श्रवण गर्ग | राहुल गांधी ने मोदी को भी जनता के बीच जाने पर मजबूर किया

‘हरकारा डीप डाइव’ के लाइव एपिसोड में निधीश त्यागी एवं वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग के साथ मौजूदा विपक्षी राजनीति के एक महत्वपूर्ण सवाल पर चर्चा हुई. सवाल यह है कि राहुल गांधी लगातार जनता और युवाओं के बीच सक्रिय दिखाई दे रहे हैं, लेकिन कांग्रेस पार्टी उसी अनुपात में इसका राजनीतिक लाभ क्यों नहीं उठा पा रही है. क्या कांग्रेस का कमजोर संगठन राहुल गांधी की बढ़ती राजनीतिक सक्रियता के रास्ते में सबसे बड़ी बाधा है, या राहुल गांधी ने संगठन से अलग अपनी एक नई राजनीतिक रणनीति तैयार कर ली है.

श्रवण गर्ग ने चर्चा की शुरुआत राहुल गांधी की लोकप्रियता को लेकर बनाए जा रहे राजनीतिक नैरेटिव से की. उनका कहना था कि वैकल्पिक मीडिया और यूट्यूब चैनलों पर लगातार राहुल गांधी की लोकप्रियता और नरेंद्र मोदी के कमजोर होने की चर्चा होती है. लेकिन इस तरह की लगातार कवरेज से राहुल गांधी को वास्तविक राजनीतिक फायदा कितना मिल रहा है, यह अलग सवाल है. उनके मुताबिक, इसका एक परिणाम यह भी हो सकता है कि नरेंद्र मोदी और भाजपा का आक्रामक रुख और अधिक बढ़ जाए.

चर्चा में कांग्रेस संगठन की स्थिति पर भी विस्तार से बात हुई. श्रवण गर्ग का तर्क था कि मौजूदा राजनीतिक लड़ाई पारंपरिक अर्थों में दो संगठनों के बीच नहीं, बल्कि दो प्रमुख नेताओं के बीच दिखाई दे रही है. उनके अनुसार, राहुल गांधी ने अपनी रणनीति में एक महत्वपूर्ण बदलाव किया है. पहले वे कांग्रेस संगठन को मजबूत करने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन अब उन्होंने जनता को सीधे सरकार के सामने खड़ा करने की राजनीति पर अधिक जोर दिया है.

इसी संदर्भ में उन्होंने कहा कि राहुल गांधी को हर राज्य की छोटी-बड़ी संगठनात्मक लड़ाइयों में उलझने के बजाय यह तय करना होगा कि उन्हें अपनी राजनीतिक ऊर्जा कहां लगानी है. पंजाब, उत्तराखंड, गोवा और गुजरात जैसे राज्यों में कांग्रेस की संगठनात्मक चुनौतियों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि इन राज्यों की समस्याओं से अलग राहुल गांधी की राष्ट्रीय राजनीति को समझना भी जरूरी है.

बातचीत में कांग्रेस के नेतृत्व और उत्तर भारत में उसकी राजनीतिक कमजोरी पर भी सवाल उठे. श्रवण गर्ग के अनुसार, कांग्रेस को उत्तर भारत में ऐसा प्रभावशाली और मुखर नेतृत्व चाहिए, जो सीधे जनता के बीच जाकर राजनीतिक संवाद कर सके. इसी तरह भाजपा की दक्षिण भारत में मौजूदगी और उसके नेतृत्व को लेकर भी सवाल उठाए गए.

चर्चा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा युवाओं और छात्र आंदोलनों पर केंद्रित रहा. श्रवण गर्ग ने नेपाल, बांग्लादेश और श्रीलंका के हालिया आंदोलनों से लेकर अरब स्प्रिंग, 1968 के फ्रांस के छात्र आंदोलन और 1974 के जेपी आंदोलन तक के उदाहरण दिए. उनका तर्क था कि आज की राजनीति में पारंपरिक संगठन के अलावा जनता और खासकर युवाओं की सक्रिय भागीदारी भी सत्ता को चुनौती देने की क्षमता रखती है.

राहुल गांधी की राजनीति को इसी बदलाव से जोड़ते हुए उन्होंने कहा कि राहुल जनता की लहर पर सवार होने की कोशिश कर रहे हैं, न कि केवल कांग्रेस संगठन की ताकत पर निर्भर रहने की. उन्होंने इंदिरा गांधी के दौर का उदाहरण देते हुए व्यक्तिगत लोकप्रियता और जनता से सीधे संबंध की राजनीति की तुलना भी की.

हालांकि, अंत में श्रवण गर्ग ने यह स्पष्ट किया कि लोकप्रियता और चुनावी जीत एक ही चीज नहीं हैं. राहुल गांधी की लोकप्रियता बढ़ने के बावजूद वास्तविक सवाल यह है कि कांग्रेस आज चुनावी रूप से कहां खड़ी है. 2024 के बाद इंडिया ब्लॉक की स्थिति, विपक्षी दलों के बीच बदलते समीकरण और भाजपा की चुनावी रणनीति आने वाले समय में निर्णायक होंगे.

इस पूरी बातचीत का केंद्रीय सवाल यही है कि राहुल गांधी जनता के साथ अपना सीधा राजनीतिक संवाद मजबूत कर रहे हैं, लेकिन क्या कांग्रेस उस राजनीतिक ऊर्जा को चुनावी संगठन और वोट में बदल पाएगी. आने वाले विधानसभा चुनाव और 2029 का लोकसभा चुनाव इस सवाल का सबसे बड़ा जवाब देंगे. पूरी बातचीत यहां सुन सकते हैं.

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