सीक्रेसी के साये में रखा मोदी सरकार ने मंदिर को, आरटीआई से भी बाहर

केंद्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) के 2024 के एक आदेश के अनुसार, गृह मंत्रालय ने श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की स्थापना के लिए सरकार द्वारा स्वीकृत योजना को एक "गोपनीय फाइल" में रखा और आरटीआई अधिनियम के तहत इसे सार्वजनिक करने से इनकार कर दिया. मंत्रालय का तर्क था कि इसे जारी करने से संबंधित व्यक्तियों की जान को खतरा हो सकता है.

‘पीटीआई और टेलीग्राफ वेब डेस्क’ के अनुसार यह आदेश नीरज शर्मा द्वारा दायर एक आरटीआई आवेदन से संबंधित है, जिन्होंने इस योजना और उससे जुड़े सरकारी आदेशों की प्रमाणित प्रतियां मांगी थीं. गृह मंत्रालय से संतोषजनक जवाब न मिलने के बाद उन्होंने आयोग का दरवाजा खटखटाया था. सुनवाई के दौरान, मंत्रालय ने दलील दी कि यह जानकारी "गोपनीय और संवेदनशील प्रकृति की" है और इसे उजागर करने से "संबंधित व्यक्तियों के जीवन को खतरा हो सकता है." इसके तहत आरटीआई अधिनियम की धारा 8(1)(g) का हवाला देते हुए इस अनुरोध को खारिज कर दिया गया.

मंत्रालय के रुख को स्वीकार करते हुए, तत्कालीन मुख्य सूचना आयुक्त हीरालाल सामरिया ने माना कि जन सूचना अधिकारी (पीआईओ) द्वारा उचित जवाब दे दिया गया है और आयोग द्वारा इसमें और किसी हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है. इसके साथ ही 18 जून, 2024 को इस अपील का निपटारा कर दिया गया. सुप्रीम कोर्ट के अयोध्या फैसले के बाद, केंद्र सरकार द्वारा 5 फरवरी, 2020 को इस योजना को मंजूरी दी गई थी. एक राजपत्र अधिसूचना (गजट नोटिफिकेशन) में कहा गया था कि इसमें ट्रस्ट के कामकाज और प्रबंधन, ट्रस्टियों के अधिकारों, मंदिर के निर्माण और अन्य आकस्मिक मामलों को नियंत्रित करने वाले प्रावधान शामिल हैं.

गृह मंत्रालय ने आयोग को यह भी बताया कि यह ट्रस्ट एक स्वतंत्र और स्वायत्त निकाय (ऑटोनॉमस बॉडी) है, जिसमें केंद्र या राज्य सरकारों का कोई वित्तीय, प्रशासनिक या अन्य हस्तक्षेप नहीं है. मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि केंद्र की भूमिका सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुपालन में केवल ट्रस्ट के 'सैटलर' (स्थापना करने वाले) बनने तक सीमित थी.

एक अन्य अलग आदेश में, जो 4 जून, 2024 को जारी किया गया था, आयोग ने इस ट्रस्ट को आरटीआई अधिनियम के तहत एक सार्वजनिक प्राधिकरण (पब्लिक अथॉरिटी) मानने की याचिका को भी खारिज कर दिया. गृह मंत्रालय और ट्रस्ट ने दलील दी थी कि यह न तो सरकार के स्वामित्व में है, न इसके नियंत्रण में है, और न ही सरकार द्वारा इसे बड़े पैमाने पर वित्तपोषित (सबस्टेंशियली फाइनेंस्ड) किया जाता है. इसका गठन केवल सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पालन करने के लिए किया गया था.

उनकी इन दलीलों से सहमति जताते हुए, आयोग ने माना कि ट्रस्ट का निर्माण किसी सरकारी अधिसूचना के बजाय शीर्ष अदालत (सुप्रीम कोर्ट) के निर्देशों के पालन में एक 'ट्रस्ट डीड' (न्यास विलेख) के माध्यम से किया गया था.

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