‘नागरिकों को भारत सरकार का गुलाम बनाया जा रहा है; लोग विरोध करें, तो केस थोप दिए जाते हैं’, बॉम्बे हाई कोर्ट की टिप्पणी
बॉम्बे हाई कोर्ट ने गुरुवार (2 जुलाई) को व्यवस्था दी कि केवल इसलिए कि कोई नागरिक केंद्र सरकार के कुछ फैसलों का विरोध कर रहा है और उसके खिलाफ नारेबाजी कर रहा है, उसे किसी क्षेत्र से तड़ीपार (निष्कासित) करने का आधार नहीं हो सकता.
एकल पीठ के न्यायाधीश न्यायमूर्ति माधव जामदार ने सोशलिस्ट डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (एसडीपीआई) के महासचिव सईद अहमद अब्दुल वाहिद चौधरी (49) के खिलाफ तड़ीपार का आदेश पारित करने के लिए मुंबई पुलिस को कड़ी फटकार लगाई. सईद नागरिकता अधिनियम में संशोधनों और ज्ञानवापी मस्जिद विवाद सहित केंद्र सरकार के विभिन्न फैसलों के खिलाफ सक्रिय रूप से मोर्चे और धरने आयोजित कर रहे थे, जैसा कि ‘लाइव लॉ’ में नर्सी बेनवाल ने अपनी रिपोर्ट में बताया है.
याचिका का अवलोकन करते हुए, न्यायाधीश यह जानना चाहते थे कि सईद को एक साल के लिए तड़ीपार करने का ऐसा आदेश उनके खिलाफ दर्ज पांच प्राथमिकियों (एफआईआर) के भरोसे क्यों पारित किया गया, जो कि ज्यादातर भारत सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन आयोजित करने के लिए थीं.
न्यायमूर्ति जामदार ने मौखिक रूप से टिप्पणी की, "यह क्या है? सभी नागरिकों को भारत सरकार का गुलाम बनाया जा रहा है... वे विरोध प्रदर्शन नहीं कर सकते, वे आंदोलन नहीं कर सकते- यह सब क्या है? अब इतने सारे पेपर लीक हुए हैं. अगर लोग विरोध करेंगे, तो आप केस थोप देंगे... यह क्या है? विरोध करना नागरिकों का अधिकार है... याचिकाकर्ता ने सिर्फ 'भाजपा सरकार मुर्दाबाद', 'अमित शाह मुर्दाबाद' जैसे नारे लगाए हैं... नागरिक ऐसे नारे क्यों नहीं लगा सकते? ऐसे नारों के लिए तड़ीपार के आदेश क्यों?"
न्यायाधीश ने मौखिक रूप से आगे कहा कि पुलिस नागरिकों को सिर्फ इसलिए तड़ीपार नहीं कर सकती क्योंकि उन्होंने सरकार के फैसलों का विरोध किया है. न्यायमूर्ति जामदार ने कहा, "पुलिस मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री की नौकर नहीं है, वे लोक सेवक (पब्लिक सर्वेंट) हैं... मैं आपके अधिकारियों पर भारी जुर्माना (कॉस्ट) लगाने जा रहा हूँ..."
न्यायाधीश जामदार ने महाराष्ट्र के राजनीतिक गलियारे में सांसदों और विधायकों के पाला बदलने के साथ चल रही "हॉर्स-ट्रेडिंग" (विधायकों की खरीद-फरोख्त) पर भी टिप्पणी की. यह टिप्पणी तब आई जब न्यायाधीश ने ध्यान दिया कि सईद एक राजनीतिक दल, एसडीपीआई से जुड़े हैं.
न्यायाधीश ने हल्के-फुल्के अंदाज में कहा, "परसों, एक दुर्घटना में एक 10 साल के बच्चे की मौत हो गई और राज्य विधानसभा इस बात पर चर्चा कर रही थी कि एक पीठासीन अधिकारी कैसे चुना जाता है और वह कैसे एक दल से दूसरे दल में चला गया है... यह क्या है? यहाँ तक कि आपको भी पाला बदल लेना चाहिए... वैसे भी पूरे महाराष्ट्र में हॉर्स-ट्रेडिंग चल रही है. आप (सईद) पर कुछ एफआईआर हैं... पाला बदलने पर विचार करें, वहां एक वॉशिंग मशीन है."
अपने लिखवाए गए (डिक्टेटेड) आदेश में, न्यायमूर्ति जामदार ने स्पष्ट किया कि सरकार के फैसलों का केवल विरोध करना किसी नागरिक को तड़ीपार करने का आधार नहीं बनता है, और यदि ऐसा किया जाता है, तो यह उनके बोलने (अभिव्यक्ति) की स्वतंत्रता और सम्मान के मौलिक अधिकार को प्रभावित करेगा.
न्यायाधीश जामदार ने आदेश में लिखवाया, "याचिकाकर्ता ने अपनी क्षमता के अनुसार भारत सरकार द्वारा लिए गए कुछ फैसलों के खिलाफ मोर्चे और धरने आयोजित किए हैं. यह महाराष्ट्र पुलिस अधिनियम के तहत किसी व्यक्ति को तड़ीपार करने का आधार नहीं हो सकता. की गई कार्रवाई दुर्भावनापूर्ण है. तदनुसार, तड़ीपार के आदेश को रद्द करते हुए रिट याचिका का निपटारा किया जाता है. भारत के संविधान के अनुच्छेद 19 और 21 के अनुसार, नागरिकों को न केवल अपनी राय व्यक्त करने की स्वतंत्रता है, बल्कि सम्मान के साथ जीने का भी अधिकार है. भारत सरकार के कुछ फैसलों का केवल विरोध करने के लिए उत्तरदाताओं (प्रतिवादियों) द्वारा याचिकाकर्ता के खिलाफ की गई कार्रवाई उसके मौलिक अधिकारों को प्रभावित करती है."

