के. अन्नामलाई ने चुनावी राजनीति में अपनी नई पारी के लिए एक लंबी और सुनियोजित राह की कल्पना की थी. जून में भारतीय जनता पार्टी छोड़ने के बाद, तमिलनाडु भाजपा के पूर्व अध्यक्ष ने कम से कम एक साल तक एक स्वतंत्र राजनीतिक आंदोलन खड़ा करने, अपनी नई पार्टी स्थापित करने और 2031 के विधानसभा चुनावों की ठोस तैयारी करने की योजना बनाई थी. लेकिन इस राजनीतिक प्रयोग के शुरू होने के चार महीनों के भीतर ही उनकी तय समय-सारिणी (टाइम-टेबल) अचानक सिमट गई है. यही वजह है कि अब वे अपनी पूर्व पार्टी और केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार के प्रति असाधारण रूप से तीखे तेवर अपना रहे हैं.
उम्मीद से धीमी गति और रणनीति में बदलाव
अरुण जनार्दनन की रिपोर्ट के अनुसार, अन्नामलाई के नए आंदोलन "वी द लीडर्स" ने शुरुआत में 50 लाख सदस्य बनाने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा था. हालांकि, यह आंकड़ा फिलहाल 20 लाख के आसपास ही थम गया है. सदस्यों की सुस्त भर्ती के अलावा, सबसे बड़ी चिंता यह है कि यदि वे अपने समर्थकों को चुनावी मैदान में उतरने के लिए बहुत लंबा इंतजार कराते हैं, तो उनके प्रति जनता और कार्यकर्ताओं का राजनीतिक उत्साह धीरे-धीरे ठंडा पड़ सकता है.
समय की विलासिता को ध्यान में रखकर तैयार की गई यह राजनीतिक योजना अब उम्मीद से जल्दी क्रियान्वयन की मांग कर रही है. यही कारण है कि अन्नामलाई ने अपनी गतिविधियों को तेज कर दिया है. 14 अक्टूबर को उन्होंने घोषणा की कि "वी द लीडर्स" आंदोलन आगामी स्थानीय निकाय चुनावों में अपने प्रत्याशी उतारेगा. अगले ही दिन, उन्होंने कोयंबटूर में 'अब्दुल कलाम सेंटर फॉर एथिक्स एंड पॉलिटिक्स' का उद्घाटन किया, जिसे जमीनी स्तर के युवा नेताओं को प्रशिक्षित करने वाले संस्थान के रूप में पेश किया गया है.
इन कदमों से साफ संकेत मिलता है कि एक साल का तैयारी काल अब सिमटकर महज छह महीने का रह गया है, जिससे भाजपा से अलग अन्नामलाई की पहली वास्तविक चुनावी परीक्षा समय से पहले आ खड़ी हुई है.
जब पूर्व मुख्यमंत्री जयललिता और एम. करुणानिधि के निधन के बाद तमिलनाडु की राजनीति में नया शून्य पैदा हुआ था, तब अन्नामलाई तेजी से एक नए विकल्प के रूप में उभरे थे. लेकिन आज वह राजनीतिक स्थान काफी भीड़भाड़ वाला हो चुका है.
अभिनेता विजय की पार्टी 'तमिलगा वेत्री कड़गम' (टीवीके) की चुनावी सफलता और सरकार गठन ने राज्य के समीकरण बदल दिए हैं. सिनेमाई पर्दे से सीधे मुख्यमंत्री कार्यालय तक पहुंचे विजय के कारण अन्नामलाई का मुकाबला अब किसी काल्पनिक प्रतिद्वंद्वी से न होकर एक सत्तासीन नेतृत्व से है. साथ ही, अभिनेता धनुष के भी राजनीति में आने की अटकलों ने प्रतिस्पर्धा को और बढ़ा दिया है.
इसके बावजूद, एक पूर्व आईपीएस अधिकारी होने के नाते अन्नामलाई अपनी तार्किक और मुखर भाषण शैली के कारण एक विशिष्ट पहचान रखते हैं. द्रमुक (डीएमके) के एक वरिष्ठ नेता का भी मानना है कि अन्नामलाई कम विधायकों के बावजूद विधानसभा के अंदर विजय के खिलाफ अकेले दम पर एक मजबूत और प्रभावी विपक्ष की भूमिका निभा सकते हैं.
भाजपा से दूरी और 'आक्रामक राष्ट्रवाद' से नागरिक अधिकारों की ओर
भाजपा छोड़ने के बाद अन्नामलाई के लिए सबसे बड़ी चुनौती केंद्र सरकार और राज्य में विजय के प्रशासन—दोनों से एक समान राजनीतिक दूरी बनाए रखना है. पांच सालों से अधिक समय तक तमिलनाडु में भाजपा का सबसे प्रमुख चेहरा रहने के कारण उनकी पहचान सीधे प्रधानमंत्री मोदी से जुड़ी रही थी.
लेकिन 21 अक्टूबर को दिए गए उनके एक बयान ने इस रिश्ते में बड़े बदलाव के संकेत दिए. दिल्ली में 'कॉकरोच जनता पार्टी' (सीजेपी) के प्रदर्शनों पर पुलिस कार्रवाई की आलोचना करते हुए उन्होंने 2011 के उस दौर को याद दिलाया जब गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए नरेंद्र मोदी ने दिल्ली पुलिस की कार्रवाई का विरोध किया था. अन्नामलाई ने कहा कि तब मोदी सही थे, और वही लोकतांत्रिक नियम आज की सरकार पर भी लागू होने चाहिए.
उन्होंने कड़े शब्दों में कहा, "हर किसी को राष्ट्र-विरोधी करार देना अब बंद होना चाहिए." उन्होंने यह भी जोड़ा कि 12 साल से केंद्र की सत्ता में रहने के बाद भी सरकार को प्रासंगिक बने रहने के लिए लगातार किसी न किसी 'दुश्मन' की जरूरत महसूस होती है. यह बदलाव दर्शाता है कि कभी भाजपा के आक्रामक राष्ट्रवाद का चेहरा रहे अन्नामलाई अब नागरिक स्वतंत्रता, प्रक्रियागत निष्पक्षता और असहमति के अधिकार पर अधिक जोर देने लगे हैं.
अन्नामलाई के सामने सबसे बड़ी सांगठनिक कमजोरी यह है कि जिलों में कैडर और बड़े चेहरों वाली पुरानी पार्टियों के विपरीत, उनका आंदोलन पूरी तरह से केवल उन्हीं के चेहरे पर निर्भर है. कोयंबटूर में शुरू किए गए कलाम सेंटर के जरिए वे कम से कम 1 लाख जमीनी स्वयंसेवकों को प्रशिक्षित कर इसी कमी को दूर करने की कोशिश कर रहे हैं.
इसके अलावा, अन्नामलाई ने अभी तक विजय और उनकी सरकार पर सीधा और तीखा हमला नहीं बोला है. तमिलनाडु में अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने के लिए उन्हें भाजपा के साथ-साथ टीवीके का भी खुलकर मुकाबला करना होगा.
कोयंबटूर के एक वरिष्ठ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ नेता ने अन्नामलाई की वर्तमान स्थिति का सटीक विश्लेषण करते हुए कहा:"अन्नामलाई में राजनीतिक क्षमता की कोई कमी नहीं है. चुनौती केवल ध्यान आकर्षित करने और उस ध्यान को एक स्थायी पार्टी के रूप में बनाए रखने के बीच की दूरी को पाटने की है. भाजपा में रहते हुए उन्हें पहले से जुटाए गए दर्शक मिलते थे; अब उन्हें खुद दर्शक जुटाने हैं, उन्हें जोड़े रखना है और अंततः उन्हें वोट में बदलना है. समय-सारिणी तेज हो चुकी है, अब देखना यह है कि क्या उनका आंदोलन भी उसी गति से आगे बढ़ता है."

