जगजीत सिंह | जब उम्मीद भी कीमत मांगने लगे

‘काउंटरकरंट्स’ में जगजीत सिंह लिखते हैं कि कभी उम्मीद को सबसे बड़ा बराबरी का माध्यम माना जाता था. गरीब परिवार का बच्चा डॉक्टर बनने का सपना देख सकता था, सामान्य परिवार अपना घर बनाने की उम्मीद कर सकता था और युवा यह भरोसा रख सकता था कि शिक्षा उसके लिए नए अवसरों के दरवाजे खोलेगी. सपना आज भी वही है, लेकिन उसे हासिल करने की कीमत लगातार बढ़ती जा रही है.

आधुनिक भारत में अच्छी शिक्षा, बेहतर स्वास्थ्य सेवा, सुरक्षित घर, कानूनी सहायता और रोजगार की प्रतिस्पर्धा में आगे बढ़ने के लिए आर्थिक संसाधन जरूरी होते जा रहे हैं. यह केवल गरीबी की कहानी नहीं है, बल्कि अवसरों के बढ़ते व्यावसायीकरण की कहानी भी है.

भारत ने आर्थिक विकास के साथ बुनियादी ढांचे, तकनीक और रोजगार के नए अवसरों में विस्तार किया है. लेकिन सवाल यह है कि क्या आर्थिक विकास ने उम्मीद को अधिक लोगों तक पहुंचाया है या फिर भुगतान करने की क्षमता रखने वालों के लिए अवसरों को और बेहतर बनाया है.

शिक्षा इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण है. गरीब परिवारों के लिए शिक्षा अगली पीढ़ी के भविष्य में निवेश होती है. माता-पिता अपनी जरूरतों को सीमित करके बच्चों की पढ़ाई पर खर्च करते हैं, क्योंकि उन्हें उम्मीद होती है कि शिक्षा उनके जीवन की दिशा बदल सकती है. लेकिन निजी कोचिंग, तकनीक, अंग्रेजी माध्यम की शिक्षा, अतिरिक्त गतिविधियों और करियर मार्गदर्शन तक पहुंच विद्यार्थियों के बीच बड़ा अंतर पैदा करती है. कागज पर अवसर समान हो सकते हैं, लेकिन वास्तविक जीवन में संसाधनों की असमानता परिणामों को प्रभावित करती है.

स्वास्थ्य के क्षेत्र में यह अंतर और गंभीर हो जाता है. संपन्न परिवार के लिए बीमारी चिंता का कारण हो सकती है, लेकिन गरीब या निम्न-मध्यम वर्गीय परिवार के लिए गंभीर बीमारी आर्थिक तबाही बन सकती है. इलाज का खर्च वर्षों की बचत खत्म कर सकता है, परिवार को कर्ज में धकेल सकता है या बच्चों की शिक्षा और भविष्य के लिए रखी संपत्ति बेचने को मजबूर कर सकता है.

आवास भी युवाओं के लिए बढ़ती चुनौती है. संपत्ति की कीमतें, किराया, शिक्षा, परिवहन और रोजगार की अनिश्चितता ने घर खरीदने के सपने को कई लोगों के लिए दूर कर दिया है. युवाओं से मेहनत और कौशल बढ़ाने को कहा जाता है, लेकिन सवाल यह है कि अगर पूरी पीढ़ी मेहनत करने के बावजूद मंजिल को लगातार दूर होता पाए तो क्या होगा.

असमानता को केवल अमीर और गरीब के बीच संपत्ति के अंतर के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए. असली अंतर यह भी है कि किसके पास असफल होने के बाद दूसरी कोशिश का अवसर है. अमीर विद्यार्थी एक और साल पढ़ सकता है, कारोबारी नुकसान सह सकता है और मरीज बेहतर इलाज के लिए कहीं भी जा सकता है. गरीब व्यक्ति के लिए एक गलती भी भारी पड़ सकती है.

यही वजह है कि उम्मीद केवल भावना नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक संसाधन है. जब लोगों को भरोसा रहता है कि मेहनत से जीवन बेहतर हो सकता है, तब समाज में विश्वास और स्थिरता बनी रहती है. लेकिन जब सफलता पैसे, संपर्क और विरासत पर निर्भर दिखाई देने लगे तो महत्वाकांक्षा निराशा और प्रतिस्पर्धा असंतोष में बदल सकती है.

समाधान संपत्ति या निजी क्षेत्र को खत्म करना नहीं है. जरूरत इस बात की है कि शिक्षा, स्वास्थ्य, न्याय और सम्मान तक बुनियादी पहुंच केवल भुगतान करने की क्षमता पर निर्भर न हो. भारत को परिणामों की समानता नहीं, बल्कि अवसरों की मजबूत समानता चाहिए.

ऐसी व्यवस्था चाहिए जिसमें सरकारी स्कूल गुणवत्तापूर्ण शिक्षा दे सकें, चिकित्सा आपातकाल परिवार को आर्थिक संकट में न धकेले, कामकाजी परिवारों के लिए घर संभव हो और सामान्य नागरिक बिना असाधारण संसाधनों के न्याय पा सके.

भारत की सबसे बड़ी ताकत केवल उसकी अर्थव्यवस्था नहीं, बल्कि उसके लोगों की उम्मीद है. माता-पिता का विश्वास कि उनके बच्चे उनसे बेहतर जीवन जी सकेंगे और युवाओं का भरोसा कि प्रतिभा परिस्थितियों को बदल सकती है, विकास की असली ताकत है.

इस उम्मीद को विलासिता की वस्तु नहीं बनने देना चाहिए. किसी देश की समृद्धि केवल इस बात से तय नहीं होती कि उसके सबसे अमीर नागरिक क्या खरीद सकते हैं. असली समृद्धि तब है, जब एक सामान्य परिवार अपने बच्चे से विश्वास के साथ कह सके कि उसकी क्षमता और मेहनत उसे वह बनने का अवसर देगी, जो वह बनना चाहता है.

क्योंकि सबसे गहरी असमानता संपत्ति की नहीं, संभावनाओं की असमानता है. और जब उम्मीद की भी कीमत तय होने लगे, तब सवाल उठना स्वाभाविक है—हम विकास आखिर किसके लिए कर रहे हैं?

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