ज़ोया हसन | उत्तर प्रदेश में भाजपा के आधिपत्य की महत्वपूर्ण परीक्षा

व यह तय करेगा कि 2024 में दिखा यह बदलाव क्षणिक था या स्थायी, और क्या भाजपा का राजनीतिक खाका भविष्य में भी अपना राष्ट्रीय दबदबा बनाए रख पाएगा.

ज़ोया के मुताबिक, 2014 के बाद से भारतीय जनता पार्टी का जो राजनीतिक वर्चस्व लगभग अजेय नजर आ रहा था, उसमें अब दरारें साफ दिखाई देने लगी हैं. 2024 के आम चुनाव में पार्टी को बड़ा झटका लगा, जब उसने अपना पूर्ण संसदीय बहुमत खो दिया और सरकार बनाने के लिए सहयोगियों पर निर्भर होना पड़ा. तब से बढ़ती महंगाई, बेरोजगारी, युवा असंतोष और परीक्षाओं में अनियमितताओं जैसे मुद्दों ने राजनीतिक रूप से तूल पकड़ा है. सीमांकन व महिला आरक्षण विधेयक की स्थिति, कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के विरोध के बाद तत्कालीन शिक्षा मंत्री का इस्तीफा और संसद सत्र के हंगामे ने सरकार की जवाबदेही पर सवाल खड़े किए हैं.

इसके बावजूद भाजपा एक बेहद मजबूत राजनीतिक शक्ति बनी हुई है, जिसके पास विशाल जनाधार और वैचारिक अपील है. असली सवाल यह है कि क्या भाजपा के प्रभुत्व को गढ़ने वाली ताकतें अब अपनी सीमाओं तक पहुँच चुकी हैं? इस सवाल का सबसे स्पष्ट परीक्षण उत्तर प्रदेश में होना है.

सत्ता का गढ़ और 2024 के संकेत

उत्तर प्रदेश केवल भारत का सबसे अधिक आबादी वाला राज्य नहीं है, बल्कि यह भाजपा की सत्ता का केंद्रीय गढ़ है. 2014 में भाजपा ने यहाँ की 80 में से 71 सीटें जीती थीं, जबकि 2019 में सपा-बसपा गठबंधन के बावजूद 62 सीटों पर कब्जा जमाया था. केंद्र में भाजपा की लगातार दो पूर्ण बहुमत की सरकारों के पीछे यूपी का चुनावी वजन ही सबसे बड़ा आधार था.

हालाँकि, 2024 के नतीजों ने दिखाया कि राज्य में भाजपा का आधार खिसका है. पार्टी की सीटें 62 से घटकर 33 पर आ गईं, जबकि समाजवादी पार्टी ने 37 और कांग्रेस ने 6 सीटें जीतीं. सबसे बड़ी गिरावट अवध क्षेत्र में देखी गई, जो राम मंदिर आंदोलन का केंद्र रहा है. 2022 के विधानसभा चुनाव में जहाँ भाजपा ने अवध की 154 सीटों में से 101 पर जीत दर्ज की थी, वहीं 2024 के लोकसभा चुनाव में वह केवल 51 विधानसभा क्षेत्रों में ही बढ़त बना सकी.

यह परिणाम इसलिए भी अहम था क्योंकि यह अयोध्या में राम मंदिर के उद्घाटन के तुरंत बाद आया—जो भाजपा और संघ परिवार के दशकों लंबे वैचारिक अभियान की पराकाष्ठा थी. इसके बावजूद भाजपा फैजाबाद (अयोध्या) और आसपास की कई सीटें हार गई. इसका अर्थ यह नहीं कि मंदिर की राजनीति अप्रासंगिक हो गई है, लेकिन यह साफ हो गया कि केवल वैचारिक प्रतीक अब चुनाव जिताने के लिए काफी नहीं हैं. मंदिर निर्माण के बाद सामने आए दान विवादों ने भी यह दिखाया कि बड़े प्रतीक भी प्रामाणिकता के सवालों से अछूते नहीं रहते.

आर्थिक मोर्चे पर दरारें और युवाओं का असंतोष

2024 के जनादेश ने यह संकेत दिया कि मतदाता अब किसी एक वैचारिक मुद्दे को बाकी सभी चिंताओं पर हावी नहीं होने देना चाहते, खासकर तब जब आर्थिक जमीनी हकीकत दावों से मेल न खाती हो.  उत्तर प्रदेश दशकों की तरह अब भी आर्थिक रूप से पिछड़ा बना हुआ है.  राज्य के प्रमुख औद्योगिक केंद्रों—कानपुर, फिरोजाबाद, भदोही और मुरादाबाद—में अमेरिकी टैरिफ नीति और बढ़ते शुल्कों के कारण निर्यात बुरी तरह प्रभावित हुआ है, जिससे ठेका और अस्थायी कर्मचारियों के रोजगार पर संकट खड़ा हुआ है.

युवाओं के बीच असंतोष का सबसे बड़ा कारण परीक्षाओं में बार-बार होने वाली धांधली और पेपर लीक हैं. 2024 में 60,244 पदों के लिए हुई पुलिस कांस्टेबल परीक्षा (जिसमें 48 लाख परीक्षार्थी शामिल थे) को पेपर लीक के बाद रद्द करना पड़ा. इसी तरह समीक्षा अधिकारी (आरओ/एआरओ) की परीक्षा भी अनियमितताओं के कारण रद्द हुई, जिसमें 411 पदों के लिए लगभग 6.8 लाख अभ्यर्थी बैठे थे. सरकारी नौकरियों की सालों-साल तैयारी करने वाले युवाओं के लिए ये केवल प्रशासनिक कमियाँ नहीं, बल्कि समय, पैसे और भविष्य के अवसरों की सीधी तबाही हैं.

2027 की सियासी बिसात

इन परिस्थितियों में 2027 का उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव बेहद कड़ा और दिलचस्प होने वाला है. यद्यपि भाजपा अब भी सबसे बड़ी दावेदार है, लेकिन 2024 के नतीजों ने विपक्ष के लिए बड़ी संभावनाएँ खोल दी हैं.

भाजपा अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए तेजी से कदम उठा रही है.  स्थानीय उद्यमिता, छात्रों के लिए वजीफा और 'महिला उद्यमी क्रेडिट योजना' जैसी घोषणाओं के जरिए विभिन्न वर्गों को साधने की कोशिश की जा रही है, जिसके तहत स्व-सहायता समूहों की लगभग एक करोड़ महिलाओं को ₹1 लाख तक का ब्याज मुक्त ऋण दिया जाना है.

दूसरी ओर, सपा और कांग्रेस भी इस अवसर को भुनाने में जुटी हैं.  अखिलेश यादव और राहुल गांधी युवाओं, छात्र असंतोष, बेरोजगारी और जातीय समीकरणों (विशेषकर उच्च जातियों व पिछड़ा वर्ग के बीच की दरारों) को प्रमुखता से उठा रहे हैं. यदि 2024 की तरह दोनों दलों का तालमेल कायम रहता है, तो विपक्ष 2027 में मजबूत चुनौती पेश कर सकता है.

2027 का चुनाव केवल यह तय नहीं करेगा कि भाजपा अपनी खोई हुई सीटें वापस पा सकती है या नहीं; यह यह भी तय करेगा कि लखनऊ से नई दिल्ली तक सत्ता की राह तय करने वाला राजनीतिक खाका कितना टिकाऊ है. यदि 2024 में शुरू हुआ बदलाव स्थायी रूप लेता है, तो यह उस पूरे राजनीतिक संतुलन को बदल सकता है जिस पर भाजपा का राष्ट्रीय प्रभुत्व टिका हुआ है.

(जोया हसन जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के राजनीति अध्ययन केंद्र की प्रोफ़ेसर एमेरिटस हैं. यह अंग्रेजी में उनके मूल लेख का हिंदी में अनूदित अंश है)

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