पीएमओ की फॉरेस्ट फाइल्स: बंद कमरों में हुए फैसलों ने कैसे बदल दी संरक्षण की नियमपुस्तिका

वन संरक्षण नियमों में तीन साल में किए गए तीन संशोधनों ने प्रतिपूरक वनीकरण के लिए निम्नीकृत वन भूमि के उपयोग पर लगे प्रतिबंधों को धीरे-धीरे खत्म कर दिया है. इसके तहत महत्वपूर्ण फैसले प्रधानमंत्री कार्यालय में बंद कमरों में हुई बैठकों में लिए गए.

‘न्यू दिल्ली पोस्ट’ में अक्षय देशमाने की यह खोजी रिपोर्ट पर्यावरण मंत्रालय द्वारा वन संरक्षण नियमों में तीन वर्षों (नवंबर 2023 से अगस्त 2025) के भीतर किए गए तीन बड़े संशोधनों और उनके पीछे प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) की भूमिका पर प्रकाश डालती है. इन बदलावों के माध्यम से बुनियादी ढांचा और खनन कंपनियों के लिए पुराने एवं घने जंगलों को नष्ट करने के बदले 'निम्नीकृत वन भूमि' (जैसे दलदल, बंजर भूमि, झाड़ियाँ) को प्रतिपूरक वनीकरण के रूप में इस्तेमाल करने का रास्ता आसान कर दिया गया है. सेवानिवृत्त अधिकारियों और पर्यावरणविदों के अनुसार, यह कदम सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का उल्लंघन है और इससे देश के प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र को अपूरणीय क्षति पहुंचेगी.

मूल वन संरक्षण अधिनियम के तहत नियम था कि यदि कोई कंपनी बुनियादी ढांचे, खनन या बिजली परियोजना के लिए वन भूमि नष्ट करती है, तो उसे कानूनी रूप से किसी गैर-वन भूमि पर वन क्षेत्र तैयार करके इसकी भरपाई करनी होगी. पर्यावरण मंत्रालय ने वर्ष 2022 में नियमों को व्यापक रूप से संशोधित कर 'वन (संरक्षण) नियम, 2022' जारी किए थे. इसमें निम्नीकृत वन भूमि का उपयोग केवल "असाधारण परिस्थितियों" तक सीमित था.

मार्च 2023 में भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) और सिक्किम सरकार से मिले पत्रों ने इस कड़े नियम को बदलने की नींव रखी. एनएचएआई के अध्यक्ष संतोष कुमार यादव ने शिकायत की थी कि वन अधिकारी गैर-वन भूमि की मांग कर रहे हैं, जिससे परियोजनाओं में देरी हो रही है. वहीं, सिक्किम के पर्यावरण सचिव प्रदीप कुमार ने तर्क दिया कि राज्य का 82.3% हिस्सा वन भूमि है, इसलिए प्रतिपूरक वनीकरण के लिए गैर-वन भूमि उपलब्ध नहीं है. उन्होंने चेतावनी दी कि इस नियम से सीमावर्ती क्षेत्रों का विकास और इको-टूरिज्म ठप हो जाएगा. इन अनुरोधों के बाद मंत्रालय की एक सलाहकार समिति ने छूट की सिफारिश की.

तीन वर्षों में किए गए तीन संशोधन

पहला संशोधन (नवंबर 2023): इसके तहत 'वन (संरक्षण एवं संवर्धन) नियम, 2023' लागू किए गए. इसमें 2022 के नियमों के "असाधारण परिस्थितियों" वाले प्रतिबंध को हटाकर एक "विशेष व्यवस्था" शुरू की गई. इसके तहत 33% से अधिक वन क्षेत्र वाले राज्यों, ट्रांसमिशन लाइनों, ऑप्टिकल फाइबर बिछाने, और संपर्क सड़कों के निर्माण जैसी कई परिस्थितियों में गैर-वन भूमि के बजाय निम्नीकृत वन भूमि के उपयोग की अनुमति दे दी गई.

दूसरा संशोधन (2024): फरवरी 2024 में 'ग्रीन क्रेडिट नियम 2023' के तहत एक कार्यप्रणाली जारी की गई, जिसमें निजी कंपनियों को वृक्षारोपण के माध्यम से ग्रीन क्रेडिट कमाने के लिए निम्नीकृत वन भूमि सौंपने का निर्देश दिया गया. इसके बाद सितंबर 2024 में नियमों की भाषा को और लचीला बनाया गया. दस्तावेजों से पता चलता है कि दिसंबर 2024 में पीएमओ के एक सलाहकार द्वारा बुलाई गई बैठक में कोयला और खान मंत्रालयों के खनन हितों की वकालत करने वाले अनुरोधों पर चर्चा हुई, जिसके बाद एक स्पष्टीकरण जारी कर केंद्रीय और कुछ राज्य कंपनियों को यह बड़ी छूट दी गई.

तीसरा संशोधन (अगस्त 2025): यह सबसे बड़ा और सबसे विवादास्पद बदलाव था. इसके तहत परमाणु ऊर्जा अधिनियम के अंतर्गत आने वाले महत्वपूर्ण एवं रणनीतिक खनिजों (जैसे कोबाल्ट, लिथियम, यूरेनियम, थोरियम आदि) का खनन करने वाली कंपनियों को प्रतिपूरक वनीकरण के लिए निम्नीकृत वन भूमि के उपयोग की मंजूरी दी गई. नियमों को सार्वजनिक करने से ठीक पहले पीएमओ में बंद कमरे की बैठक में "गहरे दबे" खनिजों को भी इस सूची में जोड़ दिया गया. खान मंत्रालय के सचिव वी.एल. कांत राव ने तर्क दिया था कि अधिकांश महत्वपूर्ण खनिज वन क्षेत्रों में हैं, अतः बिना किसी प्रतिबंध के दोगुनी निम्नीकृत भूमि पर वनीकरण की अनुमति मिलनी चाहिए.

सुप्रीम कोर्ट के आदेश और कानूनी चुनौतियाँ

नियमों में इन बदलावों को न्यायपालिका में गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है: न्यायालय का अंतरिम आदेश: वर्ष 2024 में सेवानिवृत्त आईएफएस अधिकारी अशोक कुमार शर्मा और अन्य पर्यावरणविदों ने याचिका दायर की. याचिका में आगाह किया गया कि भारत का वन क्षेत्र पहले से ही राष्ट्रीय वन नीति के 33% के लक्ष्य के मुकाबले केवल 21% है. यदि वन भूमि के विनाश की भरपाई के लिए किसी दूसरी वन भूमि (निम्नीकृत) को ही गिना जाएगा, तो कुल वन क्षेत्र कभी नहीं बढ़ पाएगा. इस पर सुनवाई करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने 3 फरवरी 2025 को अंतरिम आदेश दिया कि बिना अदालती आदेश के केंद्र या राज्य ऐसा कोई कदम नहीं उठाएंगे जिससे वन भूमि में कमी आए.

अवमानना याचिका: अगस्त 2025 में तीसरे संशोधन के आने के बाद, सेवानिवृत्त आईएफएस अधिकारी प्रकृति श्रीवास्तव ने पर्यावरण सचिव तन्मय कुमार के खिलाफ अवमानना याचिका दायर की. याचिका के अनुसार, सरकार का यह कदम कोर्ट के 'भूमि के बदले भूमि, पेड़ के बदले पेड़' के सिद्धांत और संवैधानिक दायित्वों (अनुच्छेद 48A और 51A(g)) को सीधी चुनौती देता है.

श्रीवास्तव ने सरकार के राष्ट्रीय सुरक्षा और रक्षा संबंधी तर्कों को खारिज करते हुए कहा कि पारिस्थितिक सुरक्षा भी उतनी ही अनिवार्य है और संरक्षण ही हमारा असली और दीर्घकालिक बचाव है. सरकार को नियमों को अधिसूचित करने से पहले सुप्रीम कोर्ट से अनुमति लेनी चाहिए थी.

(अक्षय देशमाने एक पर्यावरण पत्रकार हैं, यह उनकी खोजी रपट का हिंदी में अनुदित सारांश है)

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