प्रताप भानु मेहता | भागवत से सवाल और उनके बयानों पर बहस खत्म करने का आसान रास्ता

'द इंडियन एक्सप्रेस' में प्रताप भानु मेहता ने लिखा है कि मोहन भागवत की पश्चिमी देशों की यात्रा और न्यूयॉर्क में दिए गए बयानों पर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं. उनके आलोचकों का कहना है कि समावेशी भाषा और यह दावा कि “जो हिंदू मानता है कि मुसलमानों को भारत में नहीं रहना चाहिए, वह हिंदू नहीं रह जाता”, महज दिखावा है. वहीं, भागवत के समर्थकों के बीच भी मतभेद हैं. कुछ लोग इसे आरएसएस की वास्तविक उदारता बताते हैं, तो कुछ को लगता है कि भागवत अपनी ही विचारधारा से दूर जाते हुए उदारवादी भाषा बोल रहे हैं. कुछ अन्य इसे आरएसएस के नफरत से मानवतावाद की ओर बढ़ने का संकेत मान रहे हैं.

लेकिन भागवत के न्यूयॉर्क वाले बयानों में नया कुछ नहीं है. वह पिछले कई वर्षों से इसी तरह की बातें कहते रहे हैं. 2021 में मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के एक कार्यक्रम में भी उन्होंने लगभग यही वाक्य दोहराया था. सवाल यह है कि आलोचक और समर्थक दोनों अब इन बयानों पर हैरान क्यों हैं. यह भी विडंबना है कि आरएसएस प्रमुख की बातों को गंभीरता से लेने के लिए उन्हें न्यूयॉर्क जाना पड़ा. इससे भी अधिक आश्चर्यजनक यह है कि कई पुराने आलोचक इन बयानों को आरएसएस के साथ समझौता करने का अवसर मान रहे हैं.

इतिहास में ऐसे कई उदाहरण हैं, जब अच्छे इरादों वाले लोगों के फैसलों से विनाशकारी परिणाम निकले और संकीर्ण सोच रखने वाले संगठनों से कभी-कभी सकारात्मक काम भी हुए. संगठन अपनी शुरुआती प्रवृत्तियों से आगे बढ़ सकते हैं. आरएसएस के सामने इस समय दो बड़ी चुनौतियां हैं. पहली, उसे नरेंद्र मोदी के बाद के भविष्य के बारे में सोचना होगा. मोदी के उभार से आरएसएस को राजनीतिक विस्तार मिला है, लेकिन संगठन को यह सुनिश्चित करना होगा कि मोदी के कमजोर पड़ने के साथ उसका प्रभाव भी खत्म न हो.

दूसरी चुनौती संगठन के भीतर की है. आरएसएस की ताकत उसके अनुशासित कैडर, त्याग और समर्पण की छवि पर आधारित रही है. लेकिन सत्ता और प्रभाव बढ़ने के साथ सामान्य राजनीतिक संगठनों की कमजोरियां भी उसमें दिखाई देने लगी हैं. इनमें अवसरवाद, करियरवाद और भ्रष्टाचार शामिल हैं. ऐसे में आरएसएस को अपनी सार्वजनिक छवि और आंतरिक कार्यप्रणाली पर फिर से विचार करना पड़ सकता है. यह स्थिति संगठन के भीतर वैचारिक बहस की कुछ गुंजाइश भी पैदा करती है.

हालांकि, भागवत अपने बयानों को लेकर उठ रही बहस को केवल भाषणों से नहीं, बल्कि सार्वजनिक और संस्थागत कार्रवाई से आसानी से खत्म कर सकते हैं. इसके लिए उनके सामने कई स्पष्ट अवसर हैं.

भागवत ने पहले हिंदुओं को हर जगह शिवलिंग खोजने की प्रवृत्ति पर सवाल उठाया था. दूसरी ओर, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मथुरा और वृंदावन में मंदिर निर्माण का लक्ष्य घोषित किया है. क्या भागवत यह स्पष्ट रूप से कहेंगे कि वह पूजा स्थल अधिनियम, 1991 की भावना का उल्लंघन करने वाले किसी भी कदम का विरोध करेंगे? क्या वह सांप्रदायिक विजय-भावना के खिलाफ सार्वजनिक रुख अपनाएंगे?

महाराष्ट्र के धर्मांतरण विरोधी कानून को लेकर भी सवाल उठते हैं. क्या भागवत ऐसे कानूनों को वापस लेने की मांग करेंगे, जो अल्पसंख्यकों के सामान्य धार्मिक आचरण में भी निर्दोष होने का भार उन्हीं पर डालते हैं? पश्चिम बंगाल में ईसाई प्रार्थना सभाओं और कब्रिस्तानों पर हुए हमलों के खिलाफ क्या वह आरएसएस की संगठनात्मक शक्ति का इस्तेमाल करेंगे? क्या वह यह सुनिश्चित करेंगे कि कानून का इस्तेमाल अल्पसंख्यकों को निशाना बनाने के लिए न हो?

ऐसे मामलों में सवाल केवल प्राथमिकी दर्ज होने का नहीं, बल्कि कानून के चयनात्मक इस्तेमाल का भी है. किसी विधायक के नमाज पढ़ने पर प्राथमिकी दर्ज करना हो या सहारनपुर में मस्जिद के खिलाफ बुलडोजर कार्रवाई, हर मामले में अपील और न्यायिक प्रक्रिया की गुंजाइश होनी चाहिए. क्या भागवत नफरत भरे भाषण देने वाले किसी मंत्री या प्रधानमंत्री तक के खिलाफ संगठनात्मक कार्रवाई का समर्थन करेंगे? और क्या वह यह सवाल उठाएंगे कि पिछले एक दशक में उनके समावेशी बयानों के बावजूद देश का सांप्रदायिक माहौल अधिक जहरीला क्यों हुआ है?

यह संभव है कि भागवत की समावेशी भाषा ईमानदार हो. लेकिन आम हिंदुओं के लिए अभी यह स्पष्ट नहीं है कि इसका व्यावहारिक अर्थ क्या है. आरएसएस की विचारधारा में “हिंदू मानस” को उसके कथित मूल स्वरूप में पुनर्स्थापित करने की बात कही जाती है. लेकिन जो हिंदू इस “मूल स्वरूप” की परिभाषा नहीं समझता, उसे लेकर क्या चिंता होनी चाहिए? धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान को नागरिक अधिकारों का आधार बनाने के बजाय यह कहना अधिक सरल और लोकतांत्रिक होगा कि किसी व्यक्ति की धार्मिक या सभ्यतागत पहचान उसके स्वतंत्र और समान नागरिक होने की स्थिति को प्रभावित नहीं करती.

आरएसएस शिक्षा को महत्व देने का दावा करता है. ऐसे में दिल्ली विश्वविद्यालय उसके लिए अपनी कथित वैचारिक प्रगति दिखाने का सबसे आसान अवसर हो सकता है. विश्वविद्यालय की खराब आधारभूत संरचना, जिसके बीच सत्य निकेतन में भयावह मौतें हुईं, एक गंभीर चिंता है. इसके साथ ही विश्वविद्यालय पर आरएसएस के प्रभाव को लेकर भी आरोप लगते रहे हैं. आलोचकों का कहना है कि कुलपतियों और शिक्षकों की नियुक्तियों में आरएसएस से संबंध दिखाना जरूरी हो गया है. अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के विरोध के डर से सेमिनार रद्द किए जाते हैं. “विस्थापन-मुक्ति” या “डीकोलोनाइजेशन” के नाम पर बौद्धिक स्वतंत्रता को कमजोर करने के आरोप भी सामने आए हैं.

भागवत चाहें तो यह स्पष्ट कर सकते हैं कि ज्ञान का काम राजनीतिक सत्ता को चुनौती देना है, उसके अधीन होना नहीं. भारतीय परंपराओं में ज्ञान और जानने की प्रक्रिया तक पर संदेह करने की गुंजाइश रही है. इसलिए ज्ञान को किसी सभ्यतागत पहचान के अधीन करना उसकी मूल भावना के साथ विश्वासघात होगा.

जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रहे छात्रों की बेचैनी को भागवत ने सही पहचाना था. उन्हें राष्ट्रविरोधी कहना उचित नहीं है. लेकिन प्रधानमंत्री की ओर से “दिमागी नक्सल” जैसे शब्दों का लगातार विस्तार किया जा रहा है. यही विरोधाभास इस पूरे विवाद का केंद्र है. एक ओर लोग भागवत के समावेशी बयानों का स्वागत कर रहे हैं, दूसरी ओर उनकी पार्टी और सरकार उसी संदेश को जमीन पर लागू करती दिखाई नहीं देती.

इसलिए दो ही संभावनाएं बचती हैं. या तो भागवत अपने बयानों का वास्तविक अर्थ नहीं समझते, या फिर वह उन्हें लागू कराने में प्रभावहीन हैं. दोनों ही स्थितियों में उनके बयानों की प्रशंसा करने वाले लोगों की भूमिका पर सवाल उठता है. क्या वे वास्तविक बदलाव चाहते हैं, या केवल अपनी सुविधा, भ्रम और डर के कारण भागवत की बातों को पर्याप्त मान लेना चाहते हैं?

प्रताप भानु मेहता वरिष्ठ पत्रकार हैं. यह उनके अंग्रेजी लेख का हिंदी में अनूदित अंश है.

Previous
Previous

एसआईआर: नाम की स्पेलिंग में गलती पर भारत रत्न सम्मानित वैज्ञानिक सीएनआर राव को नोटिस

Next
Next

के. नारायणन उन्नी | जनगणना के प्रश्नों को लेकर चिंताएं