एक राष्ट्र, एक पार्टी: क्या दलबदल विरोधी कानून मर चुका है?
एक राष्ट्र, एक कर. एक राष्ट्र, एक राशन कार्ड. एक राष्ट्र, एक चुनाव.
मोदी सरकार को इस तरह के नारे पसंद हैं. हालिया राजनीतिक घटनाक्रम को देखते हुए आलोचक अब एक नया नारा गढ़ रहे हैं – एक राष्ट्र, एक पार्टी.
‘स्क्रोल’ के मुताबिक, पिछले कुछ समय में कई विपक्षी दलों में टूट और विलय की घटनाएं सामने आई हैं. पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के सांसदों और विधायकों के एक बड़े समूह ने पार्टी नेतृत्व के खिलाफ बगावत की. इसी तरह महाराष्ट्र में शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) में टूट की अटकलें लगाई जा रही हैं. इससे पहले आम आदमी पार्टी के कई राज्यसभा सांसदों के भाजपा के साथ जाने की खबरें भी सुर्खियों में रहीं.
इन घटनाओं ने एक बार फिर दलबदल विरोधी कानून की प्रासंगिकता और प्रभावशीलता पर सवाल खड़े कर दिए हैं.
विपक्ष का अंत
दलबदल विरोधी कानून में एक प्रावधान है जिसके तहत यदि किसी दल के दो-तिहाई विधायक या सांसद किसी दूसरे दल के साथ विलय का समर्थन करें तो उसे वैध माना जा सकता है. इसी प्रावधान का सहारा लेकर कई राजनीतिक समूह अपनी स्थिति को कानूनी बताने की कोशिश करते हैं.
लेकिन सवाल यह है कि क्या केवल सांसदों और विधायकों का समूह किसी दूसरे दल में शामिल होकर विलय का दावा कर सकता है, या फिर मूल राजनीतिक दल का औपचारिक विलय भी जरूरी है? यही विवाद आज कई राजनीतिक घटनाओं के केंद्र में है.
विपक्षी दलों का आरोप है कि इन टूटों के पीछे केवल राजनीतिक मतभेद नहीं बल्कि सत्ता और संसाधनों का दबाव भी काम कर रहा है. यदि बड़े पैमाने पर विपक्षी दल कमजोर होते हैं, तो भारतीय लोकतंत्र में राजनीतिक प्रतिस्पर्धा पर असर पड़ना तय है.
विरोधी या समर्थक?
भारत में दलबदल विरोधी कानून 1985 में लागू किया गया था. इसका उद्देश्य निर्वाचित प्रतिनिधियों को पार्टी छोड़कर दूसरी राजनीतिक ताकतों के साथ जाने से रोकना था.
उस समय कांग्रेस पार्टी को आशंका थी कि लगातार बढ़ते राजनीतिक विभाजन और टूट-फूट से उसकी स्थिति कमजोर हो सकती है. इसलिए पार्टी अनुशासन बनाए रखने के लिए कानूनी रास्ता चुना गया.
हालांकि आलोचकों का तर्क रहा है कि इस कानून ने निर्वाचित प्रतिनिधियों की स्वतंत्रता को सीमित कर दिया. सांसद और विधायक कई मामलों में अपने मतदाताओं से अधिक अपनी पार्टी के प्रति जवाबदेह हो गए.
इसके बावजूद कानून का मूल उद्देश्य, यानी दलबदल रोकना, कभी पूरी तरह सफल नहीं हुआ. व्यक्तिगत दलबदल की जगह अब सामूहिक दलबदल और विलय की रणनीति अपनाई जाने लगी.
भाजपा और अदालतों ने कानून को कमजोर किया
हाल के वर्षों में कई न्यायिक फैसलों ने दलबदल विरोधी कानून की व्याख्या को लेकर नई बहस छेड़ दी है.
कर्नाटक और महाराष्ट्र के राजनीतिक संकटों के दौरान अदालतों के फैसलों ने ऐसी परिस्थितियां पैदा कीं जिनसे सरकारें बदलीं और सत्ता संतुलन बदल गया. वहीं गोवा में कांग्रेस के विधायकों के भाजपा में शामिल होने को अदालत द्वारा वैध ठहराए जाने के बाद यह बहस और तेज हो गई कि कानून वास्तव में क्या कहता है और उसकी सीमाएं क्या हैं.
आलोचकों का कहना है कि इन फैसलों ने दलबदल विरोधी कानून को कमजोर किया है. दूसरी ओर समर्थकों का तर्क है कि लोकतंत्र में निर्वाचित प्रतिनिधियों को अपनी राजनीतिक पसंद बदलने की स्वतंत्रता भी होनी चाहिए.
एक वास्तविक समस्या
दलबदल विरोधी कानून की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि उसने समस्या को खत्म नहीं किया, बल्कि उसका स्वरूप बदल दिया. अब व्यक्तिगत दलबदल की बजाय बड़े समूहों में टूट देखने को मिलती है.
फिर भी जिस समस्या को यह कानून संबोधित करता है, वह वास्तविक है. अधिकांश सांसद और विधायक केवल अपनी व्यक्तिगत लोकप्रियता के कारण नहीं, बल्कि अपनी पार्टी के प्रतीक, संगठन और नेतृत्व के कारण चुनाव जीतते हैं.
उदाहरण के लिए, तृणमूल कांग्रेस को मिलने वाले वोटों में ममता बनर्जी की लोकप्रियता की बड़ी भूमिका है. इसी तरह भाजपा ने भी कई चुनावों में मतदाताओं से सीधे नरेंद्र मोदी के नाम पर वोट मांगे हैं.
ऐसे में सवाल उठता है कि यदि कोई प्रतिनिधि पार्टी के नाम पर चुना गया हो, तो क्या उसे कार्यकाल के बीच में मतदाताओं की राय लिए बिना राजनीतिक निष्ठा बदलने का अधिकार होना चाहिए?
चुनावों में भरोसे का अंत
यहीं दलबदल की राजनीति लोकतंत्र के लिए गंभीर चुनौती बन जाती है.
यदि मतदाता किसी पार्टी को वोट दें और कुछ समय बाद उनका प्रतिनिधि किसी दूसरी पार्टी में चला जाए, तो जनादेश का अर्थ कमजोर पड़ जाता है. इससे चुनावी प्रक्रिया में जनता का भरोसा प्रभावित हो सकता है.
यह चिंता ऐसे समय में और बढ़ जाती है जब चुनावी वित्तपोषण, संस्थागत निष्पक्षता और लोकतांत्रिक प्रतिस्पर्धा को लेकर पहले से ही सवाल उठ रहे हैं.
दलबदल विरोधी कानून की आलोचना की जा सकती है, लेकिन उसका मूल प्रश्न आज भी कायम है. यदि निर्वाचित प्रतिनिधि बिना जनता के पास वापस गए अपना राजनीतिक पक्ष बदल सकते हैं, तो आखिर मतदाता के जनादेश की कीमत क्या रह जाती है?

