महिला आरक्षण और परिसीमन बिल पर एनडीए ने क्यों लगाया विराम?

महिला आरक्षण और परिसीमन (डिलिमिटेशन) से जुड़े विधेयकों को संसद के मौजूदा मानसून सत्र के एजेंडे से बाहर रखने के केंद्र सरकार के फैसले ने नई राजनीतिक बहस छेड़ दी है. इसे लेकर यह सवाल उठ रहा है कि क्या सरकार जेन ज़ी के विरोध प्रदर्शनों के दबाव में पीछे हटी है, या इसके पीछे कोई बड़ा राजनीतिक कारण है. ‘साउथ फर्स्ट’ के मुताबिक, राजनीतिक संकेत बताते हैं कि इसकी वजह सड़क का दबाव नहीं, बल्कि संसद का गणित और राज्यों की चिंताएं हैं.

दरअसल, 17 अप्रैल 2026 को आयोजित विशेष सत्र में संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2026, परिसीमन विधेयक, 2026 और केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक, 2026 को पर्याप्त समर्थन नहीं मिल सका था. संविधान संशोधन के लिए आवश्यक दो-तिहाई बहुमत नहीं जुट पाया. विधेयक के पक्ष में 298 वोट पड़े, जबकि 230 सांसदों ने इसका विरोध किया. इसके बाद सरकार ने परिसीमन और केंद्र शासित प्रदेशों से जुड़े अन्य विधेयकों को भी वापस ले लिया.

अप्रैल में क्या प्रस्ताव था?

सरकार 2023 में पारित महिला आरक्षण कानून को जल्द लागू करना चाहती थी. मौजूदा कानून के अनुसार महिला आरक्षण अगली जनगणना और परिसीमन के बाद ही लागू हो सकता है. अप्रैल में लाए गए प्रस्ताव में 2011 की जनगणना के आधार पर परिसीमन कराने और लोकसभा की सीटें 543 से बढ़ाकर लगभग 850 करने का प्रस्ताव था. इसका उद्देश्य 2029 के लोकसभा चुनाव से ही महिलाओं को एक-तिहाई आरक्षण देना था.

दक्षिणी राज्यों की सबसे बड़ी चिंता

इस प्रस्ताव का सबसे अधिक विरोध दक्षिण भारत के राज्यों ने किया. उनका तर्क था कि यदि सीटों का बंटवारा केवल जनसंख्या के आधार पर हुआ तो अपेक्षाकृत अधिक जनसंख्या वृद्धि वाले उत्तरी राज्यों को अधिक सीटें मिलेंगी, जबकि जनसंख्या नियंत्रण में सफल दक्षिणी राज्यों का संसद में प्रभाव घट जाएगा.

यही कारण है कि 1970 के दशक में राज्यों की सीटों की संख्या को स्थिर रखने का फैसला किया गया था, ताकि परिवार नियोजन में सफल राज्यों को राजनीतिक नुकसान न उठाना पड़े. अब बिना व्यापक सहमति के इस व्यवस्था में बदलाव क्षेत्रीय असंतुलन और राजनीतिक टकराव को बढ़ा सकता है.

क्या जेन ज़ी आंदोलन वजह है?

हाल के महीनों में नीट-यूजी विवाद और अन्य मुद्दों पर युवाओं की सक्रियता बढ़ी है. महिला आरक्षण और संघीय ढांचे जैसे मुद्दों पर भी युवा अपनी राय खुलकर रख रहे हैं. लेकिन विश्लेषकों का मानना है कि सरकार के फैसले के पीछे सबसे बड़ा कारण जेन ज़ी का आंदोलन नहीं, बल्कि संसद में पर्याप्त समर्थन का अभाव है.

संविधान संशोधन केवल जनसमर्थन से नहीं, बल्कि दोनों सदनों में आवश्यक बहुमत से पारित होता है. अप्रैल में यही संसदीय गणित सरकार के खिलाफ गया और विधेयक पारित नहीं हो सका.

आगे का रास्ता क्या हो सकता है?

सरकार के सामने अब सबसे व्यवहारिक विकल्प यह माना जा रहा है कि महिला आरक्षण और परिसीमन को अलग-अलग मुद्दों के रूप में आगे बढ़ाया जाए. विशेषज्ञों का सुझाव है कि फिलहाल 543 लोकसभा सीटों के भीतर ही निर्वाचन क्षेत्रों के रोटेशन के जरिए महिलाओं को एक-तिहाई आरक्षण लागू किया जा सकता है. वहीं, परिसीमन और लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाने जैसे संवेदनशील विषयों पर नई जनगणना के आंकड़ों और राज्यों के बीच व्यापक सहमति के बाद फैसला लिया जाए.

मानसून सत्र में इन विधेयकों को रोकना सरकार के लिए सुधारों से पीछे हटना नहीं, बल्कि राजनीतिक सहमति बनने तक इंतजार करने की रणनीति माना जा रहा है. महिला आरक्षण और परिसीमन दोनों ही महत्वपूर्ण संवैधानिक सुधार हैं, लेकिन इन्हें लागू करने के लिए संसद के साथ-साथ राज्यों का भरोसा भी उतना ही जरूरी है. सरकार के सामने अब चुनौती यही है कि वह ऐसा संतुलित प्रस्ताव लाए, जो महिलाओं को राजनीतिक प्रतिनिधित्व भी दे और संघीय ढांचे पर उठ रही आशंकाओं को भी दूर कर सके.

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