एफसीआरए संशोधन पर अमेरिकी सांसद की चेतावनी, बोले- 'चर्चों पर नियंत्रण की कोशिश भारत-अमेरिका संबंधों को प्रभावित कर सकती है'

‘स्क्रोल’ के मुताबिक, विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम (एफसीआरए) में प्रस्तावित संशोधन को लेकर अमेरिका के रिपब्लिकन सांसद राइली मूर ने भारत सरकार की आलोचना की है. उन्होंने आरोप लगाया कि भारतीय संसद चर्चों और धार्मिक संस्थाओं पर सरकारी नियंत्रण का रास्ता खोलने की कोशिश कर रही है. मूर ने चेतावनी दी कि यदि यह विधेयक मौजूदा स्वरूप में पारित होता है तो इसका असर भारत-अमेरिका द्विपक्षीय संबंधों पर पड़ सकता है.

सोशल मीडिया पर जारी बयान में वेस्ट वर्जीनिया से सांसद राइली मूर ने कहा, "ईसाई धर्म भारत में सेंट थॉमस के मालाबार तट पर आने के समय से मौजूद है. इसके बावजूद भारतीय संसद ऐसे नियमों में बदलाव पर विचार कर रही है, जो सरकार को चर्चों और धार्मिक संस्थाओं पर नियंत्रण की अनुमति देंगे. यह ईसाइयों के खिलाफ स्पष्ट हमला है."

उन्होंने आगे कहा, "यदि यह विधेयक इसी रूप में आगे बढ़ता है तो यह भारत-अमेरिका संबंधों में गंभीर चिंता का विषय होगा."

हालांकि, भारत के विदेश मंत्रालय ने अमेरिकी सांसद की टिप्पणी पर फिलहाल कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है.

क्या हैं प्रस्तावित संशोधन?

एफसीआरए के तहत किसी भी गैर-सरकारी संगठन (एनजीओ) के लिए विदेशी फंड प्राप्त करने से पहले पंजीकरण कराना अनिवार्य होता है. सरकार ने मार्च 2026 में बजट सत्र के दौरान इस कानून में संशोधन का विधेयक संसद में पेश किया था, लेकिन अभी तक इसे किसी भी सदन से मंजूरी नहीं मिली है.

प्रस्तावित संशोधन के अनुसार, यदि किसी संस्था का एफसीआरए पंजीकरण समाप्त हो जाता है या रद्द कर दिया जाता है, तो उसके विदेशी फंड और उनसे बनाई गई संपत्तियों का नियंत्रण सरकार द्वारा नियुक्त एक 'नामित प्राधिकरण' को सौंप दिया जाएगा.

यदि संबंधित संस्था दोबारा अपना पंजीकरण बहाल नहीं करा पाती है, तो यह नियंत्रण स्थायी हो जाएगा. इसके बाद नामित प्राधिकरण उन संपत्तियों का उपयोग, हस्तांतरण या निपटान 'सार्वजनिक उद्देश्य' के लिए कर सकेगा.

सिर्फ चर्च नहीं, सभी संस्थाएं दायरे में

सरकार का कहना है कि यह प्रावधान केवल चर्चों या धार्मिक संस्थाओं पर लागू नहीं होगा, बल्कि एफसीआरए के तहत पंजीकृत सभी गैर-सरकारी संगठनों पर समान रूप से लागू होगा. विधेयक में यह भी कहा गया है कि यदि मामला किसी धार्मिक स्थल से जुड़ा होगा तो उसकी धार्मिक पहचान और स्वरूप सुरक्षित रखा जाएगा.

विपक्ष और नागरिक संगठनों की आपत्ति

विपक्षी दलों ने इस विधेयक को "खतरनाक" और "दमनकारी" बताते हुए इसका विरोध किया है. कई नागरिक संगठनों का भी कहना है कि प्रस्तावित संशोधन से गैर-सरकारी संगठनों पर सरकारी नियंत्रण और बढ़ जाएगा तथा उनकी स्वतंत्र कार्यप्रणाली प्रभावित होगी.

सरकार के संसद में दिए गए आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2016-17 से 2021-22 के बीच 6,600 से अधिक गैर-सरकारी संगठनों के एफसीआरए लाइसेंस रद्द किए गए थे. वहीं, 2019-20 से 2021-22 के बीच 13,520 पंजीकृत संस्थाओं को 55,700 करोड़ रुपये से अधिक का विदेशी अंशदान प्राप्त हुआ था.

एफसीआरए संशोधन को लेकर अब बहस केवल विदेशी फंडिंग के नियमन तक सीमित नहीं रह गई है. यह मुद्दा धार्मिक स्वतंत्रता, गैर-सरकारी संगठनों की स्वायत्तता और भारत-अमेरिका संबंधों तक पहुंच गया है. ऐसे में संसद में इस विधेयक पर होने वाली आगे की चर्चा और सरकार का अंतिम रुख अहम माना जा रहा है.

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