मनुस्मृति की छवि में भारत का संविधान बदलने की आरएसएस-भाजपा परियोजना

सुनील मुखोपाध्याय के मुताबिक, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नए संसद भवन में संविधान की प्रति लेकर प्रवेश करने के बाद कुछ लोगों को लगा कि शायद भाजपा अब संविधान के समाजवादी, लोकतांत्रिक, संघीय और धर्मनिरपेक्ष चरित्र का सम्मान करेगी. लेकिन इसके बाद विपक्षी दलों के सांसदों को तोड़कर संसद के दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत जुटाने की कोशिशों ने संविधान में बदलाव की आशंकाओं को फिर सामने ला दिया.

भाजपा के कई नेता संविधान की प्रस्तावना से "समाजवाद" और "धर्मनिरपेक्षता" शब्द हटाने की मांग करते रहे हैं. उनका तर्क है कि ये शब्द मूल संविधान में नहीं थे और 1976 में जोड़े गए. हालांकि संविधान के मूल प्रावधानों में पहले से ही सामाजिक न्याय, समानता और धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र की भावना मौजूद थी. इन शब्दों को बाद में इसलिए जोड़ा गया क्योंकि आरएसएस और उससे जुड़े संगठनों ने संवैधानिक मूल्यों पर लगातार हमले किए.

भाजपा आरएसएस का राजनीतिक संगठन है और आरएसएस एक अनुशासित, काडर-आधारित संस्था है. भाजपा चुनावी रणनीति बदल सकती है, लेकिन वैचारिक और संगठनात्मक मुद्दों पर उसे आरएसएस की नीतियों का पालन करना पड़ता है. आरएसएस की विचारधारा पर गोलवलकर की पुस्तक We, or Our Nationhood Defined का गहरा प्रभाव है. इसमें उन्होंने नाजी जर्मनी की नस्लीय नीतियों की प्रशंसा की और भारत में रहने वाले मुसलमानों को हिंदू संस्कृति में विलीन होने या अधीनस्थ स्थिति स्वीकार करने की बात कही.

आरएसएस का भारतीय राष्ट्रीय ध्वज और संविधान के प्रति रुख भी सवालों के घेरे में रहा है. स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान तिरंगा भारतीय जनता के साझा संघर्ष का प्रतीक था, जबकि आरएसएस भगवा ध्वज को प्राथमिकता देता था. 1947 में उसके मुखपत्र ऑर्गनाइजर ने तिरंगे के तीन रंगों को अशुभ और देश के लिए नुकसानदेह बताया था. हिंदुत्व विचारक विनायक दामोदर सावरकर ने भी मनुस्मृति को "आज का हिंदू कोड" कहा था.

मनुस्मृति में समाज को जन्म आधारित वर्ण व्यवस्था में बांटा गया है. ब्राह्मणों, क्षत्रियों और वैश्यों को विशेष अधिकार दिए गए, जबकि शूद्रों का काम ऊंची जातियों की सेवा करना बताया गया. उन्हें वेदों और शिक्षा से दूर रखने की बात कही गई. महिलाओं के संबंध में भी मनुस्मृति उन्हें स्वतंत्र अधिकार देने से इनकार करती है और पिता, पति तथा पुत्र के नियंत्रण में रहने की व्यवस्था का समर्थन करती है.

इसके विपरीत भारतीय संविधान सभी नागरिकों को समान अधिकार देता है. महिलाओं को संपत्ति और अन्य अधिकार दिलाने के लिए डॉ. बी. आर. आंबेडकर ने हिंदू कोड बिल तैयार किया था. आरएसएस ने इसका विरोध किया और 1949 में उसके कार्यकर्ताओं ने दिल्ली में प्रदर्शन करते हुए प्रधानमंत्री तथा आंबेडकर के पुतले जलाए. आज महिला आरक्षण की बात करने वाली भाजपा सरकार ने भी 2023 में पारित महिला आरक्षण कानून को परिसीमन से जोड़कर उसके लागू होने में देरी की है.

मनुस्मृति आधारित व्यवस्था का सबसे बड़ा असर दलितों, पिछड़ों और आदिवासियों पर पड़ेगा. संविधान ने उन्हें शिक्षा, रोजगार, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और सामाजिक सम्मान के अधिकार दिए हैं, लेकिन जातिगत भेदभाव और हिंसा अब भी जारी है. मुसलमानों और दलितों के खिलाफ भीड़ हिंसा, गोहत्या के नाम पर हमले और सामाजिक बहिष्कार जैसी घटनाएं इस चिंता को और गंभीर बनाती हैं.

आरएसएस के संगठनात्मक ढांचे और वित्तीय गतिविधियों को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं. देश के अधिकांश सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक संगठनों को पंजीकरण तथा आय-व्यय का ऑडिट कराना पड़ता है, लेकिन आरएसएस को लंबे समय से इससे अलग रखा गया है. उसके बड़े कार्यालयों और नेताओं को मिलने वाली विशेष सुरक्षा पर भी सार्वजनिक जवाबदेही की मांग उठती रही है.

आरएसएस संघीय व्यवस्था और सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार का भी विरोध करता रहा है. गोलवलकर ने भारत को एक केंद्रीकृत राज्य बनाने और "एक देश, एक राज्य, एक विधायिका और एक कार्यपालिका" की व्यवस्था की वकालत की थी. यह विचार भारत की भाषाई, सांस्कृतिक और क्षेत्रीय विविधता के विपरीत है.

इसलिए संविधान की रक्षा केवल किसी एक राजनीतिक दल का मुद्दा नहीं है. यह महिलाओं, दलितों, आदिवासियों, अल्पसंख्यकों, पिछड़े वर्गों और सभी नागरिकों के अधिकारों की रक्षा का प्रश्न है. यदि संविधान कमजोर हुआ, तो समानता, स्वतंत्रता, बंधुत्व और लोकतांत्रिक अधिकार भी खतरे में पड़ जाएंगे. भारत को आगे बढ़ाने का रास्ता मनुस्मृति की ओर लौटना नहीं, बल्कि संविधान के मूल्यों को मजबूत करना है.

सुनील मुखोपाध्याय लेखक और पूर्व पत्रकार हैं. यह ‘कॉउंटरकरंट्स’ में प्रकाशित उनके मूल अंग्रेजी लेख का हिंदी में अनूदित अंश है.

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