर्जरी के बावजूद इंशा की दोनों आंखों की रोशनी हमेशा के लिए चली गई. आज, लगभग एक दशक बाद भी वह दुनिया को नहीं देख सकती, लेकिन उसकी कहानी कश्मीर में पेलेट गन के इस्तेमाल से जुड़े सबसे बड़े मानवीय सवालों में से एक बन चुकी है.
हाल के दिनों में रिलीज हुई फिल्म 'चौहान' के एक हिस्से में पेलेट गन के इस्तेमाल को बहादुरी और व्यवस्था बनाए रखने के प्रतीक की तरह दिखाए जाने पर नई बहस शुरू हुई है. लेख के अनुसार, फिल्म कश्मीर में हजारों घायल और सैकड़ों दृष्टिहीन हुए लोगों के अनुभवों को लगभग नजरअंदाज कर देती है. लेखिका का तर्क है कि यदि फिल्मों में सुरक्षा बलों की कहानी दिखाई जाती है, तो उन नागरिकों की कहानी भी सामने आनी चाहिए जिनकी जिंदगी इस हिंसा से हमेशा के लिए बदल गई.
इंशा की कहानी सिर्फ एक पीड़िता की कहानी नहीं है. वह लगातार संघर्ष करते हुए आगे बढ़ी. उसने ब्रेल लिपि सीखी, दसवीं और बारहवीं की परीक्षा उत्तीर्ण की और अब स्नातक की पढ़ाई कर रही है. वह परीक्षाओं में अपने उत्तर बोलकर लिखवाती है और कंप्यूटर पर भी ब्रेल तकनीक की मदद से पढ़ाई करती है. उसका सपना भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) में जाना है.
इंशा आज भी सामान्य जीवन जीने की कोशिश करती है. वह खाना बनाती है, घर के काम करती है और अपनी सीमाओं के भीतर आत्मनिर्भर बनने का प्रयास करती है. हालांकि वह बताती है कि नमक और लाल मिर्च जैसे मसालों की पहचान करने के लिए उसे पहले थोड़ा स्वाद चखना पड़ता है. यह उसकी मजबूरी भी है और उसके साहस की कहानी भी.
लेख केवल इंशा तक सीमित नहीं रहता, बल्कि 2016 में पेलेट गन से प्रभावित पूरे कश्मीर की तस्वीर सामने रखता है. इंडियन जर्नल ऑफ ऑप्थैल्मोलॉजी में 2022 में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, 777 ऐसे लोगों का अध्ययन किया गया जिनकी आंखों में पेलेट लगे थे. इनमें अधिकांश लोगों की दृष्टि गंभीर रूप से प्रभावित हुई. लगभग 80 प्रतिशत लोगों की आंखों की रोशनी इतनी कम हो गई कि वे केवल सामने खड़े व्यक्ति की उंगलियां गिन पाने की स्थिति में रह गए. अध्ययन ने स्पष्ट रूप से नागरिकों के खिलाफ पेलेट गन के इस्तेमाल से बचने की सलाह दी और कहा कि इससे शारीरिक, मानसिक और आर्थिक स्तर पर गहरा नुकसान होता है.
आंकड़े बताते हैं कि बुरहान वानी की मौत के बाद केवल पांच सप्ताह के भीतर करीब 10,000 लोग घायल हुए. इनमें 6,205 लोग पेलेट गन से घायल हुए और लगभग 1,100 लोगों की आंखों में पेलेट लगे. जम्मू-कश्मीर उच्च न्यायालय में दायर एक मामले के दौरान केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल ने बताया था कि 3,765 पेलेट कारतूस चलाए गए थे. प्रत्येक कारतूस में लगभग 450 धातु के छर्रे होते हैं. यानी विरोध प्रदर्शनों के दौरान करीब 17 लाख पेलेट दागे गए.
मुंबई के वरिष्ठ रेटिना विशेषज्ञ डॉ. सुंदरम नटराजन और उनकी टीम ने उस समय श्रीनगर जाकर सैकड़ों नेत्र सर्जरी की थीं. अध्ययन में इन मामलों की तुलना इराक युद्ध में हुई आंखों की चोटों से की गई और बताया गया कि कश्मीर में केवल चार महीनों में जितनी गंभीर आंखों की चोटें सामने आईं, वे कई युद्ध क्षेत्रों के आंकड़ों के बराबर थीं. सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि यह सब किसी विदेशी युद्ध में नहीं, बल्कि भारत के भीतर भारतीय नागरिकों के साथ हुआ.
इंशा के जीवन में एक और विडंबना भी है. तत्कालीन सरकार ने उसे गैस एजेंसी आवंटित करने की घोषणा की थी, लेकिन सरकार बदलने और राजनीतिक परिस्थितियों के कारण वह वादा आज तक पूरा नहीं हो सका. वर्षों से उसका परिवार अलग-अलग सरकारों और अधिकारियों के चक्कर लगा रहा है.
आज इंशा की सबसे बड़ी पहचान उसकी दृष्टिहीनता नहीं, बल्कि उसका सवाल है. वह अब भी पूछती है
“मुझे गोली क्यों मारी गई? मैंने ऐसा क्या किया था कि मेरे ऊपर बंदूक तान दी गई?”
यह सवाल केवल इंशा का नहीं है. यह उन सैकड़ों लोगों का सवाल है जिनकी जिंदगी 2016 की घटनाओं के बाद हमेशा के लिए बदल गई. यह सवाल उन नीतियों, उन फैसलों और उन परिस्थितियों पर भी है जिनमें भीड़ नियंत्रण के नाम पर ऐसे हथियारों का इस्तेमाल किया गया. कश्मीर की कहानी केवल खूबसूरत वादियों, पर्यटन और फिल्मों की नहीं है. वह उन लोगों की भी कहानी है, जिनकी जिंदगी एक पल में अंधेरे में बदल गई और जो आज भी जवाब का इंतजार कर रहे हैं.

