कोई उम्मीद नहीं, कोई वोट नहीं... कैसे दिल्ली की अधिकांश सेक्स वर्कर मतदाता सूची से हटाई जा रही हैं

‘द गार्डियन’ के लिए अनुज बहल की इस रिपोर्ट में कहा गया है कि चुनाव आयोग का विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) अभियान और उसकी कठोर दस्तावेजी शर्तें समाज के सबसे हाशिये पर मौजूद वर्गों, विशेषकर सेक्स वर्कर्स और उनकी भावी पीढ़ी को लोकतांत्रिक प्रक्रिया से बेदखल कर रही हैं. बहल की यह लंबी रिपोर्ट कहती है कि यह सत्यापन प्रणाली (एसआईआर) उन लोगों के जीवन की जटिलताओं (जैसे मानव तस्करी, पारिवारिक बिखराव, और औपचारिक कागज़ात का अभाव) को ध्यान में रखे बिना बनाई गई है, जिससे वे नागरिक होते हुए भी अपनी पात्रता साबित करने में असमर्थ हैं. वोटर आईडी कार्ड सेक्स वर्कर्स के लिए केवल मतदान का जरिया नहीं, बल्कि सामाजिक समानता और मानवीय गरिमा का अहसास कराने वाला प्रतीक था. नाम कटने से उनकी नागरिक पहचान पर संकट खड़ा हो गया है. मतदाता सूची से नाम हटने का असर सिर्फ वोट देने तक सीमित नहीं है; इससे भविष्य में राशन और सरकारी कल्याणकारी योजनाओं से भी बेदखल होने का सीधा खतरा बन गया है.

रिपोर्ट के मुताबिक, पुरानी दिल्ली के सबसे व्यस्त व्यावसायिक मार्गों में से एक, गार्स्टिन बास्टिन (जीबी) रोड पर दिन के समय हार्डवेयर और कार-पार्ट्स की दुकानों की चहल-पहल रहती है. लेकिन ढलती शाम के साथ यह इलाका शहर के सबसे बदनाम रेड-लाइट डिस्ट्रिक्ट में बदल जाता है. यहाँ जर्जर इमारतों की ऊपरी मंजिलों के कोठों में लगभग 2,800 सेक्स वर्कर रहती और काम करती हैं.

स्वास्थ्य जोखिम, शोषण, कर्ज और बदहाल सफाई जैसी अनगिनत समस्याओं से जूझ रही इन महिलाओं के सामने अब एक नया संकट खड़ा हो गया है — भारत की विवादित चुनाव सुधार प्रक्रिया. चुनाव आयोग का विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) एक राष्ट्रव्यापी अभियान है. इसके शुरुआती दो चरणों में 13 राज्यों की मतदाता सूचियों से 5.8 करोड़ से अधिक नाम हटाए गए हैं. तीसरे चरण में शामिल दिल्ली में यह बेदखली सबसे अधिक (33%) दर्ज की गई है, जहाँ 31 अगस्त को प्रकाशित प्रारूप मतदाता सूची से 47.6 लाख नाम गायब हैं.

सरकार का दावा है कि एसआईआर का उद्देश्य अवैध प्रवासियों और अयोग्य मतदाताओं को हटाकर सूची को "शुद्ध" करना है. हालाँकि, आलोचकों का आरोप है कि मोदी सरकार इसका इस्तेमाल अल्पसंख्यक और वंचित मतदाताओं को निशाना बनाने के लिए कर रही है.

जीबी रोड पर मताधिकार से बेदखल किए गए लोगों का अनुपात कहीं अधिक है. स्थानीय 1,300 मतदाताओं की देखरेख करने वाले अधिकारियों के अनुसार, पिछली सूची में शामिल लगभग 650 सेक्स वर्कर में से कम से कम 500 (तीन-चौथाई से अधिक) को या तो "स्थानांतरित" घोषित कर दिया गया है या वे आवश्यक दस्तावेजों के अभाव में अपनी पात्रता साबित नहीं कर सकीं.

इनमें 36 वर्षीय ब्यूटी भी शामिल हैं, जो दो दशकों से अधिक समय से यहाँ रह रही हैं. 2008 में जब उनका पहला वोटर आईडी बना था, तब उनका स्थानीय पता और बूथ-स्तरीय अधिकारी (बीएलओ) का सत्यापन ही पर्याप्त था. लेकिन नए नियमों के तहत, अब पुरानी मतदाता सूची से संबंध साबित करना या पासपोर्ट, जन्म या शिक्षा प्रमाण पत्र जैसे दस्तावेज पेश करना अनिवार्य है. 16 साल की उम्र में मानव तस्करी की शिकार होकर यहाँ पहुंची ब्यूटी का अपने परिवार से कोई संपर्क नहीं है.  उनके पास जीबी रोड के पते वाला आधार कार्ड तो है, लेकिन एसआईआर प्रक्रिया के तहत केवल आधार नागरिकता या वोट देने की पात्रता का प्रमाण नहीं माना जाता. राजस्थान में अपने गाँव से मैट्रिक प्रमाण पत्र प्राप्त करने की उनकी कोशिशें भी विफल रहीं.

ब्यूटी कहती हैं, "अगर मेरे पास पिता का जन्म प्रमाण पत्र या मैट्रिक का कागज होता, तो मैं पहचान साबित कर सकती थी. लेकिन मैं उस गाँव वापस कैसे जाऊँ, जहाँ मेरी तस्करी के कारण परिवार मुझे स्वीकार करने से इनकार कर चुका है?" ब्यूटी के लिए वोटर आईडी सिर्फ एक कागज़ नहीं था. वे कहती हैं, "हम सब इंसान के तौर पर बराबर हैं. जब मैं वोट की कतार में खड़ी होती हूँ, तो कोई मुझसे बड़ा या छोटा नहीं होता. यह मुझे अहसास दिलाता है कि भले ही लोग मेरे काम के बारे में जो सोचें, मैं बाकी सभी के बराबर हूँ."

जीबी रोड पर महिलाओं की दस्तावेजी स्थिति बेहद अनिश्चित है. इस रिपोर्ट के लिए बातचीत की गई नौ सेक्स वर्कर में से कोई भी एसआईआर प्रक्रिया पूरी नहीं कर सकी. नेशनल नेटवर्क ऑफ सेक्स वर्कर्स (एनएनएसडब्ल्यू) की समन्वयक किरण देशमुख बताती हैं कि कई महिलाएँ बाल तस्करी का शिकार हुईं या बिना किसी स्थिर दस्तावेजी सबूत के कोठों के बीच आती-जाती रहीं. ऐसे में एसआईआर के कड़े नियमों को पूरा करना असंभव है.

नागरिक समूह 'वोटर अधिकार मंच' की सदस्य सागरिका राजोरा के अनुसार, सत्यापन प्रक्रिया का पूरा बोझ नागरिकों पर डाल दिया गया है.  जब जमीनी स्तर पर लोगों को खोजना थकाऊ होता है, तो बीएलओ के लिए उन्हें ‘स्थानांतरित'’ की श्रेणी में डाल देना आसान रास्ता बन जाता है. स्वास्थ्य कर्मियों या सहायक नर्सों से बने बूथ स्तर के अधिकारियों (बीएलओ) पर पहले से ही अतिरिक्त काम का बोझ है. राजोरा कहती हैं, "बिना किसी जवाबदेही के एक ही बीएलओ पर इतनी बड़ी जिम्मेदारी सौंपना सही नहीं है. जब लोगों का जीवन इतना अस्थिर हो, तो यह प्रणाली उनके लिए काम ही नहीं करती."

यह समस्या अगली पीढ़ी तक भी पहुँच रही है. 23 वर्षीय दिनेश की माँ (जो एक सेक्स वर्कर थीं) की तीन साल पहले मृत्यु हो गई. उनके पास जन्म प्रमाण पत्र न होने के कारण मृत्यु प्रमाण पत्र नहीं बन सका, जिससे दिनेश के पास अपना मातृ वंश साबित करने का कोई कागज़ नहीं बचा. जब दिनेश ने मैट्रिक प्रमाण पत्र जमा किया, तो बीएलओ ने पिता का नाम न होने पर सवाल उठाया. दिनेश पूछते हैं, "अगर मेरी माँ ने मुझे जन्म दिया है, तो मुझे किसी आधिकारिक प्रमाण पत्र पर किसी पुरुष के नाम की आवश्यकता क्यों है?" पिता का नाम न होने के कारण प्रारूप सूची से उनका नाम भी हटा दिया गया है.

एनएनएसडब्ल्यू ने मुख्य चुनाव अधिकारी से विशेष उपायों की माँग की है, लेकिन अधिकारियों का स्पष्ट कहना है कि सेक्स वर्कर के लिए कोई अलग प्रक्रिया नहीं है. दस्तावेज न होने पर नियमानुसार नाम हटाए ही जाएँगे.

वोट खोने का यह डर केवल मताधिकार तक सीमित नहीं है. पश्चिम बंगाल में एसआईआर के बाद हटाई गई मतदाता सूचियों का उपयोग कल्याणकारी योजनाओं (जैसे अन्नपूर्णा भंडार) से लगभग 30 लाख लाभार्थियों को बाहर करने के लिए किया गया.

दिल्ली में दावों और आपत्तियों की प्रक्रिया 29 अक्टूबर तक जारी रहेगी, लेकिन बेदखल किए गए लोग अब चुनौती देने की हिम्मत भी खो रहे हैं. दिनेश कहते हैं, "अगर मेरी माँ आज जीवित भी होतीं, तो भी वे कागज़ पेश नहीं कर पातीं जो माँगे जा रहे हैं. तो अब मैं उनकी मृत्यु के बाद वे दस्तावेज कहाँ से लाऊँ?"

(‘गार्डियन’ की इस रिपोर्ट में एसआईआर से प्रभावित लोगों के नाम बदल दिए गए हैं. यह अंग्रेजी की मूल रिपोर्ट का हिंदी में अनूदित अंश है)  

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